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सामाजिक लोकतंत्र तथा अभिव्यक्ति की आज़ादी

ये उसने क्यों बोला !, मैंने जो कहा अपनी अभिव्यक्ति की आजादी के सन्दर्भ में कहा !,
उसको पाकिस्तान ही भेज दिया जाए !, यह मुस्लिम है तो मुस्लिम की ही बात करेगा !,
धर्म निरपेक्षता कोरा दिखावा है, देश का सच हिन्दुवाद है !….
पता नही इस 21वीं सदी में कितने जुमले ऐसे भरे पड़े हैं जो बहते हुए जल की तरह लगते हैं, जिनमें प्रचुर मात्रा में  सांप्रदायिकता रूपी कंकड़, पत्थर अपने आप में पूरी तरह व्याप्त हैं । अभाव है तो  केवल सामाजिकता का, जो लोकतंत्र के बिना असम्भव है। हालांकि एक सच यह भी है कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, वो भी संवैधानिक रूप से !, लेकिन बावजूद इसके देश में अभिव्यक्ति की आजादी की कड़ी कमजोर सी पडती क्यों दिखाई दे रही है, आखिर वह कौन सा कारण है, जिसने अमेरिका तथा यूरोप जैसे देशों को भी भारत के प्रति सामाजिक चिंतनीय स्थिति को दर्शाया है । यहां बात है केवल देश में सामाजिक लोकतंत्र की पूर्ण स्थापना की ।    

अब बात आती है, सामाजिक लोकतंत्र का अभिव्यक्ति की आजादी के साथ सम्बन्ध की । सामाजिक लोकतंत्र अपने आप में विचारों के शासन की, ग्रहण करने की क्षमता, सुनने की आजादी तथा लोक-कल्याण को सीमित न करके हेगल के वाद-प्रतिवाद और संवाद को आत्मसात करते हुए लोकतांत्रिक नजरिये को आगे बढ़ाने से है और यही बात अभिव्यक्ति की आजादी की स्तिथि को बयां करती है । भारत एक विविधता में एकता वाला देश है, लेकिन बावजूद इसके इस विविधता में  लोकतंत्र की कमी ही अधिकतर दिखाई देती रही है। पिछले कुछ सालों में पता नहीं कितने ऐसे घटनाक्रम देखने को मिले, जिसने अभिव्यक्ति की आजादी पर लगाम लगाने का ही काम किया है । चाहे वह ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के मुखिया सुधींद्र कुलकर्णी का एक पाकिस्तानी समकक्ष की किताब लॉन्च करने से  मुहं पर कालिख पोतने से सम्बन्धित हो, फिर चाहे साहित्य अकादमी के दो दर्जन से अधिक विद्वानों तथा साहित्य जगत के लेखकों द्वारा अपना पुरस्कार लौटाने तक सम्बन्धित हो। शाहरुख खान तथा आमिर खान का अपनी सुरक्षा को लेते हुए बात कहने की बात हो। सब की सब राजनीति के कटघरे में आने से बाज नहीं आई।     

इस विषय ने इसके सहिष्णुता बनाम सेकुलरवाद को भी कटघरे में लिया तथा भारत के बहुलवाद तथा धर्म-निर्पेक्षीय विचार-शैली को भी अकादमिक तथा नीति प्रतिष्ठानों में आगामी बदलते शोध तथा चिन्तन का विषय बनाया, लेकिन सामाजिक लोकतंत्र के बदलते आयामों पर किसी का ध्यान नहीं गया और वह यह कि भारत का लोकतंत्र बखूबी बदल रहा है । जिसमे भारत की जनता जनार्दन की सोच तथा सत्ता के गलियारे में बैठे नेतागण के बीच कारनामे हैं, जो सत्ता की होड़ के चलते हर एक मामूली बात को भी राजनीति के गलियारे में ले आते हैं । गरीबों तथा हाशिये पर खिसकाए गए लोगों की बात करें तो उनका तो इस लोकतांत्रिक प्रणाली में बोलने का ही अधिकार बहुत सीमित कर दिया गया है और जिस कारण वह आज अपना संघर्षमय जीवन जीने में लगे हुए हैं।     

क़ानूनी तथा प्रक्रियात्मक बात का ख्याल रखा जाए तो भारत का संविधान का अनुच्छेद-19(1) कहता है कि भारत के प्रत्येक नागरिक को बिना किसी डर के अपनी बात कहने का हक है, लेकिन वह राष्ट्र की  मान-मर्यादा का ख्याल रखता हो,यह भी ध्यान दिलाना आवश्यक हो जाता है । दूसरी तरफ  भारत के समाज विज्ञानी तथा राजनीति शास्त्री भीखू पारिख भारतीय लोकतंत्र का बहुत ही महत्वपूर्ण निष्कर्ष विवेचित करते हुए कहते हैं कि हमारे राजनीतिक वर्ग ने भारत को न्यायिक लोकतंत्र में तब्दील कर दिया है । ब्रिटिश उपनिवेश ने भारतीयों को भूरे इंग्लिशमैंन में बदल दिया । यह वर्ग नैतिक रूप से भारतीयों की पहचान और अस्मिता को नष्ट कर रहा है । राज्य अब सरकार के अधीन हो गया है, जबकि वास्तव में इसके विपरीत होना चाहिए था ।      

अमेरिका में अभिव्यक्ति की आजादी उदार स्वरूप में है, जबकि चीन में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता, प्रकाशन, इक्कठा होने, रैली निकालने और प्रदर्शन करने की आजादी नहीं देता। सामाजिक कानून व्यवस्था बनाये रखने की दलील के साथ ऐसा किया जाता है तथा कलात्मक व रचनात्मक आजादी प्रतिबंधित है। चीन जैसी स्वरूप की बानगी हम भारत में भी देख सकते हैं- गुजरात का पटेल आंदोलन हो या सहारनपुर में शब्बीरपुर गांव में दलितों के साथ हुई घटना के विरोध में चंद्रशेखर रावण के नेतृत्व में सड़कों पर उतरी भीम आर्मी के आंदोलन के लिए घटना वाले राज्यों और जिलों में सोशल मीडिया का सशक्त माध्यम बना मोबाइल फोन और  इन्टरनेट सेवा को बंद कर दिया गया था ताकि आवाज अधिक लोगों तक पहुच न सके ।     

यहां यह सवाल उपजता है की क्या भारत में लोकतांत्रिक प्रणाली है या नही ! जवाब हां का होगा, लेकिन फिर चीन जैसे ऐसे कारनामे क्यों । हमारे यहां गणतांत्रिक-लोकतांत्रिक शासनीय पद्धति शामिल है । खैर भारतीय लोकतंत्र बदल रहा है और कुछ चुनौतियां भी स्वागत कर रही हैं। इस नजरिये से एक बात तो जाहिर है अभी हमारे भारत देश को सामाजिक लोकतंत्र की कसौटी पर उतरना ही पड़ेगा नहीं तो भारत की विभिन्नता में एकता का विषैलापन कहीं अधिक और खतरनाक न हो जाए । आज आवश्यकता इस बात की अधिक है कि आज जो भी गतिविधियां भारत में चल रही हैं, उसमे संतुलितता का वातावरण इज़ाद करना आवश्यक हो जाता है और साथ ही घटित तमाम सामाजिक क्रियाओं को सभी वर्गों के बीच आत्मसात करते हुए सहन करने की परम्परा को विकसित करने की आजादी को भी स्थापित किया जाए, ताकि भारत में एक स्वास्थ्यवर्धक लोकतांत्रिक मॉडल का विकास संभव हो सके । तभी जाकर भारत एक सामाजिक लोकतंत्र हितैषी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को पुनर्स्थापित कर पायेगा ।  
विकास कुमार, डॉक्टरेट
सेंटर फॉर साउथ एशियन स्टडीज,
अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन संस्थान जे.एन.यू , नई दिल्ली    


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