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शराब को हिंसा या कहें राजस्व का स्रोत ?

महाराष्ट्र की शराब नीति में यह विशेष व्यवस्था है कि ‘‘बोतल के दो चित्र’’ होंगे। एक बोतल का चित्र खड़ा और दूसरी बोतल का चित्र पड़ा होगा। माना पड़ी बोतल पर सर्वाधिक मतदान हुआ तो उस क्षेत्र में शराब की दुकान नहीं खुल सकती और यदि खड़ी बोतल पर सर्वाधिक मतदान हुआ तो शराब की दुकान त्वरित गति से खुल जायेगी।

अर्थशास्त्रीयों का कहना है कि यदि 100 में से 100 का घाटा होता है तो फिर उसी काम को आगे बढाया जा सकता है। पर 100 के स्थान पर घाटे का सूचकांक ऊपर चढ जाता है तो उस काम को छोड़ देना चाहिए। उसकी विवेचना करनी चाहिए इत्यादि। इस पंक्ति का तात्पर्य है कि राज्य में इन दिनों चारों तरफ शराब का विरोध हो रहा है। यह विरोध कोई नया नहीं है अपितु पहाड़ पर शराब का विरोध सदियों पुराना है। इस पर सरकारों को एक बार सोचना चाहिए, इसकी विवेचना करनी चाहिए कि आखिर शराब पर जनविरोध क्यों उभरकर आता है? लेकिन आज तक ऐसा हुआ नहीं। अर्थात उत्तराखण्ड में शराब के नफा-नुकसान के बारे में आगे बताया जा रहा है।

ज्ञात हो कि आजादी से पूर्व टिंचरी माई ने इस पहाड़ी क्षेत्र में शराब का घोर विरोध किया है। इसी पहाड़ी क्षेत्र में 70 के दशक में पेड़ो को बचाने के लिए ‘‘चिपको आन्दोलन’’ हुआ और बाद में ‘‘नशा नहीं रोजगार दो’’ आन्दोलन चला। इन आन्दोलनो का स्पष्ट संदेश था कि वनमाफिया और शराब माफियायों का मजबूत गठजोड़ है। एक तरफ शराब से इस क्षेत्र में असामाजिक वारदाते बढ रही है तो वहीं दूसरी तरफ इस क्षेत्र में वन विदोहन के कामो में भारी इजाफा हो रहा है। अब कौन भला जो इस पर जनहित की कार्रवाई को आगे बढाये। इधर शराब को राजस्व का स्रोत बताया जा रहा है तो दूसरी तरफ मनोरंजन का साधन इत्यादि। यह स्पष्ट है कि शराब का प्रचलन जैसे-जैसे बढता गया वैसे-वैसे लोगो में हिंसा का ग्राफ भी बढता गया। वैसे भी जबसे अंग्रेजी शराब पहाड़ चढी तब से हिंसा और महिला हिंसा की वारदाते अत्यधिक बढी है। इसका जीता-जागता उदाहरण राजस्व पुलिस और रेगुलर पुलिस के पास मौजूद विभिन्न प्रकार की प्रथम सूचना रिपोर्टे हैं। पुलिस विभाग इस बात की पुष्टी कर रहा है कि लड़ाई-झगड़े की सर्वाधिक रिपोर्टें उनके पास शराब पीने की आती है। मगर दूसरी तरफ देखें तो हमारे जननायक शराब को राजस्व का ‘‘खास स्रोत’’ बताते है। जबकि ऐसा नही है। हकीकत की तस्वीर को पलटकर देखेंगे तो शराब के पीछे का स्याह चेहरा सामने आ जायेगा। बताया जाता है अंग्रेजी शराब का 50 प्रतिशत हिस्सा विभिन्न दुकानों से विभिन्न राजनेताओं को जाता है। मात्र 20 प्रतिशत हिस्सा सरकारी खजाने में जाता है जिसे सरकार और सत्ता में बैठे जनता के नुमाईंदे राजस्व कहते है।

एक आंकलन के मुताबिक शराब की एक बोतल पर जो सरकारी राजस्व मिलता है उसके एवज में 20 गुना हिंसा समाज में उसी जगह पर घट जाती है, जहां इस शराब का कारोबार चल रहा होता है। इसे यदि कुल शराब की दुकानों के साथ जोड़ दिया जाय तो राजस्व पुलिस व रेगुलर पुलिस के पास जो आंकड़े अपमान, महिला हिंसा, जातिय हिंसा, पति द्वारा पत्नि के साथ की हिंसा, आस-पड़ोस के झगड़े बगैरह, के आंकड़ें पुष्ट हो जायेंगे की शराब का जितना भी राजस्व आ रहा है उसके 20 गुना हिंसा प्रतिवर्ष समाज में बढ रही है। यहां एक प्रमाणिक उदाहरण दिया जाना लाजमी है। मेरा एक दोस्त हाल ही में शराब व्यवसाय से जुड़ा है। वह बताता हैं कि शराब की एक बोतल की मूल कीमत मात्र 30 रूपय है जो बाजार में 100 रूपय में बिकती है। नाम ना छपवाने बावत वह आगे बताता है कि शराब से मिलने वाला राजस्व कैसे बंटता है। की जो 70 रूपय मुनाफा होता है उससे 20 रूपय तो शुद्ध रूप से सरकारी खजाने में जाता है, बाकि 50 रूपय विभिन्न राजनीतिक कार्यकर्ताओं व सत्ता में बैठे जनप्रतिनिधियों से लेकर अफसरानों तक को जाता है। जिसका कोई लेखा-जोखा ही नहीं होता है। फोकट में मिलने वाला यह राजस्व हमारे नीति-नियन्ताओं की आंखो में पट्टी बांध देता है। इसलिए जनप्रतिनिधि कभी भी शराब व्यवसाय का विरोध नहीं करते। क्योंकि उसे तो 50 रूपय फोकट में मिल रहा है। अर्थात आमजन का तो शराब के व्यवसाय से नुकसान ही है। जो आये दिन अखबारो की सुर्खीया बन जाती है।

गौरतलब हो कि सत्ता की लोलुपता में चकनाचूर लोगो को शराब का ही राजस्व दिखाई देता है। अन्य राजस्व के स्रोत उनके लिए गौण हो जाते है। शराब के अलावा राज्य में राजस्व के नये स्रोत भी तो विकसित किये जा सकते है। जिससे स्वरोजगार व रोजगार को बढावा दिया जा सकता है। बता दें कि राजस्व के अन्य स्रोत राज्य में मौजूद हैं जिसकी सूचना हमारे जनप्रतिनिधि कभी सार्वजनिक नहीं करते। यानि प्रतिदिन प्रति व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला क्रय-विक्रय, कृषि उपज, सिंचाई व अन्य जल दोहन, वन दोहन/वन विकास निगम, सरकारी व गैर सरकारी कर्मीयों से मिलने वाला व वाणिज्यिक जैसे टैक्स जो नियमित राजस्व के स्रोत हैं और बढ भी रहे हैं। इस तरह के राजस्व के स्रोत जनता के नुमाईंदो को दिखाई नहीं दे रहे हैं। जबकि यह राजस्व शराब के व्यवसाय से कई गुना अधिक है व शुद्ध है। शराब के अलावा मिलने वाला राजस्व कभी भी फोकट में बंटने रह जाता हो। इस तरह के राजस्व से जो भी विकासीय कार्य क्रियान्वित होंगे वह मूल रूप से जन साधारण के काम आते है।

उधर सरकारों की दलील है कि शराब से सालाना लगभग 900 करोड़ का राजस्व मिलता है। परन्तु सरकारें राजस्व के अन्य स्रोतो पर बात ही नहीं करना चाहती। संदेह इस बात का है कि अन्य स्रोतो से मिलने वाले राजस्व का आंकड़ा यदि आम जन के पास आ जाये तो उसका पूरा हिसाब-किताब चुकाना पड़ेगा। अर्थात जो भी खबरें भ्रष्टाचार की आ रही है वह आमजन से वसूला गया राजस्व को ठिकाने लगाने की ही होगी। क्योंकि शराब के राजस्व का हमारे जननायक खूब गीत गाते हैं, मगर अन्य स्रोतों से मिलने वाले राजस्व को अब तक किसी भी सरकार ने सार्वजनिक नहीं किया। राजस्व के नाम पर इस तरह का दोगला चरित्र आमजन में अंसन्तोष पैदा कर रहा है। अगर सरकार एक तरफ शराब से लगभग 900 करोड़ का घाटा बता रही है तो वहीं दूसरी तरफ इतने ही करोड़ रूपये से अधिक के झगड़े फसाद राज्य में होते है। एक मात्र महिला हिंसा के आंकड़े निकाले जाये तो 99 फीसदी शराब परोसने से बताये जाते हैं। यही नहीं ऐसा भी एक आंकड़ा है कि 100 शादियों में से 45 शादिया शराबी पति मिलने से बिखर जाती है। शराब के कारण महिला हिंसा के अलावा बेरोजगारी, डकैती, अभद्रता, असंवेदनशीलता, आक्रामकता, इत्यादि जैसी नासूर बिमारी समाज में फैल रही है।

बिडम्बना देखिये कि शैक्षणिक माहौल राज्य में नहीं बनाया जा रहा है पर शराब का माहौल बनाने में हमारे जननायक आगे दिखते है। बताया जाता है कि सरकार को मिलने वाले कुल राजस्व में से 7 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा पर खर्च करना चाहिए था सो मात्र 2 प्रतिशत भी नहीं हो रहा है। संवैधानिक वर्जनाओं को तोड़ते हुए अब कल्याणकारी राज्य की कल्पना शराब के प्रचलन से अधूरी होते दिख रही है। क्योंकि सरकारो का ध्यान शराब पर ही है। शराब का विरोध उत्तराखण्ड राज्य में ही नहीं होता आया है। अन्य राज्य भी इसके गवाह हैं। परन्तु अन्य राज्यों में जनभावनाओं को देखते हुए शराब पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। जैसे विहार राज्य में शराब पर पूर्णरूप से प्रतिबन्ध है। यहीं महाराष्ट्र जैसा राज्य प्रतिवर्ष शराब के लिए मतदान करवाते है। यानि जहां शराब का विरोध हो रहा हो उस स्थान पर बाकायदा मतदान करवाया जाता है। महाराष्ट्र की शराब नीति में यह विशेष व्यवस्था है कि ‘‘बोतल के दो चित्र’’ होंगे। एक बोतल का चित्र खड़ा और दूसरी बोतल का चित्र पड़ा होगा। माना पड़ी बोतल पर सर्वाधिक मतदान हुआ तो उस क्षेत्र में शराब की दुकान नहीं खुल सकती और यदि खड़ी बोतल पर सर्वाधिक मतदान हुआ तो शराब की दुकान त्वरित गति से खुल जायेगी। मगर उत्तराखण्ड राज्य में जनता के नुमाईन्दे जनभावनाओं का अनादर करते स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। 16 वर्षो में जनहित के लिए शराब की कोई नीति नहीं बन पाई। उल्टे राज्य में जितने बार शराब का विरोध हुआ उतनी ही और शराब की दुकाने खोलने के प्रयास सामने आये। यहां तक कि जब महिलाओं के विरोध के आगे शराब व्यापारियों की फजीहत होने लगी तो बकायदा शराब के कारोबारी ने अपनी पत्नी के नाम से शराब की दुकान खोल दी और अमुक की पत्नी को इस संबध मे कोई मालूम ही नहीं है। शराब विरोधी आन्दोलन में कई दौर ऐसे आये कि जिस महिला के नाम से शराब की दुकान चल रही थी वह तो शराब विरोधी आन्दोलन का नेतृत्व कर रही थी। कुलमिलाकर शराब के विरोध का तात्पर्य सरकारो को समझने की जरूरत है।

चिन्ता-ए-आबकारी विभाग
आबकारी विभाग बता रहा है कि शराब का व्यवसाय इस वर्ष बन्द होता है तो सरकार को 930 करोड़ का नुकसान का अनुमान है। राज्य में 2016-17 में शराब की 526 दुकाने थी। सो भविष्य के लिए 311 शराब की दुकानों का पैसा आबकारी विभाग में जमा हो चुका है। सहायक आयुक्त आबकारी डी. एस. चैहान कहते हैं कि राज्य में कुल शराब की दुकानो में से अमूमन 10-12 प्रतिशत शराब की दुकाने महिलाओं के नाम से आंबटित होती है। परन्तु जिन महिलाओं के नाम से दुकाने आबटित होती है उन्हे मालूम ही नहीं कि शराब की दुकान कैसे चलती है। नाम महिला का और कारोबार पुरूष चलाता है। उन्होने बताया कि राज्य की एक मात्र महिला अनिता शर्मा जो हरिद्वार जिले में स्थित धनपुरा में थी वे खुद के बलबूते शराब की दुकान का संचालन करती थी। उधर अपर आयुक्त आबकारी डी.वी. सिंह के मोबाईल न॰ 9927328578 पर बात करके यह जानकारी मांगनी चाही कि राज्य में पिछले वर्ष कितनी महिलाओं के नाम से शराब की दुकाने आबंटित हुई है, वे इस बात पर आग बबूल हो गये। कहा कि उनके पास इस तरह की जानकारी नहीं है। वे इतने गुस्से में आये कि अपने पद की जिम्मेदारी छोड़कर यह बताने लगे कि वे ऐसी-वैसी जानकारी नहीं रखते। इसके बाद उन्होने फोन काट दिया।

मामला वैधानिक व अवैधानिक शराब का

राज्य में जब-जब शराब का विरोध होता है तब एक सवाल कौतुहल का विषय बन जाता है कि परंपरागत शराब को बाजार उपलब्ध क्यों नहीं होता? क्या यह परंरागत शराब राजस्व का स्रोत बन सकती है? ज्ञात हो कि उत्तराखण्ड हिमालय क्षेत्र की जनजातियां स्थानीय उत्पादों और जड़ी-बूटियों से शराब को परंपरागत रूप से बनाते है स्वयं के उपयोग के लिए, जिसे वे दवा-दारू कहलाते हैं। इस दवा-दारू का स्थानीय नाम पैलफुल की, घेंघटी, घणीसूर, छंग, कीमा के पाथ की दारू इत्यादि है। इस शराब के परोसने के ढंग भी अंग्रेजी शराब से जुदा है। स्थानीय लोग इस परंपरागत शराब को खुद ही बनाते है। इस परंपरागत शराब को पीने के शैकीन इसे कटारो में पीते हैं। पीने के बाद खूब गीत-नृत्य होता है। गले लगते है। प्यार, मोहब्बत की बाते होती है। अतएव अब तक इस शराब के असमाजिक कारण सामने नहीं आ पाये। परन्तु यह परंपरागत शराब संवैधानिक रूप से अवैध मानी जाती है। इस शराब को बनाते वक्त यदि कोई आम नागरिक पकड़ा गया तो वह कानूनन अपराध की श्रेणी में आ जाता है और सजा, दण्ड आदि का भागी बन जाता है। ऐसे दर्जनो घटनाऐं सामने आई है। अपितु जब अंग्रेजी शराब या दूसरी वैधानिक शराब के कारण असामाजिक घटनाऐं सामने आती है, उस पर लोगो को कानून का पाठ पढाया जाता है।

एक अन्यायपूर्ण निर्णय की दास्तां
आन्दोलनकारी संगठनो का आरोप है कि हमारे जनप्रतिनिधि शराब के नशे में इतने मदमस्त हो गये कि जिस नारी को वे पूजनीय, सृष्टी की जननी व देवी कहते हैं उस नारी की एक भी समस्या आज इनके नजरो से शराब के उस जहरीले पानी से धुल गयी है। उत्तराखण्ड महिला मंच सहित तमाम जिलो के आन्दोलनकारी संगठनो का आरोप है कि जिस सड़क के लिए ग्रामीण मर-मिट गये कि उनके गांव की सड़क राष्ट्रीय राजमार्ग के अन्र्तगत आये वह मार्ग आज एक जहरीले शराब नामी पदार्थ के बहाने जिला मार्ग बनाया गया। उनका आरोप है कि क्या यह निर्णय सरकार का न्याय संगत है? यदि न्याय संगत होता तो सरकार को न्यायालय के निर्णय को सर्वोपरी मानना चाहिए था।

प्रेम पंचोली
प्रेम पंचोली
ब्यूरो चीफ
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