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जेएनयू में लालकिला बरकरार, लेकिन बापसा ने दे दी है भविष्य की धमक

नई दिल्ली- जेएनयू में आईसा, एसएफआई और डीएसएफ़ के गठबंधन वाले पैनल यूनाइटेड लेफ़्ट ने चारों सीटों पर जीत दर्ज कर क्लीन स्वीप किया है। एबीवीपी दूसरे नंबर तो बापसा तीसरे नंबर पर रही और एनएसयूआई का प्रदर्शन बहुत ही खराब रहा। 127 छात्रों ने नोटा का विकल्प चुना। सेंट्रल पैनल की चारों सीटों पर कुल 1512 वोट नोटा को मिले। इस चुनाव में सभी दलों ने अध्यक्ष पद के लिए महिला उम्मीदवारों को खड़ा किया था। कुल 4639 वोट में से 19 वोट अवैघ माने गए।



अध्यक्ष चुनी गईं गीता कुमारी को 1506 वोट प्राप्त मिले जबकि एबीवीपी की निधि त्रिपाठी को 1042 वोट मिले, वहीं तीसरे स्थान पर रही (बिरसा अम्बेडकर फुले स्टूडेंट एसोसिएशन) बापसा की उम्मीदवार शबाना अली को 935 वोट मिले। वहीं एनएसयूआई का प्रदर्शन बेहद ख़राब रहा, एनएसयूआई की तरफ से अध्यक्ष पद की उम्मीदवार वृष्णिका सिंह को 82 वोट मिले।

उपाध्यक्ष के पद पर यूनाइटेड लेफ़्ट की उम्मीदवार ज़ोया खान को 1876 वोट मिले, एबीवीपी के दुर्गेश कुमार 1028 वोट के साथ दूसरे स्थान पर रहे और बापसा के सुबोध कुमार को 910 वोट मिले।



जनरल सेक्रेट्री के पद पर लेफ़्ट यूनाइटेड के दुग्गीराला श्रीकृष्णा ने जीत दर्ज की। उन्हें 2082 वोट प्राप्त हुए। वहीं एबीवीपी के निकुंज मकवाना को 975 वोट मिले, तो बापसा के उम्मीदवार करम को 875 वोट मिले।

लेफ़्ट यूनाइटेड के ही सुभांशु सिंह ने संयुक्त सचिव का पद जीता। उन्हें कुल 1755 वोट मिले, वहीं एबीवीपी के पंकज केशरी को 920 वोट प्राप्त हुए, और बापसा के विनोद कुमार को 860 वोट मिले।



लेकिन इस हार-जीत के गणित के बीच सबसे मजबूत धमक बापसा ने दर्ज कराई है। जिससे जेएनयू की छात्र राजनीति अब  बदलाव के दौर की तरफ जाती दिख रही है। पिछले तीन साल में बापसा ने जो जगह बनाई है उससे लगता है कि भविष्य में बापसा ही लालकिले में सेंध लगाने वाली साबित होगी। जिस जगह पर एबीवीपी को आने में वर्षों लग गए, वहां बापसा ने महज़ तीन  साल में ही वो जगह बनाई है। काउंटिंग के दौरान कई घंटे बापसा दूसरे नंबर पर रही लेकिन अंतिम समय में पिछड़ कर तीसरे स्थान पर चली गई।

जेएनयू सोशल साइंस स्कूल जिसे लेफ्ट का गढ़ माना जाता है, वहां पर बापसा ने सेंध लगा दी है। भविष्य में ये त्रिकोणीय मुकाबला और भी कड़ा होने जा रहा है। एबीवीपी का शुरू से अपना एक वोट बैंक रहा है, जिसमें लेफ्ट कभी सेंध नहीं लगा पाया, और बापसा भी शायद ही उसे कभी खींच पाए। इसलिए एबीवीपी के लिए तो बापसा शायद खतरा नहीं बन पाए। लेकिन अगर लेफ्ट भविष्य में अपने मुद्दों में बदलाव कर आगे नहीं बढ़ी तो बापसा का उभार तय है। 

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