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जस्टिस कर्णन के नाम

देसी मीडिया जस्टिस कर्णन को नंबर वन के रिकॉर्ड्स नवाज़ने में जुटा पड़ा है जैसे, पहली बार ऐसा हुआ है जब हाईकोर्ट के जज रिटायरमेंट वाले दिन फ़रार हैं, पहली बार कोई जज अपनी फेयरवेल में शामिल नही होगा, वे पहले ऐसे जज हैं जिनके खिलाफ पद पर रहते हुए गिरफ्तारी के आदेश हुए और जिन्हें छह महीने की सजा सुनाई गई,  ऐसा पहली बार हुआ जब हाईकोर्ट के जज एससी/एसटी कमीशन पहुंचे, वे पहले ऐसे जज हैं जिनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार दिमागी संतुलन चेक करने के आदेश दिए, वे पहले ऐसे जज हैं जिन्होंने सार्वजनिक तौर पर सुप्रीम कोर्ट के जजों के खिलाफ अपशब्द बोले इनके अलावा और भी बहुत सारे रिकॉर्ड मीडिया जस्टिस कर्णन के नाम करवा चुका है। इन तर्कों को देखकर कोई भी समझ सकता है कि ये किसी एक व्यक्ति के खिलाफ की गई गैर ज़िम्मेदाराना पत्रकारिता का नमूना है, जिसके तहत साफ दिखता है कि जितनी हो सकती है उतनी नकारत्मकता जस्टिस कर्णन के खिलाफ फैलाने की कोशिश की जा रही है। लेकिन जातिवादी सड़ा हुआ देसी मीडिया वो प्रश्न नही बता रहा जो जस्टिस कर्णन ने भी पहली बार खड़े किए थे। उन्हें दिखाना किसकी ज़िम्मेदारी है, उनकी पड़ताल करना, उनकी तह में जाना क्या मीडिया की ज़िम्मेदारी नही है।
पहली बार जस्टिस कर्णन तब सुर्खियों में आए थे जब उन्होंने अपने साथी जजों के खिलाफ जातिवादी मानसिकता के चलते भेदभाव के आरोप लगाए थे। 23 जनवी 2017 को जस्टिस कर्णन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखी थी जिसमें सुप्रीम कोर्ट और मद्रास हाईकोर्ट के जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए थे, चिट्ठी में 20 जजों व सेवानिवृत्त जजों के नाम भी दिए गए थे जिनके खिलाफ जांच की मांग की गई थी। दरअसल सारा मामला शुरू यहीं से होता है जब एक हाईकोर्ट के जज न्यायिक व्यवस्था में जातिवाद और भ्रष्टाचार देखते हैं, महसूस करते हैं, और अपनी ज़िम्मेदारी निभाते हुए प्रधानमंत्री को पत्र लिखते हैं कि इसकी जांच होनी चाहिए और इसके लिए वो नाम और सुबूत भी प्रधानमंत्री को देते हैं लेकिन ईमानदार और दलित हितैषी होने का मुखौटा पहने हमारे प्रधानमंत्री वो चिट्ठी उसी विभाग को भेज देते हैं जिसके ख़िलाफ़ चिट्ठी लिखी गई, तो क्यों नहीं देसी मीडिया को दिखाई पड़ा कि ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी हाईकोर्ट के जज ने न्यायिक व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार और जातिवाद के खिलाफ जांच की मांग की है तो वो प्रक्रिया पूरी होनी चाहिए, और मामले की जांच के लिए संबंधित जांच ऐजेंसी को आदेश देने चाहिए। लेकिन यहां तो आरोपियों को सतर्क करके उन्हीं को जांच सौंप दी जाती है और पीड़ित से ही जवाब मांगने का सिलसिला चल उठता है, बिल्कुल हिंदी फिल्मों की तरह बल्कि कहा जाए कि उससे भी ज्यादा वीभत्स तरीके और बेशर्मी से जहां विलेन ऐन केन प्रकरेण पर उतर आता है। फिर मामला इतना तूल पकड़ लेता है कि सुप्रीम कोर्ट अलोकतांत्रिक मीडिया को निर्देश देते हैं कि जस्टिस कर्णन से जुड़ी सुनवाई मीडिया में ना दिखाई जाए। लेकिन प्रधानमंत्री जी संज्ञान लेने की जरूरत तक महसूस नही करते क्या इसीलिए क्योंकि ये पूरा मामला एक दलित जज से जुड़ा है। वर्तमान में न्यायिक व्यवस्था पर जिस तरह से सवाल ख़ड़े होते आ रहे हैं वो किसी से छिपे नही है, क्या प्रधानमंत्री नही चाहते कि न्यायिक व्यवस्था में पल रहा भ्रष्टाचार खत्म हो, शायद नही, अगर चाहते तो जस्टिस कर्णन की चिट्ठी को सही हाथों में देते और निष्पक्ष जांच करवाते।   

मुख्य संवाददाता
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