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दलित बेटी ने रची इबारत, दिन में पिता के साथ बनवाती है जूतियां, रातों को पढ़कर लाई 97.60% अंक

राजस्थान- झुंझुनू के पौंख की अंजेश कुमारी रसगनिया ने बारहवीं के साइंस में 97.60 प्रतिशत अंक लाकर नई इबारत रच दी है। यहां यह बताना जरूरी हो जाता है कि अंजेश दलित परिवार से संबंध रखती है हालांकि अंजेश जैसी बेटियां सिर्फ दलित समाज का ही नहीं बल्कि पूरे देश का गौरव है। लेकिन यहां पर जाति बताना ऐसे लोगों की वजह से जरूरी हो जाता है जो दलितों को सिर्फ कोटे वाला समझकर नकारने में लगे रहते हैं, और ना जाने कितनी ही प्रतिभाओं को बाहर आने से पहले दबा देते हैं, अंजेश उसी 85 फीसदी आबादी का हिस्सा है जिसे भारतीय समाज समानता का अधिकार नही देता है और उनके रास्ते में रोड़े अटकाने में भी कोई कसर नही छोड़ता है ऐसी तुच्छ मानसिकता रखने वालों से मेरा कहना है कि अब देश और समाज का और नुकसान मत कीजिए अपनी सोच बदलिए और 85 प्रतिशत लोगों को सामने आने दीजिए। उनके लिए ऐसा समाज और माहौल बन जाने दीजिए जिसमें वो अपनी प्रतिभा दिखा सकें। और देश को नई राह पर ले जाने में योगदान दे सकें, जरा सोचिए इतने अभावों के बाद भी इतनी बड़ी आबादी में ऐसे बच्चे मौजूद हैं जो इतिहास रचने का दम रखते हैं, अगर इनको सही मौके,स्वस्थ माहौल और मार्गदर्शन मिल जाए तो ये बच्चे वो कर सकते है जो सोच से परे है। इसलिए अब समान शिक्षा व्यवस्था कीजिए और प्रतिभाओं को मरने से रोकिए सरकार वरना आने वाला इतिहास आपको माफ नही करेगा। अभी समय है ईमानदारी से सोचने का, अगर अपने छोटे लालच और छोटी मानसिकता के चलते अपनी सोच नही बदलोगे तो आप एक समाज को ही गर्क में नही भेज रहे हैं बल्कि देश को गड्ढे में धकेल रहे हैं। हम पश्चिम में रहना और जीना तो चाहते हैं लेकिन वहां कि व्यवस्था अपनाना नही चाहते, जहां रंगभेद खत्म किया गया और काले ओबामा को राष्ट्रपति बनाया दिया गया, जहां शिक्षा के समान अवसर हैं, समान शिक्षा व्यवस्था की मजबूत नींव रखी हुई है। उनके मूल में यही चीजें हैं जो उसे शक्तिशाली, महान और प्रभावशाली राष्ट्र बनाती हैं। ये हैरान करने वाली बात नहीं है तो और क्या है कि अंजेश दिन में अपने पिता के साथ जूते बनाने का काम करवाती है और रात को पढ़ाई करती है, जिस दिन अंजेश का अंग्रेजी का पेपर था उस दिन उसके पिता का एक्सीडेंट हो गया और उनके पैर में फ्रेक्चर हो गया, अंजेश अपना पेपर नहीं देना चाहती थी लेकिन अनपढ़ मां ने समझाया और हिम्मत बंधाई तो अंजेश पेपर देने गई और अंग्रेजी के पेपर में 96 अंक लाई। इतने दबाव और परेशानी में भी ये बच्ची इतना बेहतरीन प्रदर्शन कर सकती है तो सोचिए कि अगर उसे समाज, सरकार की तरफ से समर्थन मिले तो वो क्या नहीं कर सकती किन ऊंचाईयों को नहीं छू सकती। अंजेश के पिता ने सिर्फ 10वीं तक पढ़ाई की है, लेकिन अपनी बेटी को वे खूब पढ़ाना चाहते हैं वो कहते हैं कि मेरी बेटी डॉक्टर बनना चाहती है और मैं हर हाल में अपनी बेटी को डॉक्टर बनाउंगा चाहे उसके लिए मुझे कितनी भी परेशानियां झेलनी पड़े या फिर भूखा ही रहना पड़े लेकिन अपनी बेटी की पढ़ाई पर कभी कोई असर ऩही होने दूंगा। ऐसी बेटी के साथ-साथ ऐसे पिता को भी सलाम।    

मुख्य संवाददाता
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