img

साजिश का शिकार हो रहा है बहुजन समाज- डॉ. शत्रुघ्न कुमार

डॉ. शत्रुघ्न कुमार एक नाम है उस विचार धारा का, जो हाशिये पर रखे गए लोगों की आवाज को अपने लेखन से बुलंद कर रहे हैं । बिहार में दुमका जिले के मेहीजाम में 3 जून 1956 को जन्में डॉ. शत्रुघ्न कुमार दिल्ली में इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू)  के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर के रूप में सेवाओं के जरिये शिक्षा की अलख जगा रहे हैं । ‘पड़ताल’ की टीम ने उनसे कुछ ख़ास मुद्दों पर ख़ास बातचीत की ।  
     
डॉ. शत्रुघ्न कुमार जी बातचीत की शुरुआत में सबसे पहले आप अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि और शिक्षा-दीक्षा के बारे में बताएं ?
हमारी जड़ें मूलरूप से पंजाब के सरगोधा से जुड़ी हैं । मेरे दादा जी पंजाब से आकर बिहार के भोजपुर जिले में बस गए थे, जो 5 भाषाओं के विद्वान थे । मेरे पिता जी भी बिहार में पुलिस विभाग में उच्च पद पर रहे थे, जिनकी ट्रांसफर-पोस्टिंग के दौरान हमें अलग-अलग जिलों में रहने का सौभाग्य और भाषा संस्कृति से रू -ब-रू होने का अवसर मिला । मेरा जन्म भी दुमका जिले में हुआ था । मैंने पश्चिम बंगाल के कोलकाता (उस समय के कलकत्ता ) में प्रसिद्ध शिक्षण संस्थान ‘विश्व भारती’, शांतिनिकेतन से स्नातक से लेकर पी-एच.डी. की डिग्री प्राप्त की और चित्रकला में विशेष योग्यता हासिल की । परिवार वाले मुझे चित्रकार बनाना चाहते थे ।  लेकिन मेरे हाथ में कलम आ गई, जिससे समाज का चित्रण कर रहा हूं ।

 
डॉ. शत्रुघ्न कुमार जी क्या आपने कभी किसी भी प्रकार का जातीय उपहास महसूस किया ?
 चीजों को देखने समझने की मेरी सोच बचपन से ही कुछ अलग रही है, इसलिए मैं चीजों को बहुत ही गहराई से सोचने समझने की कोशिश करता रहा हूं ।  शांति निकेतन जाने से पहले पटना में या जहां भी पिताजी का ट्रांसफर हुआ मैंने महसूस किया कि हम और लोगों से कुछ अलग हैं या हमें कुछ अलग नजर से देखा समझा जाता है । मुझे महसूस हुआ कि हमें कई स्तर पर दोयम दर्जे का समझा जाता था ।  मुझे कई बार ऐसा लगा कि मेरी योग्यता के अनुसार मुझे कम अंक दिए जाते थे, लेकिन मैंने इस चीज को कभी अपने ऊपर हावी होने नहीं दिया, उल्टा मैं और ज्यादा मेहनत करके अच्छे नंबर लाने की कोशिश करता था ।

साहित्य रचना की तरफ आपका झुकाव कब से और कैसे शुरू हुआ
?
 जब मैं शांति निकेतन में पढ़ रहा था उस समय बाबू जगजीवन राम देश के प्रधानमंत्री बनने की तरफ बढ़ रहे थे, लेकिन उन्हें प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया गया तो उस समय मुझे बहुत दुख हुआ था कि एक अछूत जाति से संबंध रखने के कारण उन्हें प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया गया । इसके बाद मुझे इतना दुख हुआ कि मैंने पहली बार कुछ लिखा था, फिर उसके बाद मैं लाइब्रेरी गया और वहां मेरी नजर रवींद्रनाथ ठाकुर की किताब ‘चंडालिका’ पर पड़ी और मैंने उसे पूरा पढ़ा और ‘अछूत कन्या’ के नाम से उसका हिन्दी में अनुवाद किया । लेखन में जो मैंने पहली कहानी लिखी वो भोजपुरी में लिखी थी ।

आपके लेखन में दलित होने का दर्द झलकता है ऐसा क्यों ?
 क्योंकि मैं दलित परिवार से हूं और मैंने वो दंश सहा और देखा है, इसलिए मेरा लेखन भी उसी दिशा में हुआ है । मैं इग्नू की स्थापना के शुरुआती दौर में 1987 में ही दिल्ली आ गया था। उसके बाद मैंने यहां जो देखा और सहा वो कहानियों, कविताओं और लेखों के माध्यम से प्रकट होता चला गया ।

आपकी अपनी सबसे पसंदीदा किताब या कहानी जिसकी चर्चा आप करना चाहेंगे
?
मेरी एक किताब है ‘हिस्से की रोटी’ उसका कहानी संग्रह आप देखेंगे तो आपको लगेगा कि वो किसी एक पर केंद्रित ना होकर समाज में व्याप्त अलग-अलग हिस्सों और दर्द को झलकाती है, इसलिए किसी एक को पसंदीदा कहना गलत होगा, क्योंकि अपनी हर कहानी, किताब में मैं खुद या मेरे आसपास के ही पात्र हैं, जो प्रकट होते चले गए । मैंने हमेशा ये कोशिश की है कि समाज में जो जातिवाद, भेदभाव है उसे खत्म करने के लिए मैं कैसे लिखूं और क्या चरित्र गढ़ूं, जिससे अत्याचार झेलने वाला और अत्याचार करने वाला इस बात को समझे कि इससे समाज को ही नहीं देश को भी कितनी हानि हो रही है । इसलिए इस व्यवस्था को खत्म किया जाए ।

इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय की नींव ही रखी गई थी कि उस वंचित समाज के लिए जो हमेशा से ही शिक्षा से वंचित रहा है, क्या आपको लगता है कि इग्नू अपने इस उद्देश्य को पूरा कर पाया है?
इग्नू विश्वविधालय दूर शिक्षा पद्वति पर आधारित है ये सिस्टम पहली बार भारत में इंग्लैंड से लाया गया था, जिसका उद्देश्य बहुत बड़ा था । जिसके तहत समाज के वंचित वर्ग तक शिक्षा पहुंचाना था, इसका मुख्य उद्देश्य था कि समाज के जिस वर्ग तक शिक्षा नहीं पहुंची है उस वर्ग तक शिक्षा पहुंचाई जा सके, लेकिन भारत की जाति व्यवस्था इस तरह से लोगों की रग रग में समाई हुई है, कि वो किसी प्रकार के अविष्कार या उद्देश्य को खत्म कर देती है । जिसके चलते इसकी स्थापना का उद्देश्य अभी अधूरा रहा । साथ ही इसके लिए वे लोग भी जिम्मेदार हैं, जिनके लिए इसके द्वार खोले गए थे, मैने बहुजन समाज में ये दोष देखा है कि वो जागरुक नहीं होता है, उल्टा जिन लोगों के पास पहले से ही शिक्षा है उन्हीं लोगों ने इसका लाभ उठाया है । इग्नू का प्रचार-प्रसार करने के लिए देश के कोने कोने से परामर्शदाता (काउंसलर) की नियुक्ति और की जाती हैं, जो बहुत गलत तरीके से होती रही हैं, मैंने कई बार ये मामला इग्नू की मैनेजमेंट कमेटी में उठाया है और कई बार ये कोशिश की कि परामर्शदाता के साथ-साथ संयोजक की भी नियुक्ति की जानी चाहिए, जिससे बहुजन समाज को उचित प्रतिनिधित्व मिले सके।  ताकि वे हर तबके तक शिक्षा की जागरुकता फैलाएं और ऐसे लोगों तक जाकर ये बताएं कि उन्हें कैसे और क्या शिक्षा यहां से मिल सकती है और वो इसका फायदा उठा सकते हैं । आज करीब सवा लाख परामर्शदाता इग्नू के लिए काम कर रहे हैं, लेकिन बहुजन समाज की संख्या उसमें लगभग नगण्य है।

आपके प्रयासों के कारण ही इग्नू में दलित साहित्य को पाठ्यक्रम में जोड़ा गया जिसमें ‘जूठन’ को शामिल किया गया ।  क्या आप महसूस कर रहे हैं कि इसे फैकल्टी या छात्र इस पाठ्यक्रम को स्वीकार कर रहे हैं ?
दलित साहित्य को लेकर हमने आंदोलन भी किया है, जब मैं दलित साहित्य को पाठ्यक्रम में जोड़ने का प्रयास कर रहा था तो मेरे ही कुछ साथियों ने कहा था कि क्या अब साहित्य में आरक्षण लागू होगा । तब मुझे बहुत हंसी आई थी, क्योंकि साहित्य में आरक्षण कैसे लागू हो सकता है, लेकिन जो लोग दलित साहित्य लिख रहे हैं, जिसमें वो ऐसे हजारों सवाल खड़े कर रहे हैं, जिसका जवाब देश को देना ही होगा । इस पाठ्यक्रम की स्वीकार्यता आज सर्वमान्य है और पूरे विश्व में दलित साहित्य पढ़ा जा रहा है, ज्यादा से ज्यादा लोग इस पाठयक्रम को ले रहे हैं और पसंद कर रहे हैं । लेकिन ये काम इग्नू में 20 साल पहले हो जाना चाहिए था ।

दलित साहित्य को कहां और कैसे देखते हैं ?
जब तक इस देश में जाति व्यवस्था है तब तक दलित साहित्य रचा जाता रहेगा ।  जब विश्वविद्यालयों में ये पाठ्यक्रम के रूप में जुड़ रह है और विश्व में इस पर चर्चा हो रही है कि दलित साहित्य कोई काल्पनिकता पर आधारित नहीं है । आज की दुनिया वास्तविकता में जीना चाहती है और पढ़ना चाहती है । इसलिए मुझे लगता है दलित साहित्य व्यष्टि से समष्टि तक जाता है । क्योंकि ये कुछ विशेष वर्ग तक के लोगों तक सीमित नहीं है । ये पूरे समाज को बदलने की क्षमता रखता है ।

क्या दलित साहित्यकारों को दोहरी लड़ाई लड़नी पड़ रही है, जहां उन्हें हिन्दी साहित्य में जगह बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, वहीं दलित साहित्यकारों के बीच भी वर्चस्व की लड़ाई जारी है । जिसका असर दलित साहित्य के लेखन पर पड़ रहा है ?
जो लेखक समाज के लिए लिख रहा है, उसे तो इस बात की चिंता ही नहीं होनी चाहिए कि वो हमसे आगे लिख रहा है या हम उससे पीछे जा रहे हैं । इस देश में जाति व्यवस्था के कारण इतनी सारी समस्याएं हैं, जिनसे लड़ना बहुत कठिन है, मुझे तो ऐसा लगता है कि हजारों लाखों दलित साहित्यकारों की जरूरत है तब कहीं जाकर समाज में बदलाव आएगा, क्योंकि दलित साहित्य कोई मनोरंजन का साधन नहीं है । दलित साहित्य एक आंदोलन है, जिसमें समाज को बदलने की प्रक्रिया चल रही है । ब्राह्मणवादियों की ये साजिश हो सकती है कि वो इनके बीच विघटन के प्रपंच रच रहे हों ।

सहयोगी ना मिलने के कारण नए साहित्यकारों को मौका नहीं मिल पाता, जिसके चलते बहुत अच्छा साहित्य विचार बाहर ही नहीं आ पा रहा  है ? दलित साहित्य के नाम पर जो पत्रिकाएं या सोशल मीडिया पर दलित समाज की वेबसाइड चल रही हैं उन्हें कोई अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा है, लेकिन हमें कोई रास्ता निकालना पड़ेगा, आज बाबा साहब के कारण हम समृद्ध हैं । हमें अपने प्रकाशन स्थापित करने होंगे । भारत में पढ़ने पढ़ाने की परंपरा नहीं रही है । हमें दलितों में पढ़ने की ललक जगानी होगी, जब ये ललक जागेगी तो सहयोग भी मिलेगा । मुख्य धारा में आपको कितनी जगह दी जाती है इस देश में जाति व्यवस्था कूट कूटकर भरी है और इस व्यवस्था को मजबूती से बनाए रखना चाहते हैं । ऐसे में वे इस तरह के लेखन को प्रवेश ही नहीं देना चाहते ।

वर्तमान दलित राजनीति के बारे में क्या सोचते हैं ?
बसपा को ही दलितों की पार्टी के रूप में जाना जाता है और मायावती को दलित नेता के तौर पर जाना जाता है । इनके अलावा सभी नेता जो दलितों के नाम पर राजनीति कर रहे हैं वो दूसरी विचारधारा में खोकर रह गए हैं ।  बसपा में ही एक विचारधारा को ताकत मिली कि हम किसी से कम नहीं, लेकिन आज बसपा जिस तरह से हाशिए पर गई है ये बहुत सोचनीय है । इसके बहुत सारे कारण हो सकते हैं, जिनके बारे में सोचा जाना चाहिए । बहुजन समाज साजिश का शिकार हो रहा है । बहुजन समाज को अपना क्षणिक लाभ छोड़कर सोचना होगा । जिस जातिवादी किले को बाबा साहब अंबेडकर ने तहस नहस कर दिया था, उस किले को फिर से खड़ा किया जा रहा है । फिर से उसकी नींव डाली जा रही है, इसे गंभीरता से समझना होगा ।

आपने किस विधा में लिखा है और अब तक कितनी किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं
? मेरी करीब 12 किताबें है और 150 से ज्यादा आलेख हैं, 40 से ज्यादा पाठ्यक्रम मैंने तैयार किए हैं, मैं लगातार भोजपुरी में भी लिखता रहा हूं।  
   
आपने रोमानिया मे करीब तीन वर्ष अध्यापन किया । तो वहां के और भारतीय समाज में आपको क्या फर्क महसूस हुआ ?
मुझे रोमानिया जाने का मौका मिला नहीं था, वो मैंने छीना था, क्योंकि मुझसे इंटरव्यू में जाति पूछी गई थी, जिसका मैंने बहुत विरोध किया । इसलिए उन्हें मुझे वहां भेजना पड़ा। अब भी साजिश के तहत मुझे दोबारा रोमानिया जाने से रोका गया है, जबकि दूसरे लोग कई-कई बार जा चुके हैं और अब भी जा रहे हैं। भारत में जाति व्यवस्था है, लेकिन रोमानिया में ऐसा कुछ नहीं है । वहां पर अमीरी गरीबी है, लेकिन ऐसी मानसिकता नहीं है कि अगर ये दूसरी जाति या अमीर-गरीब है तो वो हमसे आगे ना बढ़ जाए, वहां धर्म का निजी जिंदगी से कोई लेना देना नहीं है कोई चर्च जाए या ना जाए इससे किसी को कोई लेना देना नहीं है । धर्म किसी पर थोपा नहीं जाता है ।

क्या साहित्यिक सरकारी पुरस्कारों में दलित साहित्यकारों की अनदेखी की जाती है ? चुनाव करने वाले जातिवादी मानसिकता के होते हैं । इसलिए वो भेदभाव करते आ रहे हैं, लेकिन हमें ये आवाज उठानी चाहिए कि दलित भी साहित्यकार हैं और इन पुरस्कारों में दलितों की हिस्सेदारी होनी चाहिए । वो दलित साहित्य के बारे में सोचना ही नहीं चाहते और उसे दबाए रखने की कोशिश करते हैं, जो बहुत दुखद और खतरनाक है ।

प्रसिद्ध गीतकार शैलेंद्र आपके रिश्तेदार थे, उनकी प्रतिभा के चलते उन्हें जो सम्मान मिलना चाहिए था वो नहीं मिला, आप क्या सोचते हैं ?
वो इतने अच्छे गीत दुनिया को इसलिए दे सके, क्योंकि वो एक वंचित समाज से संबंध रखते थे और इसलिए उनके जैसा कोई और लिख ही नहीं सकता था ।  उनके नाम से कोई एकेडमी, कोई पुरस्कार तक घोषित नहीं किए गए । मैने पहले भी कई बार उन्हें भारत रत्न दिलाने की मांग की थी, भारत सरकार को इस बारे में सोचना चाहिए ।  क्योंकि ऐसी धनी प्रतिभा के व्यक्ति को भी वो जाति के तराजू से देखना बहुत दुख पहुंचाता है

मीडिया के नए माध्यम सोशल मीडिया के क्षेत्र में न्यूज़ पोर्टल ‘पड़ताल’ की शुरुआत हुई है, इसकी  टीम के लिए आपका क्या संदेश है ?  
सबसे पहले तो मेरी तरफ से ‘पड़ताल’ की पूरी टीम को बहुत-बहुत बधाई । सोशल मीडिया के क्षेत्र में आप जो ये काम कर रहे हैं, वो बहुत ही महत्वपूर्ण और सराहनीय है । इसमें अपने और दूसरों के विचारों को जांच परख कर रखने की जरूरत है । मुझे उम्मीद है कि आप लोगों की इस पहल से बहुजन समाज में बड़े बदलाव आएंगे और ज्ञान की जोत जलाएंगे ।

 ***************  डॉ. शत्रुघ्न कुमार जी का जीवन परिचय  ***************

जन्मतिथि/स्थान- (3 जून, 1956), मेहीजाम, जिला दुमका, बिहार

माता-पिता का नाम- श्रीमती रेश्मा देवी, श्री राजेंद्र प्रसाद

शिक्षा- एम.एम., पी-एच.डी., बांग्ला भाषा तथा जापानी भाषा में सर्टिफिकेट, चित्रकला में विशेष योग्यता, संस्कृत स्नातक तक

भाषा दक्षता- हिन्दी (तीन उप बोलियां- भोजपुरी, मैथली, मगही सहित), अंग्रेजी, बांग्ला, जापानी, उर्दू और बोल-चाल की रोमानियने
विशेषज्ञता- तुलनात्मक भारतीय साहित्य, दलित साहित्य, कबीर साहित्य अनुवाद, चित्रकला, मानवाधिकार, बुद्ध धम्म, भारतीय संस्कृति प्रकाशन- रवीन्द्रीनाथ ठाकुर की रचना ‘चंडालिका’ अनूदित प्रकाशित, भानुसिंह की पत्रावली अनूदित प्रकाशित, इग्नू में 50 से ज़्यादा स्वलिखित पाठ सामग्री प्रकाशित, पत्र-पत्रिकाओं में आलेख,कविता प्रकाशित, ‘हिस्से की रोटी’ (कहानी संग्रह), ‘अग्निशिखा’ (कविता संग्रह), ‘हिन्दी में दलित साहित्य’, ‘दलित आंदोलन के विविध पक्ष’ समेत कई अन्य किताबें प्रकाशित

शोध- रोमानिया में रोमा के (जिप्सी) संस्कृति पर शोध-कार्य किया (2002-2003)

राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन- 14-18 सितंबर, 1999 को लंदन में आयोजित छठे विश्व हिन्दी सम्मेलन में ‘दलित साहित्य’ पर पर्चा पढ़ा, मार्च 2002 में हंगरी की राजधानी ‘बुडपेस्ट’ में आयोजित  अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सस्मेलन में ‘रोमानिया के भारत प्रेमी’ पर आलेख प्रस्तुत किया

पुरस्कार- 1974 में तत्कालीन प्रधानमंत्री द्वारा अंतर्राष्ट्रीय चित्रकला प्रतियोगिता का रजत पदक प्राप्त किया, कई विभिन्न संस्थाओं के सम्मान से नवाजा गया

अनुभव- इग्नू में अध्यापन के साथ-साथ रोमानिया की राजधानी ‘बुखारेस्त’ के बुखारेस्त विश्विविद्यालय में (2001 से 2003 तक) के 3 वर्षों में रोमानियन छात्रों को हिन्दी भाषा साहित्य तथा भारतीय संस्कृति का अध्य्यन कराया, 1999 में इटली के राजदूत की पत्नी श्रीमती वातलोनी को 1 साल तक हिन्दी भाषा पढ़ाई ।

संप्रति- प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, मानविकी विद्यापीठ, इग्नू, मैदानगढ़ी, नई दिल्ली-68

 निवास- नई दिल्ली ।
_______________________________________________        


' पड़ताल ' से जुड़ने के लिए धन्यवाद अगर आपको यह रिपोर्ट पसंद आई हो तो कृपया इसे शेयर करें और सबस्क्राइब करें। हम एक गैर-लाभकारी संगठन हैं। हमारी पत्रकारिता को सरकार और कॉरपोरेट दबाव से मुक्त रखने के लिए आर्थिक मदद करें।

संबंधित खबरें

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked with *

3 Comments

  •  
    Your Name *
    2017-09-05

    Sir me aap seebat kerna chata hu

  •  
    ?? ?? ?????
    2017-08-19

    Great Sir

  •  
    Pintu kumar
    2017-08-19

    Very Good thinking .and your story is true .i know uncle ji

मुख्य ख़बरें

मुख्य पड़ताल

विज्ञापन

संपादकीय

वीडियो

Subscribe Newsletter

फेसबुक पर हमसे से जुड़े