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दलित राष्ट्रपति की आड़ में संविधान पर टेढ़ी नज़र

भाजपा इस बार किसी दलित को ही राष्ट्रपति बनाने पर क्यों तुली हुई है, इसके पीछे सबके अपने-अपने तर्क हैं, कोई कहता है कि ये 2019 की तैयारी है, कोई कहता है कि दलितों पर बढ़े उत्पीड़न की घटनाओं के बाद बीजेपी की जो साख गिरी है वो उसे ठीक करना चाहती है, एक बहुत बड़े वर्ग को लगता है कि बीजेपी केवल दलित कार्ड खेल रही है और दलितों को संतुष्ट करने के लिए ही दलित को राष्ट्रपति बनाया जा रहा है, लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं कि दलित चेहरे की आड़ में बीजेपी की और भी गहरी और खतरनाक मानसिकता काम कर रही हो। कहीं वो दलित राष्ट्रपति के हाथों संविधान में छेड़छाड़ की तैयारी तो नही कर रही है। क्योंकि ये किसी से छिपा नही है कि संघ आए दिन संविधान और गणतंत्र पर सवाल उठाता रहता है, और खुले तौर पर संविधान बदलने की बात करता है। इससे बीजेपी एक तीर से कई निशाने साधने में कामयाब हो रही है, अगर वो मोहन भागवत को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाती तो एक स्वर में ये आवाजें उठने लगतीं कि देश का भगवाकरण किया जा रहा है लेकिन कोविंद को राष्ट्रपति बनाने से ऐसे सवाल ही खड़े नही हो रहे, जबकि कोविंद भी भागवत का ही दूसरा रूप हैं। हालांकि रामनाथ कोविंद दलित के रुप में संघी मानसिकता वाले हैं लेकिन कोविंद के पक्ष में माहौल बनाने की जरूरत ही नही है, अगर यहीं नाम मोहन भागवत का उठता तो दस सवाल खड़े होते, इसलिए देश के सामने ऐसा चेहरा लाकर खड़ा कर दिया गया जिस पर विपक्ष भी सवाल खड़े नही कर पा रहा।कोविंद जी हैं तो क्या हुआ, काम तो वो भागवत वाला ही करने वाले हैं। और भाजपा को अपने ऐजेंडे से मतलब है किसी नाम या चेहरे से नही। हालांकि 80 प्रतिशत लोगों को तो रामनाथ कोविंद के नाम की घोषणा के बाद ही पता चला होगा कि वो दलित समुदाय से आते हैं, क्योंकि वो कभी दलितों की आवाज़ बन ही नही पाए, और इसीलिए दलितों के बीच में पहचान भी नही बना पाए। ऐसे में कोविंद जी को भी बीजेपी की साजिश को समझना चाहिए कि वो आने वाले समय में उनसे बाबा साहब के संविधान में क्या-क्या दखलंदाजी करवा सकती है और उनका वो समाज जिसके नाम पर वो देश के प्रथम नागरिक बनने जा रहे हैं वो कितनी खराब स्थिति में आ सकता है।


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