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साहित्यकारों और चिंतकों को पिछ्लग्गू ना समझे दलित नेता- डॉ. जय प्रकाश कर्दम

डॉ. जयप्रकाश कर्दम किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं, हिन्दी साहित्य में उनका काम ही उनकी पहचान है...इन्होंने हिन्दी साहित्य की हर विधा को अपने लेखन से सृजित किया है । विशेषकर हिन्दी में दलित साहित्य को स्थापित करने में इनकी अहम भूमिका रही है । डॉ. कर्दम ने गरीबी का दंश झेलते हुए वो मुकाम हासिल किया है, जो अपने आप में एक मिसाल है । वैसे तो डॉ. कर्दम विभिन्न सरकारी/ गैर सरकारी, सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किए जा चुके हैं, लेकिन हाल ही में इन्हें दो बड़ी सरकारी संस्थाओं से सम्मानित होने का सौभाग्य मिला है, जिनमें पहला पुस्कार उस वक्त राष्ट्रपति रहे प्रणब मुखर्जी ने इन्हें केंद्रीय हिन्दी संस्थान के  ‘महापंडित राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार’ से नवाज़ा और दूसरा पुरस्कार हिन्दी अकादमी दिल्ली के सम्मान-अर्पण समारोह में ‘विशिष्ट योगदान सम्मान’ दिया गया । डॉ. कर्दम की इस उपलब्धि पर पड़ताल की टीम ने की उनसे हर पहलू पर बातचीत । 

डॉ. कर्दम जी सबसे पहले आपको हिन्दी की सेवा के लिए  ‘महापंडित राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार’ और ‘विशिष्ट योगदान सम्मान’ से सम्मानित किए जाने पर बहुत-बहुत बधाई ।  वैसे तो आपने हिन्दी साहित्य की हर विधा में सृजन किया है, लेकिन आप सबसे ज्यादा लिखना किस विधा में पसंद करते हैं ?      
जी बधाई के लिए आपका धन्यवाद । मैं सभी विधाओं में मैं लिखता रहा हूं, लेकिन कहानी और उपन्यास लिखना मुझे बेहद पसंद हैं, मुझे लगता है कि उपन्यास  में बहुत गुंजाइश होती है कि एक या ज्यादा समस्याओं को आप एक साथ उठा सकते हैं और उनकी गहराई तक जा सकते हैं, लेकिन कहानी और कविता में आप उस गहराई तक नहीं जा सकते, लेकिन मैं समय के अभाव के चलते फिलहाल उपन्यास नहीं लिख पा रहा हूं ।

 क्या दलितों द्वारा लिखे गए साहित्य को कमतर आंका जाता है ?      
जो लोग ऐसा सोचते हैं मुझे लगता है, उन्हें साहित्य की समझ नहीं है । साहित्य का काम सिर्फ दर्पण दिखाना भर नहीं होता, साहित्य का काम राह दिखाना भी होता है और समाधान दिखाना भी होता है । 

दलित साहित्य के क्या मायने हैं
? और दलित साहित्य किसे कहा जाना चाहिए ?      
दलित साहित्य एक वेदना का सृजन है, जिसमें भोगा हुआ सच साहित्य के रूप में सामने आता है । साहित्य विभिन्न भाषाओं में लिखा जाता है । हिन्दी साहित्य की जो परंपरा है, जिसमें दलित, उपेक्षित या वंचित वर्ग की समस्या जीजीवीषा या उनका संघर्ष लिखा जाता है । ज्यादातर साहित्य में दलित की उपस्थिति नायक के रूप में तो दूर की बात है पात्र के रूप में भी नहीं है, और कभी आए भी हैं तो उन्हें एक मूल कथा को आगे बढ़ाने के लिए लाया गया है, जैसे अगर हमें किसी ठाकुर की कहानी कहनी है तो उसमें दलित वर्ग का पात्र आएगा ही । किसी ब्राह्मण नायक को उभारना है तो वो तभी उभरेगा जब दूसरी चीजें भी आएंगी । किसी गांव का विवरण देना है तो गांव के दूसरे छोर पर रहने वालें भी आएंगे ही । अभी तक दलित केवल उस रूप में ही आए हैं । असल में होना ये चाहिए कि दलित क्या सोचता है ? क्या वो  शोषित रहना चाहता है ? क्या वो इससे मुक्ति नहीं चाहता ? क्या वो आर्थिक विपन्नता से निकलना नहीं चाहता ? ये सवाल कहीं नहीं दिखाई देते हैं । इसलिए जब दलितों में साहित्यकार हुए तो उन्होंने अपनी वेदनाओं को संवेदनाओं को खुद स्वर देना शुरू किया, उसमें जो अभिव्यक्ति का स्वर है वो दलित साहित्य है, दलित समाज में पैदा हुए व्यक्ति का लिखा हुआ ही दलित साहित्य नहीं हैं, बल्कि दलितों द्वारा दलित चेतना के लिए लिखे हुए को ही दलित साहित्य कहेंगे ।   

लेकिन प्रेमचंद से लेकर और तमाम साहित्याकार हैं, जिन्होंने बेशक दलितों को सिर्फ पात्र ही बनाया है, और उन्हें ख्याति भी उसी पात्र के बल पर मिली है। वहीं दलित साहित्याकारों द्वारा जो भोगा गया और लिखा गया, उसे वो पहचान नहीं मिल पा रही है ?
   
मुझे लगता है कि मूल्यांकन का आधार गलत है, जो लिखा गया है वो बहुत ज्यादा नहीं है अभी तक बहुत कम लिखा गया है । उदाहरण के लिए प्रेमचंद ने करीब 200 कहानी लिखी, लेकिन 5-6 कहानी हैं, जो दलितों से जुड़ी हैं, प्रेमचंद के सिर्फ 2-3 उपन्यास हैं, जिनमें दलित पात्र लिए गए हैं ।  प्रेमचंद हो या निराला वो अपने लेखन में केवल ब्राह्मणवाद का समर्थन ही कर रहे हैं, वे वर्ण व्यवस्था का सीधे-सीधे खंडन नहीं कर पाए । जब तक उन चीजों का खंडन नहीं किया जाएगा, उनको महत्व नहीं दिया जाएगा, तब तक उस समाज की अस्मिता और मानवीय मूल्य कैसे स्थापित होंगे । उनके लेखन में पात्र को जाति के रूप में पहचाना जा रहा है, अगर वो ऐसा नहीं लिखते तो शायद दलितों को लिखने की जरूरत नहीं पड़ती ।  

क्या आपको लगता है कि साहित्य के क्षेत्र में जो पुरस्कार दिए जाते हैं , उनमें दलितों की उपेक्षा की जाती है ?
     
मेरा मानना है कि निजी संस्थाओं द्वारा किसे पुरस्कार दिए जा रहे हैं, उससे हमें कोई मतलब नहीं है, लेकिन सरकारी विभागों और संस्थाओं द्वारा जो पुरस्कार दिए जा रहे हैं, उनमें आनुपातिक रूप से दलित साहित्यकारों की भी हिस्सेदारी तय होनी चाहिए ।

दलित साहित्यकारों में एकजुटता की कमी दिखाई देती है, ऐसा क्यों ?      
अभी दलित साहित्य का दौर बहुत छोटा है । 80 के दशक से शुरुआत हुई है दलित साहित्य की, दलित साहित्यकारों के बीच कोई विघटन नहीं है । ये कुछ व्यक्तियों की चाहत हो सकती है कि उसको जहां से फायदा होता है, वहां से वो समझौता करते हैं । जहां विचार होगा वहां वैचारिक मतभेद भी होगा । दलितों में भी कुछ ऐसा ही है और ये विभिन्नता दलित साहित्य के लिए शुभ साबित होगी । 

दलित साहित्य के क्षेत्र में युवाओं को बढ़ावा देने के लिए प्रशिक्षण शिविर/कार्यशालाओं का आयोजन क्यों नहीं होता
 ?      
मुझे बहुत खेद है कि इस तरह के मुकम्मल प्रयास नहीं किए गए ।  हमारे यहां साहित्यिक संस्थाएं बनी हैं । साहित्य अकादमी बनी हैं और लेखक संघ भी बने हैं । उन्होंने कुछ किताबों का प्रकाशन किया है।  गोष्ठियां आयोजित की, सेमीनार किए, लेकिन नए लेखक पैदा करने के लिए जो कार्यशालाएं आयोजित होनी चाहिए थी, वो नहीं हो पाईं ।  हमें कहानी, कविता, नाटक की कार्यशालाओं का आयोजन करना चाहिए । औरों के बारे में तो मैं नहीं कह सकता, लेकिन 1999 से मैंने नए लेखकों को प्रोत्साहन देने के लिए ‘दलित साहित्य वार्षिकी’ मंच का इस्तेमाल किया और हर अंक में करीब 20-22 नए दलित लेखकों को मौका देता आ रहा हूं । उनमें से आज कई प्रतिष्ठित लेखक बन गए हैं और आगे चलकर और भी बड़े बनेंगे, लेकिन ये काम व्यापक रूप से किए जाने की जरूरत है ।

क्या दलित लेखक के रूप में कभी आपको भेदभाव का दंश झेलना पड़ा ?
 
मैंने 1976 से लिखना शुरू किया था और मैंने कभी अपनी रचनाएं इस रूप में नहीं भेजी कि मैं दलित हूं, इसीलिए मेरी रचनाएं छपनी चाहिएं । अगर वे नहीं छपी तो मैंने हमेशा यही सोचा कि मेरे लेखन में कुछ कमी रही होगी । मुझे ऐसा नहीं लगता कि दलित होने के नाते कभी मेरे साथ पक्षपात हुआ हो ।

आपका उपन्यास
 ‘छप्पर’ बहुत चर्चित रहा, जिसने आपको खासी पहचान दिलाई ?     
मुझे खुशी है कि ‘छप्पर’ उपन्यास को सिर्फ दलित साहित्य तक ही सीमित नहीं रखा गया है, उसका कई भाषाओं में इसका अनुवाद भी हुआ है, और कई विश्वविद्यालयों में पाठयक्रम के रूप में पढ़ाया भई जा रहा है । यही नहीं चीन के एक विश्वविद्यालय में भी इसे पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है । 

आप भारत सरकार के गृह मंत्रालय में केंद्रीय हिन्दी प्रशिक्षण संस्थान में निदेशक के पद पर कार्यरत हैं और इतने व्यस्त होने के बाद भी आप साहित्य सृजन में लगे रहते हैं । आने वाले दिनों में पाठकों को क्या नया पढ़ने को मिलेगा ?      
जी ये बात तो सही है कि नौकरी और अहम पद पर होने की अपनी जिम्मेदारियां होती हैं, लेकिन साहित्य से मेरा शुरू से ही लगाव रहा है । शायद इसलिए ऑफिस के बाद मैं साहित्य के लिए समय निकाल ही लेता हूं । मेरा परिवार भी ध्न्यवाद का पात्र है, जिनके कारण मैं ये सब कर पा रहा हूं । मैं अभी 3 उपन्यासों पर काम कर रहा हूं । साथ ही अपनी आत्मकथा लिख रहा हूं और एक किताब नीग्रो का अनुवाद भी कर रहा हूं ।

आपका बचपन और युवा जीवन बहुत कठिन दौर से गुजरा है
, जिसे आपने संघर्ष और मेहनत के बल पर आसान बना दिया ?    
मैं आर्थिक रूप से बहुत विपरीत परिस्थितियों में रहा । मेरे पिताजी टीबी की बीमारी से पीड़ित थे । वो घोड़ा तांगा चलाते थे, लेकिन आखिरी समय में वो भी नहीं चला पाते थे और मैं ही घोड़ा तांगा चलाने जाता था ।  बाद में  घोड़ा तांगा भी बिक गया । मैं 7 भाई-बहनों में सबसे बड़ा था, स्कूल ना जाकर मजदूरी करने जाता था । स्टील फैक्ट्री में काम किया । वकील का मुंशी रहा, लेकिन जब भी समय मिलता बस पढ़ता था ।  मुझे सिर्फ ये बात समझ में आ गई थी कि बेशक मेरे पास कुछ नहीं है, लेकिन जो मेरे पास 24 घंटे का समय है, वो मेरे पास किसी से कम नहीं है और इस मामले में मैं किसी से भी कम नहीं हूं । मैंने 1-1 मिनट का सदुपयोग किया । शौच करते समय भी किताब मेरे हाथ में रहती थी । खाते समय भी पढ़ता रहता था ।  मेरा कभी कोई शौक नहीं रहा, बस पढ़ना ही शौक रहा है । 

साहित्यकार के रूप में दलित युवाओं को क्या संदेश देना चाहेंगे
 ?      
मैं युवाओं से कहना चाहूंगा कि वो खूब पढ़े और सिर्फ पढ़े और उसके बाद गोष्ठियों और सेमीनारों में जाकर लोगों को सुनें क्योंकि जितना ज्यादा पढ़ेंगे और सुनेंगे उनका लेखन उतना ही अच्छा होगा । अपने आसपास की दुनिया के अनुभवों को महसूस करें और लिखें, काल्पनिकता पर ना जाएं ।  

एक साहित्यकार के रूप में आप राजनीति और दलित नेताओं को लेकर क्या कहेंगें ?      
मुझे राजनीति को लेकर बहुत निराशा होती है, क्योंकि राजनीति ये सोचती है कि साहित्य को उसका पिछलग्गू होना चाहिए । वह साहित्य का कोई मूल्य नहीं समझती है । जबकि साहित्यकार समाज की नब्ज़ पहचानता है वो एक चिंतक भी होता है, वो स्वतंत्र चिंतन करता है । साहित्यकार राजनीति को एक समझ दे सकता है, उसे समय पर आने वाले खतरों के बारे में सतर्क कर सकता है । मूल्यों के प्रति सचेत कर सकता है । राजनीति को समाज के साथ कैसे जुड़ना चाहिए, साहित्याकार उसकी भी आधार भूमि तैयार कर सकता है । प्रेमचंद ने भी कहा है कि ‘साहित्य कोई राजनीति के पीछे चलने वाली चीज नहीं होती, ये राजनीति के आगे चलने वाली मशाल होती है’ । इसीलिए  यदि दलित राजनेता इस बात को समझेंगे और साहित्य और साहित्याकारों को महत्व देंगे तो दलित राजनीति बहुत आगे जा सकती है ।

जातीय आधार पर खंड-खंड में विभाजित भारतीय समाज से कैसे टूटेगी जाति
 ?    
जब तक जाति रहेगी तब तक समानता नहीं आ सकती, क्योंकि जाति अपने आप में एक असामनता है ।  इसीलिए जब तक जाति रहेगी, समानता नहीं आ सकती ।  जातिवाद पर प्रहार होना चाहिए ।  युवाओं को आगे आकर प्रेम विवाह करके जाति की दीवारों को तोड़ना चाहिए, तभी टूटेगी जाति । 

दलित समाज को आर्थिक रूप से मजबूत बनने के लिए क्या करना चाहिए
 ?      
आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए दलितों को नौकरी के अलावा व्यापार की तरफ भी बढ़ना चाहिए । मजदूरी ना करें, बेशक छोटा-मोटा काम ही करें । 

सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के बारे क्या सोचते हैं
 ?      
वर्तमान समय में समय सोशल मीडिया अपना वर्चस्व दिखा रहा है और आने वाला समय भी सोशल मीडिया का ही होगा ।  ये किसी से छिपा नहीं है कि मीडिया में ईमानदारी खत्म हो रही है और वहां पत्रकारिता पूर्वाग्रह पर आधारित हो गई है । वहां दलितों को अपनी जरूरत के हिसाब से जगह है दी जाती हैं, इसलिए दलितों को ज्यादा से ज्यादा वेब पोर्टल और वेब चैनल में भागीदार होना चाहिए ।

सोशल मीडिया के क्षेत्र में
 ‘पड़ताल’ ने कदम रखा है, आप क्या संदेश देना चाहेंगे ?   
मेरी तऱफ से न्यूज़ पोर्टल Padtal.com को बहुत-बहुत शुभकामनाएं । मैं उम्मीद करता हूं कि मीडिया के क्षेत्र में ‘पड़ताल’ एक नया मुकाम हासिल करेगी । मेरा कहना है कि ‘पड़ताल’ की टीम ग्राउंड लेवल पर जाकर जनमानस से जुड़े मुद्दे उठाएं और उनकी आवाज़ बने ।    


******************डॉ. जय प्रकाश कर्दम जी का जीवन परिचय ***************** 
 
जन्म-  5 जुलाई, 1958 जन्म स्थान-  ग्राम इन्दरगढ़ी, हापुड़ रोड, जिला- गाजियाबाद (उ.प्र.) 

शिक्षा-  एम.ए. (दर्शनशास्तर, हिन्दी, इतिहास), पी.एचडी (हिन्दी साहित्य) 

रचनाएं-  छप्पर (उपन्यास), करुणा (उपन्यास) श्मशान का रहस्य (बाल उपन्यास), गूंगा नहीं था मैं (कविता संग्रह), नो बार, कामरेड का घर, लाठी, पगड़ी,  मजदूर खाता (कहानी) समेत  खण्डकाव्य, आलोचना, निबंध, यात्रा-संस्मरण और बाल साहित्य पर करीब 30 से ज़्यादा पुस्तकें प्रकाशित 

अनुवाद- ‘दि चमार्स’ का अंग्रेजी से हन्दी में अनुवाद ।

संपादन-  दलित साहित्य (वार्षिकी का 1999 से लगातर संपादन) 

पुरस्कार/सम्मान-    विभिन्न सरकारी/ गैर सरकारी, सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित 

संप्रति-  निदेशक, केंद्रीय हिन्दी प्रशिक्षण संस्थान, राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय,भारत सरकार, नई दिल्ली । 

वर्तमान पता-  बी-634, डी.डी.ए. (एम.आई.जी.) फ्लैट्स, चित्रकूट कॉलोनी, ईस्ट ऑफ लोनी रोड,  शाहदरा, दिल्ली- 110093 

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