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एक कुआं, एक मंदिर और एक शमशान : एक और राजनीतिक फरेब

भाजपा शासन के चार साल गुजर गए। महज एक साल बचा है। चार साल में मोदी सरकार ने समाज हित में क्या किया, क्या नहीं... सब जनता की नजर में है। इस जनता में मोदी-भक्त शामिल नहीं हैं। उन्हें तो सूखे में भी आजकल हरा ही हरा दिख रहा है। शायद उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि देश का विकास हो रहा है या नहीं किंतु उनके लिए तो यह महत्तवपूर्ण है कि उनकी इलाकाई दादागीरी धड़ल्ले से चल रही है। यहाँ एक सवाल करना तो बनता ही है कि यदि मोदी सरकार ने पिछ्ले चार साल में कुछ विकास कार्य किया होता तो वह जमीन पर सबको दिखता, भाजपा को अपने विकास कार्यों का खुलासा करने के लिए अपने मंत्रियों/संत्रियों/विधायकों/पार्षदों और स्थानीय अनबूझ नेताओं को जनता के बीच न उतारना पड़ता कि जाओं अपनी सरकार के चार साल के विकास कोर्यों को जनता के बीच परोसो। यहाँ मुझे अपना ही एक शेर याद आ रहा है.... 

आज सूरज पर जमीं पर उगा है यहाँ. 
कागजों पर बहुत कुछ हुआ है यहाँ।

मुझे ही नहीं, वोटर को आज लगने लगा है कि भाजपा महज और महज तीन लोगों की राजनीतिक पार्टी बनकर रह गई है। पार्टी के पालनहारों को परामर्श मंडल में डालकर मोदी जी ने और कुछ नहीं हिटलर शाही का ही सुबूत दिया है। हैरत की बात ये भी है कि न तो मोदी सरकार का कोई मंत्री ही और न कोई सांसद ही मोदी की कथनी और करनी पर सवाल करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। भाजपा को शायद इसके अपने नेताओं की चुप्पी ही लेकर न डूब जाए? मोदी जी का इतना टेरर .... बाप रे बाप। किंतु मोदी जी का यह टेरर वोटर पर काम करने वाला नहीं है, बेशक जनता अनजान डर के मारे आजकल शांत है।

मोदी सरकार के चार सालों के कार्यकाल में दलितों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं के साथ अत्याचार के मामलों में लगातार वृद्धि हुई है.... और वह भी भाजपा समर्थक उपद्रवी तत्वों के द्वारा.....। सरकार द्वारा इस प्रकार की घटनाओं की अनदेखी करना ही नहीं, अपितु मूक बने रहना, इस बात की ओर संकेत करता है कि ऐसी घटनाओं के पीछे जुडे हाथों को सरकार का खुला मूक समर्थन रहा है। परिणाम यह होता दिख रहा है कि समाज का दलित, अल्पसंख्यक और महिला वर्ग भाजपा के प्रति बगावती तेवर अपनाए हुए है। शायद भाजपा की पैत्रिक संस्था आरएसएस अब इस सच से रूबरू हो गई है। तभी तो आरएसएस ने भाजपा के मोदी जी को आदेश दिया है कि भाजपा एक कुआं, एक मंदिर और एक श्मशान जैसे मुद्दे उछाल कर समरसता की सियासत करे। सो भाजपा ने चुनावी माहौल को देखते हुए दलित, पिछड़ों और महिलाओं को भाजपाई संगठनों और सरकार में तवज्जो देने का मन बना लिया है। किंतु इस से होगा क्या? कुछ चापलूसों को सत्ता सुख भोगने का मौका दे दिया जाएगा और वो काठ के उल्लू समाज के हितों को ठुकराकर अपने निजी हितों के लिए समाज को सूली पर चढ़ा देंगे। अब क्यूँकि यूपी से चुनावों में हारजीत का फर्क पड़ता है , इसलिए योगी आदित्यनाथ ने आरएसएस की सलाह पर अमल की तैयारी शुरू कर दी है। दलितों और अति पिछड़े समाज के नेताओं को मंत्रिमंडल से लेकर संगठन में जगह देकर तवज्जो देने पर भी बीजेपी में विचार चल रहा है। आने वाले समय मे बड़े वोट बैंक वाले ओबीसी और दलित वोटों पर पकड़ रखने वाले नेताओं को आगे लाया जाएगा।....  माना जा रहा है कि चार और पांच जुलाई को अमित शाह के यूपी दौरे के बाद मंत्रिमंडल में दलितों और पिछड़ों को जगह दी जाएगी। वेस्ट यूपी के पिछड़े वर्ग से गूजर समाज से कोई मंत्री नहीं हैं। दलित की नुमाइंदगी भी कम ही है। अब संगठन की कार्यकारिणी में भी दलितों और पिछड़ों को जगह दी जा रही है। महिला मोर्चा की वेस्ट यूपी अध्यक्ष जाट समाज से बनाई गई हैं। संगठन में एक मंत्री भी मेरठ की जाट समाज की बनाई है। पिछड़े वर्ग के वेस्ट यूपी अध्यक्ष भी मेरठ के अति पिछड़े लोकेश प्रजापति को बनाया गया है। बीजेपी के वरिष्ठ नेता संघ प्रिय गौतम के भजीते मुंशीराम गौतम (दलित) को वेस्ट यूपी इकाई में महामंत्री बनाया है।..... क्या भाजपा की ये योजना दलित, पिछ्ड़ों और अल्पसंख्यकों की बुद्धि हरने के लिए काफी है? यह दलित, पिछ्ड़ों और अल्पसंख्यकों को सोचना होगा।

प्रतिक्रियात्मक दृष्टिकोण से देखा जाए तो भाजपा को छदम नेताओं को गोद लेने का औचित्य तो नजर आता है किंतु जनता की जरूरतों को पूरा करने में भाजपा की कोई रुचि नहीं है। ....कहना अतिशयोक्ति न होगा कि भाजपा अपनी नाकामयाबी से तो आँखे फेरे हुए है और विपक्षी दलों पर अपनी करनी और कथनी आरोप लगाने से बाज नही आ रही है। वो अपने शासन काल के चार सालों की उपलब्धि का हिसाब नहीं देती, अपितु  आजादी के 70 सालों का हिसाब माँगती है। किसी भी सवाल का जवाब उसके पास जैसे है ही नहीं.... वो सवाल का जवाब सवाल करके ही देती है।

भाजपा के एक सीनियर नेता के मुताबिक, सबसे ज्यादा लोकसभा सीटों वाले राज्य यूपी में बड़ी कामयाबी का सरकार बनाने पर असर पड़ता है। संघ का यह मिथ्या विचार ही है। भाजपा अपनी कमजोरी को छुपाने के लिए कहने से बाज नहीं आती कि विपक्षी दलों द्वारा 2017 में हुई सहारनपुर हिंसा और इसी साल अप्रैल में दलित आरक्षण के मुद्दे को लेकर अप्रैल में मेरठ समेत कई शहरों में हुई हिंसा के बाद दलितों के खिलाफ की गई पुलिस कार्रवाई को सीधे तौर पर बीजेपी से जोड़ दिया गया। पार्टी की छवि दलित विरोधी बनाने की कोशिश की गई है। नतीजतन 2014 के बाद 2017 में भी बीजेपी के साथ देने वाले दलितों के बड़े हिस्से ने गोरखपुर्, फूलपुर, कैराना और नूरपुर में मुंह मोड़ लिया। बीजेपी के चार दलित सांसदों ने भी खुलकर पार्टी की नीतियों पर सवाल उठाए थे। उनका विरोध भी किया था। कुछ ऐसा ही हाल पिछड़ों का भी हैं। उनमें भी नाराजगी दिख रही है। जाट और अति पिछड़े किसान के मन में भी कड़वाहट की बातें सामने आती रही हैं। संघ और बीजेपी दोनों इसे लेकर चिंतित हैं।

आरएसएस ने पिछले दिनों मेरठ के राष्ट्रोदय और आगरा से समरसता प्रोग्राम में जातिवाद के खात्मे का साफ संदेश दिया था। दलित समाज के अगृणी लोगों को मंच पर जगह दी थी। हाल ही में दिल्ली में सीएम योगी आदित्यनाथ के साथ संघ की मीटिंग में साफ कहा गया कि जातिवाद को रोको और एक कुआं (नल), एक मंदिर और एक श्मशान के तहत सभी को एक मंच पर लाओ। 

योगी जी! को यह जान लेना चाहिए कि यह कोई जुमले बाजी का मामला नही है। चुनाव के दौरान जुमाला उछाल दो, और चुनाव जीतने के बाद बतलाना वहीं गिरेगा, वाला फोरमूला अब नहीं चलने वाला। मालूम हो कि अक्सर दलितों और अति पिछड़ों के साथ नल या कुंए से पानी भरने पर उत्पीड़न की शिकायतें आती हैं। उनके शवों का हर श्मशान में अंतिम संस्कार नहीं होने दिया जाता। उन्हें सभी मंदिर में पूजा न करने दने पर भी विवाद होते हैं। बीजेपी की केंद्र और प्रदेश में सरकार होने के कारण राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) यह मानकर चल रहा है कि एक कुआं (नल), एक मंदिर और एक श्मशान का झूठा नारा चुनाव में  असर जरूर दिखाएगा। इसलिए पार्टी के लिए इस स्थिति का सामना करने का सबसे अच्छा विकल्प है सामाजिक समरसता की सियासत।.... अब भाजपा से कोई पूछे के ये सामाजिक समरसता क्या होती है, दलितो-पिछ्ड़ों को सामाजिक समरता नहीं, सामाजिक समानता चाहिए। .... भाजपा को चाहिए कि इस बात को अपने गले में उतारले, अब वो ‘समानता’ के बदले ‘समरसता’ का हथियार प्रयोग न करे।... केवल और केवल ‘समानता’... और कुछ नहीं। 

गौतरलब है कि जातिवाद के जहर को खत्म करने के लिए मिशन 2019 में एक कुआं, एक मंदिर और एक श्मशान से सामाजिक समरसता की सियासत पर वह जोर दे रही है। ऐसा उसने अपने मातृ संगठन आरएसएस की सलाह पर करना शुरू किया है। पार्टी मानती है कि यह लोकसभा चुनाव में कामयाबी की कुंजी साबित हो सकती है। ...... किंतु भाजपा को जान लेना चाहिए कि अब केवल फर्जी नारों के बल पर कुछ नहीं होने वाला।

मै पूछता हूँ कि  सहारनपुर हिंसा और मेरठ हिंसा के मामले में योगी सरकार ने क्या किया। रावण को कोर्ट से रिहाई मिलने के बाद भी जेल में डाल दिया। योगी जी रावण को क्यों रिहा नहीं कर रहे? क्या एक आदमी उनके लिए इतना बड़ा खतरा बन गया है कि यदि रावण को रिहा किया तो योगी जी की कुर्सी हिल जाएगी। यदि नहीं तो फिर राबण को रिहा क्यों नहीं किया जा रहा। योगी जी को इस सवाल का जवाब देना होगा अन्यथा दलित, पिछ्ड़े वर्ग के हित में जुमले बाजी बन्द करनी होगी। इस पर भाजपा में शामिल तमाम दलित नेताओं की जुबान पर जैसे ताले पड़ गए और अब ससी-एसटी ऐक्ट पर बोले पासवान ने कहा कि 'सुप्रीम कोर्ट ने जरा भी इधर-उधर किया तो फौरन ऑर्डिनेंस ले आएंगे। केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान अब तक कहाँ थे, चुनाव आए तो अपनी सीट पक्की करने के लिए मैदान में उतर आए...दिखाने लग गए दलित प्रेम... एससी-एसटी ऐक्ट को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि एससी-एसटी ऐक्ट पर सुप्रीम कोर्ट ने जरा भी इधर-उधर किया, तो वह ऑर्डिनेंस ले आएंगे।..... जैसे पासवान जी खुद् ही प्रधान मंत्री हों।  देश के प्रधान मंत्री तो इस मसले पर मूक दर्शक बने हुए हैं। पासवान लखनऊ में सोनेलाल पटेल की जयंती पर आयोजित समारोह में बोल रहे थे। इस मौके पर यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ भी मौजूद थे। 

पासवान ने एक बात तो सही कही कि नेता वहीं होता है, जो धारा के विपरीत नाव खेता है।..... ये उन्होंने बखूबी करके भी दिखाया है... अपनी सीट पक्की करने के लिए पासवान जी दलित हितों को सूली चढ़ाते रहे हैं। पासवान जी की खूबी है को वो संसद में कुछ नहीं बोलते किंतु संसद के बाहर शेर हो जाते हैं...ऐसे बयान देते है जैसे वो ही सर्वोपरि हैं। पासवान यहाँ तक कह गए कि आरक्षण सात जन्मों तक खत्म नहीं होगा।  पासवान ही नहीं और भी दलित नेताओं की आँख की किरकिरी बनी हुई मायावती ही उनके निशाने पर रहती हैं... गैरदलित नेता तो जैसे  उनके माई-बाप हैं। 

सोचने की बात है कि भाजपा पिछले 70 साल की बात तो करती है किंतु अपने चार सालों की बात  नहीं करती। दैनिक भास्कर 03.07.2018 :भारत में प्रतिदिन 55 बच्चियों के साथ दुष्कर्म हो रहा है। मोदी सरकार क्या यह बता पाएगी कि हमारी बेटियाँ आने वाले समय में कब सुरक्षित हो पाएंगी। देश भयावह दौर से गुजर रहा है।.. मोदी जी! आपके राज में तेरे राज में बेटी सुरक्षित नहीं हैं। यह एक अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्त में कहा गया है।

मोदी जी! आपका गोदी मीडिया बलात्कार को मनोरंजक और सनसनी बनाकर पेश करता आया है जिससे बलात्कार जैसे अति संवेदनशील मसले लोगो के मनोविज्ञान में का सामान्यीकरण हो चुका है.. काफी कुछ मसाला फिल्मों के बारे बलात्कार सीन की तरह जो जुगुप्सा और क्रोध नहीं मनोरंजन देती हैं...क्या आपको यह कृत्य पीड़ा नहीं देता? 

नवभारत टाइम्स – 03.07.2018 के अनुसार बर्बरता निरंकुश होती जा रही है। भीड़ द्वारा पीट-पीटकर मार डालने की वहशियाना घटनाओं का भूगोल चिंताजनक रूप से फैलता जा रहा है। रविवार को महाराष्ट्र के धुले जिले में पांच लोगों को बच्चा चोर गिरोह का सदस्य होने के संदेह में मार डाला गया। गुरुवार को त्रिपुरा में और पिछले महीने असम में भी ठीक इसी संदेह में तीन-तीन लोगों को भीड़ ने इसी तरह पीट-पीट कर मार डाला। पिछले हफ्ते गुजरात में 40 साल की एक महिला भी बच्चा चोरी की ही अफवाह पर मार डाली गई। देश के अलग-अलग हिस्सों से लगातार अजनबियों के खिलाफ भीड़ की हिंसा से जुड़ी खबरें आ रही हैं। कहीं बच्चा चोर कहकर तो कहीं जानवर चोर बताकर बेकसूर लोग मारे जा रहे हैं। पिछले साल देश के अलग-अलग हिस्सों में गोरक्षा के नाम पर भीड़ द्वारा हत्या का सिलसिला चल रहा था, जो छिटपुट आज भी जारी है। लेकिन आठ-दस महीने के अंतराल के बाद रक्तपात की यह नई लहर आई है। इन घटनाओं का एक निश्चित पैटर्न भी है। हर मामले में हत्या से पहले वॉट्सऐप के जरिए ऐसी अफवाह फैलाई जाती है। अफवाहें पहले भी फैलती रही हैं। इनसे लोग प्रभावित भी होते रहे हैं। ऐसे में वे ज्यादा चौकस हो जाएं, गांव-मोहल्ले में पहरा देने लगें, यह स्वाभाविक है। लेकिन पकड़े गए लोगों को मौके पर ही पीट-पीटकर मार डाला जाए, यह स्वाभाविक नहीं है। पुलिस की जरूर अपनी सीमा है। हर मामले में पुलिस तुरंत मौके पर पहुंच जाए, यह संभव नहीं है। लेकिन कानून हाथ में लेने वालों को पुलिस पकड़ लेगी और उनकी जिंदगी का एक हिस्सा थाना, कचहरी और जेल के हवाले हो जाएगा, यह बात लोगों के दिलो-दिमाग से गायब कैसे हो जाती है/ संदिग्धों को पुलिस के हवाले करने की बात उन्हें क्यों याद नहीं रहती/ क्या कथित भीड़ में शामिल लोगों को अब किसी न किसी वजह से यह भरोसा रहने लगा है कि पुलिस उनके खिलाफ नहीं जाएगी/ यह इस मामले का एक अहम पहलू है, लेकिन इसके कुछ और ज्यादा जटिल पहलू भी हैं और वे कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। जैसे, प्राय: ऐसी हर घटना का विडियो बनाया जाता है और उसे सोशल मीडिया पर प्रसारित भी किया जाता है। यानी मामला सिर्फ यह नहीं है कि अफवाहों से परेशान लोग गुस्से में किसी की जान लेने पर उतारू हो जा रहे हैं। बल्कि उनमें कुछेक ऐसे लोग भी हैं, जो इस कृत्य को अच्छी बात की तरह ग्रहण करते हैं और इसका इस्तेमाल अपनी शान बढ़ाने में करना चाहते हैं। यह एक गंभीर सामाजिक मनोरोग की स्थिति है, जिसका निदान तो दूर, जिसके खतरों को भी हम ठीक से नहीं समझ पा रहे हैं। इसे जल्दी रोका नहीं गया तो बच्चों, स्त्रियों, बुजुर्गों और कमजोर मनोदशा वाले लोगों का घर से निकलना मुश्किल हो जाएगा।

मोदी जी! शायद आप इस हकीकत से रूबरू नहीं होंगे। शायद इसलिए किए आपके लिए भारत में रहने की अपेक्षा विदेशों की यात्रा करने में ज्यादा रुचि है। ऐसे हालात में आप गहन विचार कीजिए कि 2019 के चुनाव में आपका क्या होगा। क्या दलित, पिछड़ा, अल्प्संख्यक और महिला वर्ग आपका उसी तर्ज पर समर्थन करेगा जैसा कि 2014 में किया था? दलित, पिछड़ा, अल्प्संख्यक और महिला वर्ग को भी यह समझने की जरूरत है कि वो भाजपा के इस चुनावी जाल में फंसने से बचे और केवल नारों के बल पर ही नहीं, अपने भले और बुरे को देखते हुए अपने कीमती वोट का इस्तेमाल करे। 

भाजपा इस बार भी विभिन्न प्रकार के भ्रमित जुमले फंकने का काम जरूर करेगी, उसकी यह आवश्यकता भी है, किंतु हमें अपनी आबश्यकताओं को नहीं भूलना चाहिए। इस बार भी धोके में आने से बचें। एक कुआं (नल), एक मंदिर और एक श्मशान का वायदा बेशक कभी न पूरा होने वाला नहीं है। दरअसल भाजपा की पैत्रिक संस्था हमेशा ऐसे वायदे जनता के सामने परोसती है जो कभी पूरा न होने वाले हों। हाँ। संवेदनशील जरूर हों।



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