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भगवान बुद्ध का संदेश जन-जन तक पहुंचाना चाहती हूं- नृत्यांगना ज्योत्सना कुमार

बहुजनों के अंदर अपनी भुला दी गई संस्कृति को पहचानने के महत्वपूर्ण कार्य की शुरुआत युगपुरुष, क्रांति दूत बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर ने  1956  में कर दी थी। जिसके परिणाम अब सामने आने लगे हैं। नव सांस्कृतिक उत्थान के लिए बहुजनों के अंदर ज्योति की किरणें दिखने लगी हैं। बहुजन प्रतिभाएं दिखा रही हैं कि हम किसी से कम नहीं हैं, बल्कि सबसे बेहतर हैं अगर हमें कुछ करने के अवसर दिए जाएं।
  
इसी क्रम में 12 नवंबर 2017 को तालकटोरा स्टेडियम में तीसरे बौद्ध सम्मेलन और गीतों भरी शाम बाबासाहेब के नाम, कार्यक्रम का सफल आयोजन हुआ। इग्नू में प्रोफेसर शत्रुघ्न कुमार की बिटिया ज्योत्स्ना कुमार ने भरतनाट्यम के माध्यम से बुद्ध की चेतना पर आधारित नृत्य की प्रस्तुति करके न सिर्फ दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया बल्कि अपने बहुजन समाज को संदेश दिया कि हम किसी से कम नहीं।
  
ज्योत्सना विश्व विख्यात नृत्यांगना पद्मविभूषण यामिनी कृष्णमूर्ति की शिष्या हैं। ज्योत्स्ना ने इस कला को अपनी खोई हुई संस्कृति के उत्थान के लिए जनता के सामने रखा। बचपन से अपने माता-पिता द्वारा बुद्ध और बाबा साहेब की संस्कृति को पहचानने की लगन रखने वाली ज्योत्सना ने बताया कि बचपन में जब पिताजी अंगुली माल फिल्म का वह गीत बजाते थे...  

“ घबराए जब मन अनमोल, हृदय हो उठे डांवाडोल, तब मानव नित मुख से बोल, बुद्धम शरणं गच्छामि। “  

तब मेरे अंदर एक रोमांच सा भर जाता था। और भगवान बुद्ध के बारे में जानने समझने की जिज्ञासा और बढ़ जाती थी। हमारी परवरिश भगवान बुद्ध की शिक्षाओं के अनुकुल हुई है, तो जाहिर सी बात है कि मेरे जीवन पर बौद्ध धम्म का बहुत प्रभाव रहा है। और अब मैं अपनी कला के माध्यम से उसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना चाहती हूं।



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1 Comments

  •  
    Kranti Kumar
    2017-11-18

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