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क्या खूब है मद्रास हाई कोर्ट का निर्णय- ' हाथ से मैला उठाने से इंकार करने पर लगाया 25,000 का जुर्माना '

इनखबार टीम (01.03.2018) के अनुसार मद्रास हाईकोर्ट ने एक अजीब फैसला सुनाया है. एक दलित दंपत्ति ने बतौर मैनूअल स्कैवैन्जर्स (मैला ढोना) काम करने से मना किया तो मद्रास हाईकोर्ट ने उन पर 25,000 रुपये का जुर्माना लगा दिया. दंपत्ति का कहना है कि कोर्ट ने हमारी एक भी दलील नहीं सुनी. उन्होंने बताया कि आज भी हम बदहाल/गुमनाम जिंदगी जी रहे हैं क्योंकि मैनूअल स्कैवैन्जर्स (मैला ढोना) काम करने से मना कर देने पर हमें जान की धमकियां मिल रही है. हमारे बच्चे स्कूल नहीं जा रहे क्योंकि हमारे पास बच्चों के शिक्षा-दीक्षा के लिए पर्याप्त रुपये ही उपलब्ध नहीं हैं.

मद्रास हाईकोर्ट ने आदेश दिया है, ‘यदि किसी को स्वीपर/स्कैवेंजर को काम करने का काम दिया जाता है, उन्हें टॉयलेट भी साफ करना पड़ेगा क्योंकि उनकी नियुक्ति स्वीपर/स्कैवेंजर जैसा काम करने के लिए पैसा दिया जाता है. कोर्ट ने यह दलील दी कि जैसे किसी घरेलू नौकरानी को पूरे परिवार के कपड़े भी धोने होते हैं, जिसके लिए उन्हें पैसा दिया जाता है. ठीक उसी तरह स्वीपर यह शिकायत नहीं कर सकता कि उन्हें टॉयलेट साफ करने के लिए बाध्य किया जा रहा है. क्योंकि उसकी नित्युक्ति ही मैला उठाने के लिए की गई है.’  

कोर्ट के इस आदेश में जिस बात की अनदेखी की गई है वह मैला उठाने के साधन की, ऐसा लगता है. क्योंकि स्वीपर/स्कैवेंजर को काम करने वाल्रे दम्पति ने मैला उठाने के लिए शायद मना नहीं किया अपितु खुले हाथों से मैला उठाने के लिए मना किया है. आज के युग में जब हर काम करने के लिए नए-नए उपकरण काम में लाए जाने लगे हैं तो फिर मैला उठाने के लिए मैला खुले हाथों से उठाने की बाध्यता क्यों? कोर्ट को इस बात पर भी गौर करना चाहिए था. टीम के अनुसार पूरा मामला कुछ इस प्रकार है कि अगस्त 2017 में एक वीडियो वायरल हुआ था. अन्ना यूनिवर्सिटी के एक कर्मचारी ने कहा था कि डीन चित्रा सेल्वी जबरन कर्मचारियों से बिना किसी सुरक्षा उपकरण के मैला ढोने का दबाव डालती हैं. इसके अलावा वह अपने घर के निजी काम (जिसमें अपने और पति के अंडरवेयर और घर के टॉयलेट्स शामिल थे) भी साफ करवाती थी. चित्रा अपने पति से उनका यौन शोषण भी कराती थीं. यह वीडियो भारती नाम की एक एक्टिविस्ट ने बनाई थी, जिन्हें धमकी के बाद तमिलनाडु छोड़ना पड़ा. इसके अलावा उन पर पालर समुदाय के खिलाफ होने का आरोप भी लगाया, जिससे चित्रा ताल्लुक रखती हैं.

इस दंपति को कॉलेज में स्वीपर की नौकरी मिली थी और ये कॉन्ट्रैक्ट पर थे. 15 सफाई कर्मचारी भी इस दंपति के साथ कलेक्टर के आफिस गए थे, लेकिन बाद में उन्होंने शिकायत को वापस ले लिया. कर्मचारियों ने एक माफीनामा लिखा और वापस कॉलेज काम करने चले गए, लेकिन इस दंपति ने बिना किन्ही सुरक्षा उपकरणों के खुले हाथों से मैला उठाने के काम करने से इनकार कर दिया.

किसी मनुष्य द्वारा त्याग किए गए मलमूत्र की साफ-सफाई के लिए व्यक्ति विशेष को नियुक्त करने की व्यवस्था सर्वथा अमानवीय है. और इस कुप्रथा को समाप्त करने के लिए महात्मा गांधी समेत तमाम महापुरुषों ने समय-समय पर प्रयास किए तथापि यह व्यवस्था न सिर्फ निजी बल्कि सरकारी प्रतिष्ठानों में भी अपनी जड़ें जमाए रही. दूर देश के गावों में आज भी यह पृथा सर्वत्र देखने को मिलती है। अब जबकि पूरे देश में स्वच्छ भारत अभियान के जरिए साफ-सफाई पर जोर-शोर से चर्चा हो रही है, जरूरी है कि इस अमानवीय पेशे के उन्मूलन के लिए गंभीर प्रयास किए जाने चाहिएं.केंद्र में बनी नई सरकार ने 2 अक्टूबर 2014 से पांच वर्षों के लिए स्वच्छ भारत अभियान की पहल की है. वो चाहती है कि इसमें सभी लोग पूरी लगन और निष्ठा से शामिल हों, लेकिन इससे ज्यादा जरूरी है, मैला ढोने की सदियों पुरानी अमानवीय और अपमानजनक प्रथा को खत्म करना. इस काम को दो साल के भीतर किसी भी हालत में पूरा कर लिया जाना चाहिए. इसके लिए चाहे जो करना पड़े. मौजूदा कानून को पूरी सख्ती से लागू करने से लेकर जरूरत पड़ने पर उसमें उचित बदलाव किया जा सकता है. साथ ही बुनियादी ढांचे से जुड़ी हर जरूरत को मुहैया कराया जाना. सरकार की प्राथमिकता में शामिल होना चाहिए. स्वच्छ भारत अभियान को केवल सफाई के मुद्दों से जोड़ने की जगह मानव की गरिमा पर केंद्रित किया जाना चाहिए. भारत में मैला ढोने की प्रथा भारत की विकास प्रक्रिया के चेहरे पर एक गहरा काला धब्बा है. आजादी के 7 दशक पूरे होने पर भी ये राष्ट्रीय शर्म का विषय है कि 21 वीं सदी में साफ-सफाई में लगे हजारों परिवार सामाजिक तौर पर अपमानित और अमानवीय जीवन जीने को मजबूर हैं. 

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में इस शताब्दी के पहले दशक के दौरान उल्लेखनीय आर्थिक वृद्धि दर हासिल की या न की यह इन लोगों के लिए कोई मायने नहीं रखती क्योंकि इनकी जीवनचर्या तो जस की तस बनी हुई है. जीवन के जाति आधारित सभी क्षेत्रों में गहरे भेदभाव के चलते ऐसे बहुत सारे लोग पीछे छूट गए हैं. ये वही लोग हैं, जो भेदभाव के शिकार थे और सदियों से मैला ढोने की कुप्रथा घृणित-अपमानजनक काम का हिस्सा आज भी बने हुए हैं. ‘मैला ढोने वाले’ का ठप्पा लगने के चलते दूसरे लोग उन्हें उस काम के अलावा किसी अन्य काम के लिए नहीं बुलाते, जिसको उनके पुरखे हजारों साल से करते चले आ रहे हैं. इस तरह से इन लोगों को हर क्षेत्र में सम्मानजनक काम के अवसर पाने के अधिकार से वंचित कर दिया जाता रहा है.

कानून को लागू करने वाली अधिकारियों के उदासीन रवैए के चलते ये गंभीर भेदभाव लगातार बना हुआ है. साथ ही इसके बने रहने के पीछे मैला ढोने की प्रथा को जड़ से खत्म करने के लिए बने मौजूदा कानूनों में कमियां प्रमुख कारण हैं. मैला ढोना दुनिया में कहीं भी अमानवीय और छुआछूत की सबसे ज्यादा अपमानजनक जीवित कुप्रथा है. भारत में इसे मानवीय गरिमा की बजाय सफाई के मुद्दे से जोड़कर देखा जाता है. जबकि संविधान हर नागरिक के सम्मान की गारंटी करता है. सामाजिक उत्पीड़न का का दंश झेलने के अलावा मैला ढोने वाले इस पेशे के साथ जुड़ी कई तरह की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का भी सामना करते हैं. सुप्रीम कोर्ट में दायर श्री नारायणन की जनहित याचिका के मुताबिक अन्य बातों के साथ मीथेन और हाइड्रोजन सल्फाइड जैसी हानिकारक गैसों के संपर्क में आने से तत्काल मृत्यु और हृदय अधःपतन, मांसपेशियों और हड्डियों से जुड़े रोगों जैसे पुरानी ऑस्टियोआर्थराइटिस परिवर्तन और इंटरवेर्टब्रल डिस्क हर्नियेशन, संक्रमणों जैसे हेपेटाइटिस, लेप्टोस्पाइरोसिस और हेलीकोबैक्टर, त्वचा की समस्याओं, श्वसन तंत्र की समस्याओं और फेफड़े के काम करने के बदले हुए मानक पैरा-मीटर आदि जीवन से जुड़े खतरे शामिल हैं.

स्वच्छ भारत अभियान के तहत शौचालय को ले कर देशभर में खूब चर्चा है. एक पक्ष इस को लेकर वाहवाही लूट रहा है, नित नए दावे और आंकड़े पेश कर रहा है तो दूसरा पक्ष इन दावों की कलई खोलने में जीजान से लगा हुआ है. साथ ही, वह इस अभियान के बहाने लगाए गए टैक्स की आलोचना कर रहा है. इन सब के बीच, मानवता को शर्मसार करने वाली सिर पर मैला ढोने की प्रथा का कहीं कोई जिक्र तक नहीं हो रहा है. जबकि इस प्रथा को खत्म करने का कागजी अभियान गान्धी जी के जमाने से चला आ रहा है.. आजादी के बाद 1948 में इसे खत्म करने की मांग पहली बार हरिजन सेवक संघ की ओर से उठाई गई थी. तब से ले कर अब तक, इस प्रथा को खत्म करने की केवल और केवल जबानी जंग लड़ी जा रही है।. कानून बने, लेकिन सब धरे के धरे रह गए हैं. यह प्रथा खत्म होने का नाम नहीं ले रही है. इस देश में एक विशेष समुदाय के लोग मैला अपने सिर पर ढोने के लिए अभिशप्त हैं, बेहद दुखद है.क्या यह राष्ट्रीय शर्म नहीं है?  क्या स्वच्छ भारत अभियान के बावजूद अछूता रहा यह मुद्दा अभियान के मुंह पर एक झन्नाटेदार तमाचा नहीं है?

अक्सर सुनने को मिलता है कि वर्णव्यवस्था के साथ सदियों से यह परंपरा चली आ रही है. नारद संहिता और वाजसनेयी संहिता के अनुसार, दलितों के जिम्मे यह काम सौंपा गया है. इस के बाद बौद्ध व मौर्यकाल में भी यह परंपरा रही है. 1556 ईसवी में मुगलकाल में जहांगीर ने दिल्ली से लगभग 120 किलोमीटर दूर अलवर में 100 परिवारों के लिए एक सार्वजनिक शौचालय बनवाया था. लेकिन वहां मानव मैला का निबटारा कैसे किया जाता था, इस का विस्तृत ब्यौरा नहीं मिला है. कुछ इतिहासकारों का मानना है कि वहां तथाकथित भंगी मैला ढोते थे. ब्रिटिश भारत के म्यूनिसिपल रिकौर्ड के अनुसार भी मल का निबटारा भंगी या मेहतर द्वारा होता था. यहाँ इस बात का उल्लेख करना इस लिए जरूरी हो गया क्योंकि स्वच्छ भारत अभियान के तहत सार्वजनिक और निजी शोंचालय बनाने का अभियान तो जोरशोर से चलाया गया किंतु उनकी साफ-सफाई की व्यवस्था पर कोई प्रकाश नहीं डाला गया। याद रहे कि घरेलू अथवा सार्वजनिक शौंचालय को एक बार में साफ करने के लिए कम से कम 15 लीटर पानी की जरूरत होती है, किंतु इसके इंतजाम की स्वच्छ भारत के अभियान के प्रणेता अभिताभ बच्चन तक भी अपने किसी विज्ञापन में नहीं करते। खबर यहाँ भी है कि गाँवों में मोदी जी ने अनुदान देकर  शौंचालय तो बहुत से घरों में बनवा दिए किंतु शौंचालयों की साफ-सफाई के लिए पानी की कोई व्यवस्था मुहैया नहीं कराई। गाँव वाले परेशान है कि वो पीने के पानी की व्यवस्था करें या शौचालय साफ करने के लिए पानी की। यह इसलिए कि जमीन के पानी का जमीनी स्तर दिन पर दिन बढ़ता ही जा रहा है। जहाँ कभी पानी का स्तर 10-15 फिट हुआ करता था, आज की तारीख में 50 फिट से भी ऊपर चला गया है।

दुख की बात है कि आज भी विभिन्न राज्यों में आज भी शुष्क शौचालय उपयोग में होता है. इन शौचालयों में पाखाना उठाने का काम इंसान करते हैं, वह भी हाथों से या झाड़ू के जरिए. झाड़ू, बाल्टी और पैन के अलावा कोई विशेष उपकरण उन के पास नहीं होता है. उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पंजाब के गांव देहात में आज भी पाखाना सिर पर ढोकर ले जाने का चलन है.

1993 में नरसिम्हा राव सरकार में शहरी विकास मंत्रालय ने सिर पर मैला ढोने के रोजगार और शुष्क शौचालय निर्माण (निवारण) कानून को पारित किया. इस का उल्लंघन किए जाने पर 1 साल के लिए जेल या 2 हजार रुपए का जुर्माना या दोनों का प्रावधान किया गया था. केंद्र सरकार की ओर से सफाई कर्मचारी राष्ट्रीय आयोग का भी गठन किया गया. उसी साल सफाई कर्मचारियों और उन के परिजनों के लिए पुनर्वास योजना की भी घोषणा की गई. योजना के कार्यान्वयन का दायित्व सामाजिक न्याय व आधिकारिता मंत्रालय पर था.बहरहाल, 2003 की कैग रिपोर्ट के अनुसार, 16 राज्यों ने उक्त कानून को अपने यहां मान्यता दी. लेकिन किसी ने इसे लागू नहीं किया. महज 6 राज्यों ने अपने यहां हर्जाने का कानून लागू किया. 2002-07 तक की 10वीं पंचवर्षीय योजना में मैला ढोने की प्रथा को खत्म करने का लक्ष्य निर्धारण किया गया था. कैग रिपोर्ट के अनुसार, 600 करोड़ रुपए व्यय किए जाने के बाद भी परियोजना अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाई. इस की वजह सामाजिक जटिलता को बताया गया.

17 जून, 2011 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस पेशे को भारत की विकास की प्रक्रिया में एक धब्बा बताते हुए अगले 6 महीनों में इस प्रथा को खत्म करने का वादा किया था, जो पूरा नहीं हुआ. 10 सितंबर, 2011 को तमिलनाडु विधानसभा में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव आया, जिस में कहा गया कि पुराना कानून कमजोर ही नहीं, उस में बहुत तरह की खामियां हैं. इसीलिए केंद्र को एक नया और पुख्ता कानून बनाना चाहिए, जो देश के सभी राज्यों को मान्य हो.

इस के बाद 12 मार्च, 2012 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने संसद में कहा कि सरकार मैला ढोने और मैला की सफाई को लेकर 2 नए कानून लेकर आएगी, जिन में समाज के इन लोगों के लिए पुनर्वास और वैकल्पिक सम्मानित रोजगार का प्रावधान होगा. गौरतलब है कि 1993 में पारित हुए कानून में केवल मैला ढोने वालों को ही शामिल किया गया था. लेकिन 2012 के नए कानून में शुष्क शौचालय, खुली नालियों, रेललाइन से मैला उठाने वालों, सैप्टिक टैंक की सफाई करने वालों को शामिल कर इस कानून को विस्तृत और व्यापक बनाने की कोशिश की गई.

मनमोहन सिंह की यूपीए-2 सरकार ने मैला ढोने का रोजगार निवारण और पुनर्वास अधिनियम 2013 पारित किया. चूंकि यह मामला केंद्र व राज्य दोनों का है इसीलिए इस से संबंधित अधिसूचना तमाम राज्यों को भी भेज दी गई.

इस कानून के तहत ऐसे शौचालय के निर्माण करने पर या किसी से इस तरह के काम लेकर पहली बार कानून का उल्लंघन करने पर 2 साल की सजा या 2 लाख रुपए का जुर्माना या दोनों दिए जाने का प्रावधान है. फिर से इस के उल्लंघन पर 5 साल की सजा या 5 लाख रुपए का जुर्माना भरने या जेल व जुर्माना दोनों दिए जाने का प्रावधान है.

लेकिन ऐसे तमाम प्रावधान धरे के धरे रह गए। मद्रास हाईकोर्ट का निर्णय भी इन तमाम प्रावधानों की अनदेखी करता दिख रहा है. सत्तारूढ़ दल को तो केवल वोट बैंक की चिंता है... वोटर के लिए तो विकास की जो योजनाएं बनाई जाती हैं वो केवल कागजों पर और उद्योगपतियों के लिए जमीन पर तैयार की जाती हैं. गरीबों को भ्रष्टाचार करने नहीं देंगे... उनमें भ्रष्टाचार करने का दम भी कहाँ है ? .... उद्योगपतियों को पूरी छूट है जो चाहो... जितना चाहो, लूटपाट करो और जल्दी से रफूचक्कर हो जाओ।


 लेखक:  तेजपाल सिंह तेज (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हैं- दृष्टिकोण, ट्रैफिक जाम है, गुजरा हूँ जिधर से आदि ( गजल संग्रह), बेताल दृष्टि, पुश्तैनी पीड़ा आदि (कविता संग्रह), रुन-झुन, खेल-खेल में आदि ( बालगीत), कहाँ गई वो दिल्ली वाली ( शब्द चित्र), दो निबन्ध संग्रह  और अन्य। तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ग्रीन सत्ता के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका अपेक्षा के उपसंपादक, आजीवक विजन के प्रधान संपादक तथा अधिकार दर्पण नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं। स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं। हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं।
 


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