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दलितों के बाल नहीं काटने देते गांव के स्वर्ण, नाईयों की कई दुकानें जबरन कराई बंद

कर्नाटक के मंचनबले गांव के नागराज जो दलित समुदाय से संबंध रखते हैं उनको हजामत करवाने के लिए हर बार नजदीकी शहर चिक्कबल्लापुर जाना पड़ता है। इसका रौंगटे खड़े कर देने वाला कारण यह है कि उनके गांव में नाई की तीनों दुकानें दलितों की हजामत करने को लेकर पैदा हुए विवाद के कारण एक वर्ष से भी अधिक समय से बंद पड़ी हैं। चार हजार से अधिक आबादी वाले इस गांव के कम से कम 600 दलितों ने उच्च जातियों के लोगों पर आरोप लगाया है कि वे उनके साथ जाति के आधार पर भेदभाव करते हैं और स्थानीय नाई की दुकानों में उन्हें हजामत नहीं करवाने दी जाती। कुछ दलित युवकों ने इस पर एतराज उठाया लेकिन उच्च जाति वाले दृढ़ता से अपने पैंतरे पर डटे रहे और नाइयों को दलितों के बाल काटने की अनुमति देने की बजाय उच्च जातियों के चौधरियों ने नाई की दुकानें ही बंद करवा दीं और अगस्त 2015 से लेकर आज तक ये दुकानें बंद हैं। शांति स्थापित करने के लिए कई बार बैठकें की गई लेकिन वे भी बेनतीजा ही रहीं हैं। एक दलित युवक प्रकाश ने शिकायत की कि 2015 से अब तक बैठकें होती आ रही हैं। कई बार इन मीटिंगों में डिप्टी कमिशनर भी उपस्थित रहे हैं लेकिन अधिकारी के गांव से विदा होते ही पुरानी परिपाटी फिर से स्थापित हो जाती है। उच्च जातियों के सदस्यों का कहना है कि भेदभाव के आरोप निर्मूल हैं और कुछ दलित युवकों ने ही यह आरोप गढ़ा है। गांव में वर्चस्व रखने वाले वोकालिगा समुदाय से संबंधित देवराज का कहना है कि वास्तव में गांव सामुदायिक सौहार्द की एक मिसाल प्रस्तुत करता है क्योंकि यहां किसी को भी सामाजिक बहिष्कार का सामना नहीं करना पड़ता। सारे दलित किसी भी स्कूल में पढऩे और किसी भी होटल या रेहड़ी पर खाना खाने के लिए स्वतंत्र हैं। इसी कारण गांव का सरपंच भी एक दलित है। इन सब बातों के बावजूद दलित युवक लगातार भेदभाव होने की शिकायत करते हैं। प्रकाश का कहना है: ‘‘हम तंग आ चुके हैं और इसलिए हमने यह सवाल खड़ा किया कि हमारे साथ समानता भरा व्यवहार किया जाए।’’ गांव को इस परिपाटी से मुक्त करवाने के प्रयास में प्रकाश और उनके दोस्तों को इतना विरोध बर्दाश्त करना पड़ा जिसकी उन्होंने सपने में भी कल्पना नहीं की थी। प्रकाश ने तो यहां तक शिकायत की कि : ‘‘बिरादरी के बुजुर्ग भी हमारा साथ देने से इंकार कर गए।’’ गांव के नाई भी उनसे कट चुके हैं क्योंकि उनकी शिकायत है कि इन दलित युवकों के कारण ही उनका धंधा चौपट हुआ है। गांव में हजामत का खोखा चला रहे वैंकटेश मंचनबले ने कहा: ‘‘मुझे वह दिन अच्छी तरह याद है जब मैं बेंगलूर गया हुआ था और वापस लौटने पर पुलिस मेरा इंतजार कर रही थी। उन्होंने मुझ पर आरोप लगाया था कि मेरे कारण दलितों की हजामत नहीं हो रही और इसलिए मुझ पर एस.सी./एस.टी. (उत्पीडऩ रोध) अधिनियम के अंतर्गत आरोप तय किया जाएगा। मैं जेल से बचने के लिए भूमिगत हो गया और अपना खोखा  बंद करने का फैसला लिया।’’

जिला उपायुक्त दीप्ति कनाडे को उम्मीद है कि वह जल्दी ही इस मामले में पैदा हुआ अवरोध समाप्त कर लेंगी। एक समाधान की उन्होंने योजना बनाई है कि उन स्थानीय युवकों को चिन्हित किया जाए जो नाई के नए खोखे शुरू करने में रुचि लेते हैं। दीप्ति ने कहा: ‘‘हम उन्हें हजामत का काम करने के लिए मूलभूत किट उपलब्ध करवाएंगे और साथ ही यह हिदायत देंगे कि किसी के साथ भी भेदभाव न बरता जाए।’’ स्थानीय विधायक के. सुधाकर ने कहा  ‘‘ऐसा होना दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन इस प्रकार के भेदभाव हर जगह मौजूद हैं।’’  

मुख्य संवाददाता
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