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दिल्ली में अलेस ने किया ‘कहानी पाठ और परिचर्चा' का आयोजन

अंबेडकरवादी सिद्धांतों के आधार पर अभिव्यक्ति की आजादी को जिंदा रख समाज के शोषित तबके को नई दिशा और नया आयाम देने की दिशा में बीते शनिवार 24 जून 2023 को अंबेडकरवादी लेखक संघ, दलित आदिवासी शक्ति अधिकार मंच एवं रिदम पत्रिका द्वारा अलेस ऑफिस, नई दिल्ली में ‘कहानी पाठ एवं परिचर्चा’ का आयोजन किया गया। इस आयोजन का उद्देश्य उभरते हुए कहानीकारों को एक मंच प्रदान करना तथा अंबेडकरवादी वैचारिकी से युवाओं को रूबरू करवाना भी था। कार्यक्रम में युवाओं ने भारी संख्या में शामिल होकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। कार्यक्रम का संचालन युवा साथी घनश्याम ने सभी बहुजन समाज की महान विभूतियों ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले तथा डॉ. अंबेडकर को नमन कर किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता मोहनदास नैमिशराय एवं जयप्रकाश कर्दम द्वारा की गई तथा प्रमुख वक्ता के रूप में सरोज कुमारी, रजनी दिसोदिया और हेमलता शामिल हुई।

कहानी पाठ और परिचर्चा में सुदेश तंवर, डॉ. बलराज सिहमार तथा मामचंद सागर तीनों कहानीकारों ने अपनी-अपनी स्वरचित कहानी का पाठ किया। प्रथम कहानी का पाठ वरिष्ठ लेखक सुदेश तवंर ने अपनी कहानी ‘छोटी सी दुनिया’ से किया। इसकी भूमिका में कहानीकार ने कहा कि यह कहानी 1992-1993 के आस-पास लिखी गई थी। इसी क्रम में डॉ. बलराज और मामचंद जी ने भी अपनी-अपनी कहानी पढ़ी। कहानी पाठ के क्रम को आगे बढ़ाते हुए डॉ.बलराज ने अपनी पहली कहानी ‘बाथरूम वाली लड़की’ जो हाल ही में स्वनिम पत्रिका में प्रकाशित हुई है तथा मामचंद सागर ने ‘कीमत’ कहानी का पाठ किया।कहानी पाठ के बाद आमंत्रित वक्ताओं में सबसे पहले विवेकानंद कॉलेज में हिंदी की प्राध्यापिका डॉ.सरोज कुमारी को वक्तव्य देने के लिए बुलाया गया। कहानी पर अपनी बात रखते हुए डॉ. सरोज कुमारी ने सुदेश तवंर की कहानी के विषय में कहा कि यह कहानी विशेष है अपने कथानक और कथावस्तु के कारण। कहानी अपने सामाजिक परिवेश को प्रामाणिक ढंग से पेश करती है। कहानी लेखन के विषय में उन्होंने कहा कि- ‘कहानी के संवादों में जीवंतता होनी चाहिए तथा पात्रों का चयन परिवेश के सापेक्ष होना चाहिए।’
अन्य वक्ता के रूप में मिरांडा हाउस कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर रजनी दिसोदिया ने सुदेश तंवर की कहानी ‘छोटी सी दुनिया’ पर कहा कि यह कहानी भूमंडलीकरण के दौर में लिखी गई और उस समय लेखक आज के परिदृश्य को देख पा रहे थे यह कहानी की बहुत बड़ी खूबी है। ‘अंडरक्लास’ को प्रस्तुत करती हुई यह एक बेहतरीन कहानी है जो उन लोगों की भी बात करती है जो किसी क्लास में नहीं आते परन्तु वे भी आज़ादी के उतने ही हकदार हैं।  रजनी दिसोदिया ने डॉ. बलराज सिहमार की कहानी ‘बाथरूम वाली लड़की’ के विषय में कहा कि यह कहानी अपने शीर्षक के कारण अपनी ओर आकर्षित करती है। कहानी की नायिका सामान्य लड़की से अलग व्यक्तित्व की है। आमूमन ऐसी लड़कियाँ जिनका कोई बॉयफ्रेंड होता है वह इतनी उपलब्धियां प्राप्त नहीं कर पाती लेकिन यही मिथक, यह कहानी तोड़ती है।  मामचंद जी की कहानी ‘कीमत’ के विषय में बोलते हुए रजनी दिसोदिया ने कहा कि यह कहानी अपने आस-पास के वातावरण का वर्णन करती है लेकिन कहानी में प्रमुख पात्र बानो के मोहल्ले वाले, उसके समाज के लोग उसका साथ देते हुए नहीं दिखते जो कहानी में अखरता है। साथ ही उन्होंने कहा कि बानो की बेटी इमराना का चरित्र भी काफी निराश करता है। लेखक को बानों का चरित्र एक सशक्त महिला के रूप में पेश करना चाहिए था जहां वह बानों को अपनी अस्मिता के लिए लड़ते हुए दिखाते परन्तु पात्र ऐसा करते हुए कहीं दिखाई नहीं देते।

कहानी पाठ एवं परिचर्चा की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ट आलोचक एवं लेखक मोहनदास नैमिशराय ने सुदेश तंवर की कहानी के विषय में कहा कि उनकी कहानी का कोई उद्देश्य नज़र नहीं आता वह केवल सवालों के जवाब देकर ही संवाद को खत्म कर देते हैं। कहानीकारों को विभिन्न मौसमों का भी जिक्र अपनी कहानी में करना चाहिए तथा उस मौसम में संघर्षरत समाज परिलक्षित होना चाहिए परन्तु कहानी में कहीं भी किसी पात्र का संघर्ष नज़र नहीं आता, ना तो वह व्यवस्था से लड़ता है और ना ही कहानी में कोई झकझोरने वाला संवाद है। इस दृष्टि से यह कहानी अपने साथ न्याय नहीं कर पाती। आगे वे डॉ. बलराज सिहमार की कहानी पर कहते हैं कि कहानी का शीर्षक ‘बाथरूम वाली लड़की’ मुझे फिल्मी लगा। कहानी ने पात्र के साथ न्याय किया परन्तु लेखक ने स्वयं के साथ न्याय नहीं किया। मामचंद जी की कहानी ‘कीमत’ में बानो के साथ कबाड़ी वाले का संवाद उन्हें कुछ सही नहीं लगा परन्तु कहानी में संवाद शैली पर लेखक की मजबूत पकड़ ओर अधिक लेखन की ओर उत्साहित करता है। कवि से कहानीकार की भूमिका में मामचंद सागर का विस्तार हुआ है तथा भाषा पर उनकी पकड़ मजबूत हुई है। वे कहानी में वातावरण का वर्णन बहुत ही संजीदा ढंग से करते हैं। 

वरिष्ठ साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठित मोहनदास नैमिशराय ने कहानी पाठ में अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि " उत्तरी भारत के दलित लेखकों की कहानियों में परिवेश का अभाव रहता है" उन्होंने कहानी लेखन पर कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर संकेत किया जैसे कि पात्रों के मनोविज्ञान को कहानीकार को समझना चाहिए, कथा का अंत प्रभावशाली होना चाहिए, विधा की भाषा और शैली में लगातार सुधार हो, कहानी में संवाद की समझ हो, निम्न स्तर की भाषा से बचाव, लेखक का कथा के भीतर तक प्रवेश हो अर्थात गहन अध्ययन, विवेचन हो तथा दलित साहित्यकारों को कहानी के नये मानक स्थापित करने होंगे। 
मोहनदास नैमिशराय के वक्तव्य के बाद कार्यक्रम के दूसरे अध्यक्ष के रूप में कहानीकार, उपन्यासकार, कवि तथा वरिष्ठ आलोचक जयप्रकाश कर्दम ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा- बलराज सिहमार की कहानी ‘बाथरूम वाली लड़की’ बहुत बढ़िया कहानी है। ये कहानी दलित कहानी नहीं है। जयप्रकाश कर्दम ने कहा कि कहानी पाठ व परिचर्चाएं लगातार होनी चाहिए जिससे युवाओं का भी कहानी लेखन के प्रति रूझान बढ़े और वे भी कहानी लेखन प्रक्रिया की बारीकियों को जाने तथा हम वरिष्ठ कहानीकारों का भी यह कर्तव्य है कि हम ऐसी कार्यशालाएं आयोजित करते रहें। कार्यक्रम में सभी वक्ताओं, कहानीकारों और श्रोताओं को धन्यवाद कर, कार्यक्रम की समाप्ति की घोषणा की गई।

इस कार्यक्रम में संजीव डांडा, अमन,अंजलि, अमित, विरेश, पूजा सादगी, तथा कई शोध छात्र-छात्राओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। ऐसी परिचर्चाएं तथा गंभीर आलोचना समाज को दिशा और दशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। अंबेडकरवादी लेखक संघ तथा दलित आदिवासी शक्ति अधिकार मंच हाशिये के समाज के लिए लगातार ऐसे सामाजिक और साहित्यिक आयोजन करता आया है और उम्मीद है कि आगे आने वाले समय में युवा ऐसे मंचों पर अपनी ओर जोरदार उपस्थित दर्ज कर समाज में कुछ उद्देश्यपूर्ण व सार्थक योगदान दे पाएं।  कार्यक्रम की समाप्ति पर अनौपचारिक वार्ता का दौर चला जिसमें शोधार्थियों ने कहानीकारों से बातचीत कर अपनी जिज्ञासाओं को शांत किया। ऐसे आयोजन हमें याद दिलाते हैं कि लगातार साहित्यिक हस्तक्षेप की अभी ओर आवश्यकता है जो समाज को चेतनशील बनाए।


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