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जब किसी आदिवासी महिला के साथ बलात्कार होता है, तो हमारी व्यवस्था उसे न्याय क्यों नहीं दिला पाती?

पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मीडिया में एक तस्वीर आई है जिसमें उन्हें बीजापुर की आदिवासी महिला को नई चप्पल पहनाते हुए दिखाया गया है. लेकिन उनकी सरकार की बहुत सारी दूसरी बातों की तरह यह भी एक दिखावा ही है.

तेंदू पत्ते इकट्ठा करके अपना गुजारा चलाने वाले इन आदिवासी परिवारों के सिर्फ एक सदस्य को ही यह उपहार दिया गया है. जबकि अभी तक इनमें से किसी को भी सलवा जुडूम के दौरान जलाए गए उनके घरों, सामानों यहां तक कि एक चप्पल का भी मुआवजा नहीं मिला है.

अगर कोई बाबासाहब के विचारों का पालन नहीं करता है तो  छत्तीसगढ़ में सिर्फ जय भीम बोलने का कोई मतलब नहीं रह जाता है. आंबेडकर होते तो क्या यह देखकर खुश होते कि एक ऐसी पार्टी संविधान को बर्बाद करने पर तुली हुई है जो अपने देश की बेटियों को सुरक्षा नहीं दे सकता, जिसके विधायकों पर बलात्कार के आरोप हैं और जिसके मंत्री बलात्कारियों का समर्थन करते हैं?

जिस दिन बस्तर के उन आदिवासियों, जिनके साथ सामूहिक बलात्कार हुए, जिनके सगे-संबंधियों को मार दिया गया और जिनके घर जला दिए गए, को इंसाफ मिलेगा उस दिन हो सकता है कि सरकार के माओवादियों के हथियार छोड़ देने की मांग सुन ली जाए.

यह लगभग सालभर पहले की बात है, जब अप्रैल 2017 में सुकमा ज़िले के चिंतागुफा गांव में सुरक्षा बलों ने एक नाबालिग लड़की का कथित बलात्कार किया था. 2 अप्रैल की सुबह करीब चार बजे लड़की और उसकी मां अपने घर के अहाते में सोई हुई थी तभी सीआरपीएफ के जवान उनके घर में घुस आए.

वो लड़की के बड़े भाई की तलाश में आए थे जिसे संघम का सदस्य यानी गांव के स्तर पर माओवादी समर्थक. लेकिन वो वहां नहीं था. लड़की ने बाद में बताया कि तीन लोगों ने उसके बाद उस लड़की को खींचकर कुछ दूर ले गए और उनमें से दो ने उसके साथ बलात्कार किया.

दूसरे सीआरपीएफ के जवानों ने उसकी मां को मारा और उसकी छोटी बहन को घर के अंदर धकेलकर बंद कर दिया. उस वक्त ली गई पीड़िता की तस्वीर में उसकी गर्दन पर चोट के निशान दिखते हैं. अंधेरे के कारण वो बलात्कार करने वालों को नहीं पहचान पाई.

पिछले साल 3 अप्रैल को एक गांव वाले ने सबसे पहले इस बारे में बताया और नई दुनिया अख़बार में यह मामला 4 अप्रैल को छपा था. नई दुनिया में छपी रिपोर्ट में डीआईजी पी सुंदर राज के बयान में इस आरोप का खंडन किया गया था.

उन्होंने इसे गलत नीयत के साथ पुलिस की छवि बिगाड़ने की ‘सफेदपोश नक्सलियों’ की साजिश बताया था. किसी भी पुलिस जांच से पहले पहली रिपोर्टिंग के आधार पर ही यह मामला साफ तौर पर पोक्सो के अंतर्गत आता है. लेकिन इसके बजाए रिपोर्ट करने वाले पत्रकार पर ही सवाल खड़े किए गए.

5 अप्रैल को नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वीमेन (एनएफआईडब्लू) की एक टीम ने गांव का दौरा किया और पीड़िता लड़की और उसकी मां को सुकमा के पुलिस निरीक्षक से मिलवाने ले आए. पुलिस ने तुरंत दोनों महिलाओं को हिरासत में ले लिया.

स्पष्ट है उन्होंने ऐसा अपने बचाव के लिए किया. उन दोनों को एनएफआईडब्लू की महिलाओं से भी बात नहीं करने दिया गया जिन्होंने उन्हें वहां लाया था. उन महिलाओं से आख़िर उन्हें क्या ख़तरा था जो पुलिस केस करने में उनकी मदद कर रही थी. यहां कौन पीड़ित है और कौन अपराधी?
जाहिर था कि लड़की ने बलात्कार के आरोप वापस ले लिए.

पुलिस के बयान में गड़बड़झाला
सुकमा और जगदलपुर में लड़की की किसी तरह की मेडिकल जांच की गयी थी. सुकमा की रिपोर्ट (वो हिस्सा जो साफ-साफ पढ़ा जा सकता है) में लिखा है:

‘पीड़िता के द्वारा बताया गया विवरण: पीड़िता को तीन लोग 2.4.17 की सुबह चार बजे के करीब तीन लोग उठाकर ले गए. दो ने उसे इमली के पेड़ के पास पकड़ा. एक ने गर्दन की बाईं ओर बांस से उसे मारा.. और उनमें से एक ने उसे नीचे गिरा दिया और उस पर चढ़ गए… पीड़िता ने उसे तुरंत लात मारी… फिर वे भाग गए… हाइमन फटा नहीं है… गर्दन पर 2x 1.5 इंच का मामूली चोट. भोथरी चीज से लगा- जख़्म एक हफ्ते पुराना.’
जगदलपुर के महारानी अस्पताल की रिपोर्ट कहती हैं, ‘दो लोगों द्वारा बांस की छड़ी से मारा गया.’

हालांकि पुलिस का बयान है कि लड़की दरवाजा खोलते वक्त हुई हाथापाई में गिर गई और बगल में रखे बांस के ढेर से टकराकर घायल हुई.
पुलिस ने पीड़िता की एक्स रे कराने के बाद उसकी उम्र 20-22 बताई. इसके बाद पूरे गांव वालों ने अपने बयान बदल लिए जो लड़की की उम्र पहले 14-15 साल बता रहे थे.

और बयान दर्ज करने के बाद पुलिस यह बात पूरे विश्वास के साथ कहने लगी कि लड़की की उम्र वास्तव में 22 साल ही थी. यहां हमारी पुलिस को प्रौढ़ शिक्षा के लिए मेडल देना चाहिए. जो गांव वाले सूरज और देखकर समय और तारीख का अनुमान लगाते हैं, वे पुलिस की बदौलत अचानक समय का सटीक अनुमान लगाने लगे.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की संदिग्ध भूमिका
8 अप्रैल 2017 को मैंने यह मामला राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भेजा था. इसके बाद आयोग ने पुलिस को अपनी रिपोर्ट भेजने को कहा. 1 अगस्त 2017 को आयोग ने पुलिस को लड़की को रिपोर्ट भेजने को कहा ताकि पुलिस की कार्रवाई पर उसका बयान लिया जा सके.
इसके ढाई महीने बाद आयोग ने यह मामला बंद कर दिया. आयोग ने अपनी ओर से जांच करने की कोई जहमत नहीं उठाई जबकि सबूतों में विरोधाभास साफ नज़र आ रहा था.

आयोग ने 25 अक्टूबर 2017 को बयान दिया:
‘कथित पीड़िता ने कोई बयान नहीं दिया है. इसलिए यह माना जाता है कि उसे इस मामले में कुछ नहीं कहना है. उसकी ओर से कोई आपत्ति नहीं आने का मतलब यह है कि वो इस संबंध में हुई कार्रवाई और पुलिस की रिपोर्ट से पूरी तरह से संतुष्ट है.

ऐसे हालात में आयोग की ओर से किसी भी तरह की दखल की जरूरत नहीं है और इसलिए मामले को बंद किया जाता है.’

क्या मानवाधिकार आयोग को वाकई में यह लगता है कि पीड़िता, जो अनपढ़ है, जिसे पहले ही बलात्कार का मामला वापस लेने के लिए डराया-धमकाया गया है और जो सिर्फ गोंडी बोलती है, वो हिंदी में लिखी पुलिस की लंबी-चौड़ी रिपोर्ट और अंग्रेजी में लिखी मेडिकल रिपोर्ट से ‘संतुष्ट’ है? क्या वे वाकई में ये सोचते हैं कि पुलिस ने उसे रिपोर्ट भेजी होगी?

मैं खुद से इन सवालों का पता लगाना चाहती थी लेकिन साल क़ानूनी बाध्यता के चलते चिंतागुफा गांव नहीं जा सकी. खैर, इससे क्या फर्क पड़ता?

2005 में सलवा जुडूम शुरू होने के बाद से अब तक किसी को इंसाफ मिला? किसी भी बलात्कार, हत्या और आगजनी के लिए कोई सज़ा हुई?

देश में इंसाफ के लिए हर चौखट फिर चाहे सरकार, सुप्रीम कोर्ट, मानवाधिकार आयोग या फिर महिला आयोग, खटखटाने के बाद ये आलम है. कठुआ से लेकर उन्नाव से लेकर चिंतागुफा गांव तक ये सभी हमारे देश की बेटियां हैं. यह देश तभी ज़िंदा रहेगा जब वो ज़िंदा रहेंगी लेकिन फिलहाल महिलाओं से जुड़े अपराधों के आंकड़े कुछ और ही तस्वीर बयां करते हैं.

(लेखिका नंदिनी सुंदर दिल्ली विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र पढ़ाती हैं)
साभार- द वायर

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