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कम फीस भरने के कारण जातिवादी प्रिंसिपल ने दलित छात्रा को पीटा और स्कूल से निकाला, कहा दलितों की नहीं है ये सरकार, पूरी देनी होगी फीस

मोदी-योगी सरकार दलित प्रेम के कितने ही ढोल पीट रही हो, लेकिन जिस तरह की घटनाएं और तथ्य लगातार सामने आ रहे हैं उससे तो ऐसा ही लगता है कि काम दलित विरोधी मानसिकता के साथ ही किया जा रहा है। यूपी के बागपत जिले में 12वीं कक्षा की एक छात्रा को स्कूल से सिर्फ इसलिए निकाल दिया गया क्योंकि वो दलित समुदाय से थी।

जौहड़ी गांव की रहने वाली आंचल जिवाना गुलियान गांव में स्थित आर्य इंटर कॉलेज की छात्रा है। वो एक बेहद ही गरीब परिवार से संबंध रखती है, उसने अपने कॉलेज में 1400 रुपए फीस के जमा कर दिए थे लेकिन कॉलेज प्रशासन ने फिर भी उसका नाम काट दिया, और उससे और फीस भरने की बात कहने लगा। आंचल ने प्रिंसिपल को जब ये बताया कि वा अनुसूचित जाति से संबंध रखती है, जिसकी वजह से उसे इतनी ही फीस भरनी थी और वो उसने भर दी है। और सरकार ने दलितों को कम फीस की सुविधा दी है। ये बात सुनकर प्रिंसिपल निर्मला चौधरी भड़क गईं और कहने लगी कि ये दलिितों की सरकार नहीं है, सरकार ने फीस माफी बंद कर दी है, अब पूरी फीस भरनी पड़ेगी,  इतना ही नहीं उसे जातिसूचक शब्द कहे और क्लास टीचर के साथ मिलकर पीटा,  और स्कूल से नाम काट दिया। इसकी शिकायत आंचल ने प्रशासनिक अधिकारियों से की। अधिकारियों ने मामले को बेहद गंभीरता से लेते हुए कॉलेज  प्रबंधन को आदेश दिए कि छात्रा को वापस दाखिला दिया जाए। प्रशासन ने तो आदेश दे दिए हैं और दाखिला भी हो जाएगा लेकिन जातिवादी मानसिकता रखने वाले प्रिंसिपल, शिक्षक और कॉलेज प्रशासन उसको किस तरह से परेशान कर सकते हैं ये आसानी से समझा जा सकता है, इसलिए प्रशासन अतिरिक्त सतर्कता बरतते हुए स्कूल की हरकतों व छात्रा के साथ व्यवहार पर नजर रखे तो बेहतर हो।    

इस बेटी को दलित होने का ऐसा दंश झेलना पड़ा है जिसे वो शायद ही कभी भुला पाए। उसे भूलना भी नहीं चाहिए और इसी दंश को अपनी ताकत बना लेना चाहिए, उसे ये जरूर याद रखना चाहिए कि जिस स्कूल में वो बेहतर ज़िंदगी के लिए शिक्षा लेने गई थी, वहां के प्रिंसिपल और शिक्षक अभी भी किस सड़ी शिक्षा के साथ जी रहे हैं। वो शिक्षक जिनके कंधों पर समाज के उज्जवल भविष्य की नींव रखने की जिम्मेदारी होती है। जातिवादी मानसिकता के चलते उनके कंधे कभी इस लायक बन ही नहीं पाए कि वे समाज के उज्जवल भविष्य का बोझ अपने टूटे कंधों पर उठा सकें। जब वे अपने आप को ही एक सड़ी हुई मानसिकता से निकाल नहीं पाए तो फिर वे देश के भविष्य को किस तरह गढ़ेंगे ये समझा जा सकता है। ये कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि ऐसे जातिवादी शिक्षक समाज पर तो कलंक है हीं देश की उन्नति में भी बाधक हैं। जिनके व्यवहार और मानसिकता के चलते ना जाने कितने दलित बच्चे बीच में ही पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो जाते होंगें। और इसके बाद वो किस रास्ते पर निकलते होंगे, देश के भविष्य में किस तरह का योगदान देते होंगे। और बचपन की नासमझियों के कारण गलत दिशा की तरफ बढ़ जाते होंगे, ना जाने कितनी ही नस्लें इसी मानसिकता के कारण बर्बाद हुई हैं, और हो रही हैं।  लेकिन इन जातिवादी शिक्षकों में किसी को कभी कोई दोष नहीं दिखा। अगर बेहतर समाज को बनाने का श्रेय शिक्षकों को दिया जाता है, जिसके लिए उन्हें गुरू माना जाता है, तो फिर समाज में मौजूद असमाजिक तत्वों के लिए भी उन्हें ही दोषी भी माना जाना चाहिए।     

मुख्य संवाददाता
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