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भाजपा और आरएसएस की बाबा साहेब अम्बेडकर को ईश्वरवादी ठहराने की नापाक कोशिश

13.01.2018 : उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कहते है, “ जिग्नेश मेवाणी या सहारनपुर का रावण उनके लिए कोई मुद्दा नहीं हैं। वो दलित-मुस्लिम एकता को भी महत्त्व नहीं देते। वो इसे कोरी कल्पना और राजनीतिक स्टंट मानते हैं। वो एक ऐसे विराट हिन्दू धर्म की बात करते हैं जिसमें जाति की कोई भूमिका नहीं होगी। वो मानते हैं कि दलितों के बिना हिन्दुत्व का कोई आधार नहीं।”  अब उनके इस बयान का क्या अर्थ निकाला जाए? क्या यह कि हिन्दू-धर्म में किसी जाति विहीन समाज की कोई जगह नहीं है। जब हिन्दुत्व का आधार ही दलित हैं तो जाति-प्रथा का विनाश कैसे संभव है? 

हैरत की बात तो ये है कि योगी जी का मानना है कि ईश्वर के अलावा कोई भी श्रेष्ठ नहीं। वो अपनी इस बात के समर्थन में बाबा साहेब अम्बेडकर को भी अपने पाले में खींचने का प्रयास करते हैं। कहते हैं, “ अम्बेडकर ने भी यह बात मानी और इसलिए उन्होंने भारत के भीतर जन्मी उपासना विधि को स्वीकार किया। किसी विदेशी विधि को उन्होंने मान्यता नहीं दी।”  योगी जी के इस कथन से ये तो सिद्ध हो ही जाता है कि उन्होंने बाबा साहेब अम्बेडरकर को न पढ़ा और न जाना है।

2016 में उत्तरप्रदेश के पीलीभीत में ब्राहमण चेतना मंच के कार्यक्रम में भाजपा के राज्यसभा सांसद शिव प्रताप शुक्ल ने अपने संबोधन में कहा, “बाबा साहेब अंबेडकर दलित नहीं थे, वो सनाड्य ब्राह्मण थे। वो पंडित दीनदयाल उपाध्याय से प्रेरित थे, उन्होंने लोगों को ऊपर उठाने का काम किया, इसलिए उन्होंने संविधान लिखा। उनका नाम अंबेडकर नहीं था उनका नाम था भीमराव, लेकिन अब उन्हें बाबा साहब अंबेडकर कहा जाता है।” बीजेपी के राज्यसभा सांसद शिव प्रताप शुक्ल का यह बयान यूँ ही नहीं आया होगा अपितु इस बयान के पीछे बाबा साहेब के ब्राह्मणीकरण की बू आती है।

उन्होंने बसपा का नाम लिए बिना निशाना साधते हुए आगे कहा कि इस देश में ब्राह्मणों ने इतिहास रचा था, लेकिन आज यहां अम्बेडकर के नाम पर राजनीति होती है। जरा भी कुछ हो जाता है तो दंगे शुरू हो जाते हैं। लेकिन अंबेडकर का नाम भीमराव न कहकर बाबा साहब अंबेडकर कहने वाले लोगों से पूछना चाहता हूं कि भीमराव को उनकी प्राथमिक शिक्षा दिलाने का काम किसने किया था, उन्हें यूरोप में शिक्षा दिलाने का काम किसने किया था। भीमराव अपने नाम के आगे अंबेडकर की उपाधि लगाए थे, यह उनका नाम नहीं था।..... सांसद शिव प्रताप शुक्ल के इस बयान से स्पष्ट हो जाता है कि उनको बाबा साहेब के जीवन के बारे में कुछ भी पता नहीं है। जब उन्हें इतना ही पता नहीं है कि बाबा साहेब की प्राथमिक और उच्च शिक्षा दिलाने के पीछे कौन-कौन लोग रहे तो उन्हें और क्या पता होगा। उनका यह बयान हवा में पत्थर उछालने जैसा ही है। बिना सिर-पैर की बयानबाजी करना ही ब्राह्मण की सबसे बड़ी खूबी है जिसके जाल में अज्ञानी लोग आराम से फंस जाते हैं। 

आरएसएस और अब उसके द्वारा पोषित भाजपा का यह कोई पहला अवसर नहीं है कि जब उसने किसी न किसी के जरिए बाबा साहेब को अपने पाले में करने और अनुसूचित जातियों में फूट डालने का प्रयास किया है। इससे पूर्व भी ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’  परिवार पहले भी ऐसे कार्य कर चुका है। संघ के झन्डेवालान द्वारा प्रकाशित  डा. कृष्ण गोपाल द्वारा लिखित पुस्तक “ राष्ट्र पुरूष : बाबा साहब डा. भीमराव अम्बेडकर” में अनेक ऐसे झूठे प्रसंग है। जिनके कोई हाथ-पैर तो क्या कोई जमीन तक भी नहीं है। इन प्रसंगों के जरिए बाबा साहब को पूरा-का-पूरा सनातनी नेता, गीता का संरक्षक, यज्ञोपवीत कर्त्ता, महारों को जनेऊ धारण कराने वाले के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो बाबा साहब के प्रारंम्भिक जीवन काल के हैं। दुख तो ये है कि संदर्भित पुस्तक के रचियता ने 1929 और 1949 के बीच के वर्षों पर कोई चर्चा नहीं की है जबकि बाबा साहब का मुख्य कार्यकारी दौर वही था। पुस्तक के लेखक ने सबसे ज्यादा जोर बाबा साहब को मुस्लिम विरोधी सिद्ध करने पर लगाया है जो दुराग्रह पूर्ण कार्य है। इस पंक्ति का लिखना-भर ही सीधे-सीधे बाबा साहेब का अपमान करना है, और कुछ नहीं। इन पंक्तियों में पूरा का पूरा मनुवाद भरा पड़ा है। 

योगी जी और आरएसएस के प्रवक्ताओं को इतना भान तो होना ही चाहिए कि यदि बाबा साहेब अम्बेडकर ईश्वरवाद में यकीन रखते तो क्यों तो वो “मनुस्मृति” का दहन करते और क्यों हिन्दू धर्म का त्याग करके बुद्ध धम्म की शरण में गए होते। बुद्ध-धम्म की दीक्षा लेते समय बाबा साहेब ने दलितों को जो 22 प्रतिज्ञाएं लेने की वकालत की थी कि बाबा साहेब की हिन्दूओं द्वारा पोषित तथाकथित ईश्वर में कोई आस्था नहीं थी।  यह भाजपा और आरएसएस की बाबा साहेब अम्बेडकर को  ईश्वरवादी ठहराने की नापाक कोशिश ही कही जाएगी... और कुछ नहीं।

स्मरण रहे कि डा बी.आर. अम्बेडकर ने दीक्षा भूमि, नागपुर, भारत में ऐतिहासिक बौद्ध धम्म में परिवर्तन के अवसर पर, 15 अक्टूबर 1956 को अपने अनुयायियों के लिए 22 प्रतिज्ञाएँ निर्धारित कीं थीं। आठ लाख लोगों का बौद्ध धर्म को स्वीकार करना निसंदेह ऐतिहासिक था क्योंकि यह विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक परिवर्तन था। उन्होंने इन शपथों को निर्धारित किया ताकि हिंदू धर्म के बंधनों को पूरी तरह पृथक किया जा सके। ये 22 प्रतिज्ञाएँ हिंदू मान्यताओं और पद्धतियों की जड़ों पर गहरा आघात करती हैं। ये एक सेतु के रूप में बौद्ध-धम्म की हिन्दू धर्म में व्याप्त भ्रम और विरोधाभासों से रक्षा करने में सहायक हो सकती हैं। इन प्रतिज्ञाओं से हिन्दू धर्म, जिसमें केवल हिंदुओं की ऊंची जातियों के संवर्धन के लिए मार्ग प्रशस्त किया गया, में व्याप्त अंधविश्वासों, व्यर्थ और अर्थहीन रस्मों, से धर्मान्तरित होते समय स्वतंत्र रहा जा सकता है। उनमें से कुछेक यहाँ दी जा रही हैं:- 

मैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कोई विश्वास नहीं करूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा;
मैं राम और कृष्ण, जो भगवान के अवतार माने जाते हैं, में कोई आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा;
मैं गौरी, गणपति और हिन्दुओं के अन्य देवी-देवताओं में आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा;
मैं भगवान के अवतार में विश्वास नहीं करूँगा;
मैं यह नहीं मानता और न कभी मानूंगा कि भगवान बुद्ध विष्णु के अवतार थे. मैं इसे पागलपन और झूठा प्रचार-प्रसार मानता हूँ
मैं श्रद्धा (श्राद्ध) में भाग नहीं लूँगा और न ही पिंड-दान करूंगा;
मैं ब्राह्मणों द्वारा निष्पादित होने वाले किसी भी समारोह को स्वीकार नहीं करूँगा;
मैं बुद्ध के सिद्धांतों और उपदेशों का उल्लंघन करने वाले तरीके से कार्य नहीं करूँगा;
मैं बुद्ध द्वारा निर्धारित परमितों का पालन करूँगा;
मैं बुद्ध के आष्टांगिक मार्ग का अनुशरण करूँगा;
मैं मनुष्य की समानता में विश्वास करूंगा;
मैं सभी जीवित प्राणियों के प्रति दया और प्यार भरी दयालुता रखूँगा तथा उनकी रक्षा करूँगा।
मैं हिंदू धर्म का त्याग करता हूँ जो मानवता के लिए हानिकारक है और उन्नति और मानवता के विकास में बाधक है क्योंकि यह असमानता पर आधारित है, और स्व-धर्मं के रूप में बौद्ध धर्म को अपनाता हूँ।
मैं दृढ़ता के साथ यह विश्वास करता हूँ की बुद्ध का धम्म ही सच्चा धर्म है।

अब ये सवाल उठता है कि य्थोक्त तथ्यों के इतर किस आधार पर ये योगी जैसे आरएसएस के लोग बाबा साहेब अम्बेडकर को बार-बार ब्राह्मण ठहराने की मिथ्या कोशिश क्यों करते रहते हैं। इनको याद रखना होगा कि आज का दलित समाज इनकी चिकनी-चुपड़ी बातों के जरिए अब बहकावे में नहीं आने वाला। 

लेखक:  तेजपाल सिंह तेज (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हैं- दृष्टिकोण, ट्रैफिक जाम है, गुजरा हूँ जिधर से आदि ( गजल संग्रह), बेताल दृष्टि, पुश्तैनी पीड़ा आदि (कविता संग्रह), रुन-झुन, खेल-खेल में आदि ( बालगीत), कहाँ गई वो दिल्ली वाली ( शब्द चित्र), दो निबन्ध संग्रह  और अन्य। तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ग्रीन सत्ता के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका अपेक्षा के उपसंपादक, आजीवक विजन के प्रधान संपादक तथा अधिकार दर्पण नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं। स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं। हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं।


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