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डॉ भीमराव अंबेडकर जयंती विशेष- दुनिया से जीते पर अपनों से हारे थे बाबा साहेब

बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर जैसे लोग युगों-युगों में इस धरा पर आते हैं, जो सदियों से सताए लोगों का जीवन बदलकर रख देते हैं। जिन लोगों को जानवर से भी बदतर समझा जाता था उन्हें इंसान का दर्जा दिलाकर समाज में स्थान दिलवाते हैं। शायद इसीलिए बाबा साहेब जैसे लोग भगवान का, मसीहा का दर्जा पाते हैं, भारतीय इतिहास में ये दर्जा किसी को नहीं मिला। देश के महापुरुषों में अकेले बाबा साहेब ही है जिन्हें लोग अपने घरों में भगवान की तरह पूजते हैं।

हालांकि बाबा साहेब किसी भी तरह की पूजा पद्वति या व्यक्ति पूजा के खिलाफ़ थे। वे खुद कहते थे कि किसी के भी अनुयायी मत बनो, फिर वो मैं ही क्यों ना हूँ। मेरे दिखाए रास्ते पर चलो, यही मेरा असली सम्मान होगा, और मेरा संघर्ष तभी सफल होगा। लेकिन लोगों ने उल्टा किया, उनके द्वारा बताए संघर्ष के रास्ते के बजाये आसान और आरामदायक रास्ता चुना, और उनकी पूजा शरू कर दी और फिर सारी ज़िम्मेदारी या जवाबदेही खत्म। उसके बाद मतलब परस्त लोगों ने सिर्फ अपने और अपने परिवार के बारे में ही सोचा और समाज के प्रति कोई चिंता उन्हें नहीं सताती थी और  इन्ही लोगों ने धीरे धीरे खुद को अपने समाज से काट लिया, और खुद पर नव-ब्राह्मणवाद का लबादा ओढ़ लिया। अब यही लोग ब्राह्मणवादियों से ज्यादा पूजा पाठ करते हैं, और अपने ही समाज को हीन समझते हैं, ये स्थिति बाबा साहेब ने बहुत पहले भांप ली थी।

बाबा साहेब हिंदुत्व की कट्टरता की खिलाफत करते हैं, पूरी दुनिया से लड़ते हैं लेकिन जिस वर्ग के लिए उन्होंने इतना संघर्ष किया, इतना लड़े वही वर्ग उन्हें रोने को मज़बूर कर देता है और उस देवता को कहना पड़ता है कि मुझे मेरे अपने पढ़े-लिखे लोगों ने ही धोखा दिया।  

जब वे पहली बार लोकसभा चुनाव में खड़े हुए तो उनको हार का सामना करना पड़ा था। तब मजबूर होकर उन्हें ये कहना पड़ा था कि मुझे ‘मेरे समाज के  पढ़े लिखे लोगों ने ही धोखा दिया’ ये बात उन्होंने बहुत व्यथित होने के बाद कही, उन जैसा दूरदर्शी शायद ही कोई रहा हो, वो यह देख रहे थे कि जिस आंदोलन को वो यहां तक लाए हैं उसे आगे बढ़ाने के लिए, मजबूत करने के लिए उनके अपने लोग आगे नहीं आ रहे हैं और वे सिर्फ अपनी सुख-सुविधाओँ में वशीभूत हो रहे हैं। अपने समाज के दूर-दराज में बसने, वाले निम्न स्तरीय जीवन जीने वाले भाई-बहनों के प्रति वो अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं समझ रहे हैं। वो समझ नहीं पा रहे थे कि गलती कहां हुई। आज भी उनकी बात शत-प्रतिशत सही साबित होती दिखाई दे रही है।  

समाज के बुद्धिजीवी वर्ग की खामोशी और बहुजन मिशन से मुँह फेरना, मनुवादियों को सत्ता की चाबी हासिल करने में मददगार साबित होने वाली थी। वो समझ रहे थे कि अगर ये संघर्ष निरंतर जारी नहीं रहा तो दलितों से नव-ब्राहम्णवादी बने वर्ग को भी एक दिन फर्श पर आना होगा। मन के और धन के बड़े होने से कुछ नहीं होता है, तन, मन और धन  जब अपनों के काम ना आए तो उसका कुछ अर्थ नहीं है। ये लोग अपनी आने वाली नस्लों को फिर से शुद्र बनने की राह पर हैं।  

उन्होंने अपनी किताब 'जाति-प्रथा उन्मूलन' में इसका जिक्र करते हुए लिखा था कि “बुद्धिजीवी वर्ग वह है, जो दूरदर्शी होता है, सलाह दे सकता है और नेतृत्व प्रदान कर सकता है। किसी भी देश की अधिकांश जनता विचारशील एवं क्रियाशील जीवन व्यतीत नहीं करती। ऐसे लोग प्रायः बुद्धिजीवी वर्ग का अनुकरण और अनुगमन करते है। यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि किसी देश का संपूर्ण भविष्य उसके बुद्धिजीवी वर्ग पर निर्भर होता है। यदि बुद्धिजीवी वर्ग ईमानदार, स्वतंत्र और निष्पक्ष है तो उस पर यह भरोसा किया जा सकता है कि संकट कि घड़ी में वह पहल करेगा और उचित नेतृत्व प्रदान करेगा। यह ठीक है कि प्रज्ञा अपने आप मे कोइ गुण नहीं है। यह केवल साधन है और साधन का प्रयोग उस लक्ष्य पर निर्भर है, जिसे एक बुद्धिमान व्यक्ति प्राप्त करने का प्रयत्न करता है। बुद्धिमान व्यक्ति भला हो सकता है, लेकिन साथ ही वह दुष्ट भी हो सकता है। उसी प्रकार बुद्धिजीवी वर्ग उच्च विचारों वाले व्यक्तियों का एक दल हो सकता है, जो सहायता करने के लिए तैयार रहता है और पथभ्रष्ट लोगों को सही रास्ते पर लाने के लिए तैयार रहता है।“


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