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काश, समय से पहले ना गए होते कांशीराम....

कांशीराम जी की 11वीं पुण्यतिथि पर विशेष...

ये कहने में शायद किसी को कोई ऐतराज नहीं होगा कि बाबा साहब के बाद कांशीराम जी बहुजनों के सबसे बड़े नेता थे। और उनकी असमायिक मौत से बहुजन समाज का जो नुकसान हुआ है वो बहुजन समाज आज भी महसूस करता है। कांशीराम जी के सहयोगी और बहुजन राजनीति से जुड़े लोग आज भी कहते हैं, अगर कांशीराम जी 10 साल और जी जाते तो ना सिर्फ बहुजन राजनीति बल्कि देश की राजनीति की दशा-दिशा ही कुछ और होती। समय से पहले कांशीराम जी का चले जाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। 

कांशीराम जी का जन्म सिख समुदाय के रमदसिया परिवार में 15 मार्च 1934 को पंजाब के रोपड़ जिले के ख्वासपुर गांव में हुआ था। उनकी माता जी का नाम बिशन कौर और पिताजी का नाम हरी सिंह था। उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय के रोपड़ राजकीय कालेज से स्नातक किया और डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट आर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ) महाराष्ट्र के पूणे में नौकरी की। लेकिन नौकरी के दौरान जातिगत भेदभाव से आहत होकर उन्होंने बाबा साहब भीमराव अंबेडकर, ज्योतिबा फुले और पेरियार को पढ़ा और दलितों को एकजुट करने में जुट गए। उन्होंने ‘पे बैक टू सोसाइटी’ की बात की और दलित कर्मचारियों को अपने वेतन का 10वां हिस्सा समाज को लौटाने का आह्वान किया।

आखिर कैसे एक साधारण से परिवार और वंचित समाज से संबंध रखने वाला युवक कांशीराम से सामाजिक राजनीतिक चेतना का नायक मान्यवर कांशीराम बन गया... इस लंबे सफ़र में बहुत सारी यादें और अनुभव जुड़े हैं, उनका ये सफर कैसे शुरू हुआ ?  यह बेहद दिलचस्प और प्रेरक प्रसंग है। उस समय वे पूणे में एक्स प्लोसिव रिसर्च एंड डेवलपमेंट  लेबोरेट्री (ई. आर. डी.एल.) में अनुसन्धान सहायक के पद पर कार्यरत थे। लेकिन उनकी की रूचि सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों की तरफ होने लगी थी। नौकरी के दौरान ई. आर. डी,एल. में एक ऐसी घटना घटी जिसने कांशीराम जी को जो साधारण से असाधारण बना दिया, अगर ये घटना उनके साथ ना घटी होती तो वे शायद गुमनामी में ही रह जाते, और करोडों लोगों के मान्यवर कांशीराम ना बन पाते। दरअसल ई. आर. डी,एल. ने बुद्ध जयंती व अम्बेडकर जयंती के अवकाश को निरस्त करने का निर्णय लिया और जब इसका विरोध वहीं के एक कर्मचारी ने किया तो उसे नौकरी से निलंबित कर दिया गया।  कांशीराम से ये सब नहीं देखा गया,  और उन्होंने अपने मित्रो-सहकर्मियों के मना करने के बावजूद उस निलंबित कर्मचारी की मदद की और न्यायालय में इसके विरोध में याचिका दायर की, जिसके बाद न्यायालय ने निलंबित कर्मचारी के निलंबन को रद्द किया और बुद्ध व अम्बेडकर जयंती दोनों के अवकाश को बहाल किया।    

अपने शुरूआती दौर में उन्होंने महाराष्ट्र रिपब्लिक पार्टी तथा डॉ अम्बेडकर द्वारा स्थापित पीपुल्स एजुकेशन सोसायटी के लिए काम शुरू किया | लगभग ४ वर्षो तक इन संगठनो में कार्य करने के पश्चात् कांशीराम ने अनुभव किया कि इन संगठनो में आन्तरिक मतभेद बहुत है। उन्होंने एक नया संगठन बनाने और शोषित समाज को एक साथ लाने कि दिशा में सोचा और 6 दिसम्बर 1973 को दिल्ली के चन्द सरकारी कर्मचारियों को साथ लेकर बामसेफ का गठन किया।  बामसेफ को अखिल भारतीय स्वरुप देने में कांशीराम को 5 वर्षो का समय लगा और 6 दिसम्बर 1978 को दिल्ली में ही बामसेफ की औपचारिक घोषणा की। 6 दिसंबर 1981 को उन्होंने दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदाय को जोड़ने के लिए डीएस-4 का गठन किया। डीएस-4 के जरिए सामाजिक, आर्थिक बराबरी का आंदोलन आम झुग्गी-झोपड़ी तक पहुंचाने में काफी मदद मिली। इसको सुचारु रूप से चलाने के लिए महिला और छात्र विंग में भी बांटा गया। जाति के आधार पर उत्पीड़न, गैर-बराबरी जैसे सामाजिक मुद्दों पर लोगों के बीच जागरूकता और बुराइयों के खिलाफ आंदोलन करना डीएस-4 के एजेंडे में रहे।  

माननीय कांशीराम ने जातीय गणित को समझा और बंटी हुई छोटी जातियों को बहुजन में बदलने का काम शुरू किया। इसके लिए उन्होंने नया नारा दिया ‘जाति तोडो समाज जोडो’। उन्होने जातीय पहचान  को वर्गीय पहचान  मे बदला। और 6743 जातियों में में बंटे बहुजन समाज को एकजुट किया। आपसी भार्इचारा बढाने के के लिए उन्होंने सम्मेलन आयोजित किए। उन्होंने गांधी द्वारा दिए गए ‘हरिजन’ शब्द को भी चुनौती दी। उन्होंने ही लोगों को ये समझाया कि एससी,एसटी,ओबीसी वर्ग,  85 प्रतिशत बहुजन हैं और 15 प्रतिशत शासक जातियां अल्पजन हैं। उन्होंने ही समझाया कि बडी विडम्बना है कि 85 प्रतिशत पर 15 प्रतिशत शासन कर रहा है। उन्होंने कहा कि हमें शासक बनना है, और इन 15 प्रतिशत पर राज करना है।

उन्होंने बहुजन आंदोलन प्रारम्भ करने से पूर्व आरएसएस, वीएचपी, बीजेपी का भी अध्ययन किया और इसको काउन्टर करने के लिए उन्होंने तीन संगठन बनाये। बामसेफ एक सांस्कृतिक संगठन था जो कि आंदोलन के लिए ब्रेन का काम करता था और इसका उद्देश्य आंदोलन के लिए मानव संसाधन और आर्थिक संसाधन निर्माण करना था और पूरे आंदोलन पर वैचारिक नियंत्रण रखना था।   बामसेफ संगठन गैर राजनैतिक (Non Political), गैर धार्मिक (Non Religious), गैर संघर्षात्मक (Non Agitational) था अर्थात यह संगठन आरएसएस के सामान्तर में बनाया गया। दूसरा संगठन उन्होंने डीएस-4 बनाया जो कि संघर्षात्मक (Agitational) संगठन था और इसका उपयोग वही था जो आरएसएस के लिए वीएचपी का है। तीसरा संगठन बीएसपी राजनैतिक संगठन था जैसे कि आरएसएस के लिए बीजेपी है। कांशीरामल जी के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक अभियानों में उनकी 3000 किलोमीटर की साइकिल यात्रा उल्लेखनीय है, जिस दौरान वे हजारों लोगों से सीधे मिले और लाखों लोगों तक अपनी बात पहुंचाई।

कांशीराम जी ने 2 से 8 दिसंबर, 1982 तक जापान के ओसाका शहर में 'विषमता के विरुद्ध जातिगत परिषद' में विश्वभर के मानव अधिकार संगठनों के प्रतिनिधियों को भारतीय दलित-शोषित की समस्याओं से अवगत कराया। इस कार्यक्रम का आयोजन जापान के बुराका लिबरेशन लीग ने किया था। बामसेफ और साथ ही साथ डी एस फोर द्वारा चलाए गए जन-जागरण अभियान और आंदोलनात्मक गतिविधियों और चुनावी राजनीति में प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराकर एक मुकाम हासिल कर चुका था। इस सफलता से प्रसन्न होकर मान्यवर कांशीराम ने 14 अप्रैल 1984 को दिल्ली के बोट क्लब मैदान में 'बहुजन समाज पार्टी' की स्थापना का ऐलान कर दिया। 18 अगस्त, 1984 से 31 दिसंबर, 1984 तक बहुजन समाज पार्टी ने 'आरक्षण हिस्सेदारी का सवाल' विषय पर देशभर में 5 विशाल सेमीनार और 500 संगोष्ठियां आयोजित की। 1993 का उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव कांशीराम जी की रणनीति के तहत एसपी और बीएसपी ने मिलजुल कर लड़ा, जिसका परिणाम बेहद सफल रहा और उत्तर प्रदेश में एसपी-बीएसपी गठजोड़ की सरकार बनी। 16 जून, 1995 बहुजन आंदोलन के इतिहास में महत्वपूर्ण दिन बन गया, जब देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में बहन मायावती पहली बार मुख्यमंत्री बनी। इसके बाद वोट प्रतिशत के हिसाब से बीएसपी देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी। और भारतीय राजनीति में एक नए अध्याय का आगाज़ हुआ जिसमें दलितों का भी दखल था। कांशीराम जी रणनीति के कारण ही एक छ्त्र वर्चस्व वाली पार्टियों ने दलित महत्व को समझा और जाना। बहुजन समाज पार्टी और कांशीराम जी की ताकत को इस तरह समझा जा सकता है कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बार उन्हें राष्ट्पति बनाने की पेशकश की थी, लेकिन लेकिन कांशीराम जी ये प्रस्ताव ठुकरा दिया था।

कांशीराम जी 1991 में वे पहली बार यूपी के इटावा से  लोकसभा का चुनाव जीते। 1996 में दूसरी बार लोकसभा का चुनाव पंजाब के होशियारपुर से जीते।  2001 में सार्वजनिक तौर पर घोषणा कर कुमारी मायावती को उत्तराधिकारी बनाया।  

कांशीराम जी हर फ्रंट पर काम कर रहे थे, वे मीडिया की ताकत को भी समझ रहे थे, उऩ्हें एहसास था कि मीडिया ब्राह्मणवादी लोगों के हाथों में है और हमें अपना मीडिया खुद खड़ा करना पड़ेगा। इसके लिए उन्होंने बहुत सी पत्र-पत्रिकाएं शुरू की, जिनमें अनटचेबल इंडिया (अंग्रेजी), बामसेफ बुलेटिन (अंग्रेजी), आप्रेस्ड इंडियन (अंग्रेजी), बहुजन संगठनक (हिन्दी), बहुजन नायक (मराठी एवं बंग्ला), श्रमिक साहित्य, शोषित साहित्य, दलित आर्थिक उत्थान, इकोनोमिक अपसर्ज (अंग्रेजी), बहुजन टाइम्स दैनिक, और बहुजन एकता शामिल हैं।  

कांशीराम जी ने जो किया वो भारतीय राजनीति में कभी नहीं हुआ था। उनके जाने के बाद क्या कभी ऐसा हो पाएगा, ये सवाल सभी बहुजनों को परेशान करता है। 2004  में कांशीराम जी को लकवा मार गया और बहुजन राजनीति का तेजी से बढ़ता सफर रुक गया। जिससे बहुजन आंदोलन का बड़ा झटका लगा, जिसके बाद अभी तक बहुजन आंदोलन उस ट्रेक पर नहीं आ पाया है जिस पर होना चाहिए था, या जिस गति में कांशीराम जी ने छोड़ा था।

कांशीराम जी बौद्ध धर्म स्वीकार करना चाहते थे और इसके लिए उन्होंने 2006 में अक्टूबर का दिन भी तय कर लिया था। लेकिन उनके स्वास्थ्य में सुधार नहीं हो सका और 9 अक्टूबर 2006 को दिल्ली के हुमायूं रोड पर दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।  
कांशीराम जी की 11वीं पुण्यतिथि पर 'पड़ताल' परिवार उन्हें कोटि-कोटि श्रद्धांजलि अर्पित करता है।  



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