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सरकार ही जातिवादी तो जनता का क्या

नई दिल्ली- ज्ञात हो कि दिनांक 13 अक्तूबर 2018 को दिल्ली में प्राथमिक शिक्षकों की भर्ती के लिए  दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड (DSSSB)  ने पोस्ट कोड – 16/17 & 01/18 की जो परीक्षा ली गई थी उसमे चमार जाति के संदर्भ में प्रश्न संक्या 61 पेज संख्य 17 में पूछा गया कि यदि पंडित : पडिताइन तो चमार का स्त्री लिंग क्या होगा? इसके उत्तर में चार विकल्प थे  'चमाराइन/ चमारिन/ चमारी/ चामिर. दिल्ली नगर निगम में प्राइमरी टीचर की भर्ती के लिए हुई परीक्षा में एक सवाल में आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया गया है जिसके चलते विवाद खड़ा हो गया है और अनुसूचित /अनुसूचित जाति के लोग दिल्ली सरकार द्वारा प्रयुक्त इस प्रकार अभद्र भाषा के इस्तेमाल से खासे नाराज़ हैं. 
 
इससे भड़के दिल्ली सरकार के अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति मंत्री राजेंद्र पाल गौतम ने कहा, 'यह बेहद ही गंभीर है और किसी भी सूरत में इसे बर्दाश्त न करने वाला प्रश्न है. प्रस्तुत संदर्भ में DSSSB के पास यह विकल्प था कि वह हिंदी की परीक्षा के प्रश्नपत्र में हिंदी साहित्य के वाल्मिकी, तुलसी, सूर, कबीर, रविदास दिनकर, मैथिलीशरण, निराला आदि की हिंदी से प्रश्न पूछता. पर जाति आधारित छिछले सवाल पूछकर DSSSB ने अपनी, भारतीय संविधान की, हिंदी की और इस देश की संस्कृति की गरिमा को चोट पहुंचाई है.'  

राजेन्द्र पाल गौतम ने कहा कि सर्विस डिपार्टमेंट अभी भी उपराज्यपाल के अधीन है और इसी डिपार्टमेंट के DSSSB विभाग द्वारा ली जाने वाली प्राइमरी टीचर की प्रतियोगिता परीक्षा के प्रश्न संख्या 61 पर पूछे जाने वाले सवाल का क्या मतलब है. उन्होंने कहा कि मैं मुख्‍य सचिव से मिलकर बात करूंगा कि इस पर संज्ञान लें और इसकी अंतरिम जांच हो कि आखिर ऐसा किसके इशारे पर हुआ, उन पर मुकदमा दर्ज किया जाए.  

बता दें कि अनुसूचित जाति की लिस्ट में शामिल जातियों के नाम लेना भी कानूनन अपराध माना जाता है. यही नहीं, हाल ही में देश के एक उच्च न्यायालय ने भी दलित शब्द के इस्तेमाल तक पर रोक लगाई है और केवल अनुसूचित जाति शब्द इस्तेमाल करने की इजाजत दी गई है. ऐसे में जाति सूचक शब्द का इस्तेमाल परीक्षा में किया जाना आपत्तिजनक तो है ही, साथ ही सवालिया निशान लगाता है कि आखिर कैसे इतने ऊंचे स्तर पर ये विरोधी काम हुआ? मैं समझता हूँ कि यह कोई चूक नहीं अपितु वर्चस्वशाली वर्ग द्वारा अपने को उच्च साबित करने का अपमान जनक काम किया है. प्रश्न पत्र जरूर एक व्यक्ति बनाता होगा किंतु उस प्रश्न पत्र का किसी समिति द्वारा पुनरावलोकन भी तो किया जाता होगा यह शायद पहला मौका ही होगा जब इस प्रकार की धृष्टता किसी शैक्षिक संस्थान द्वारा की गई है. कोई माने न माने यह एक जानीमानी शरारत है.  

उधर जब दिल्ली अधीनस्थ सीवा चयन बोर्ड (DSSSB) की शरारत का खुलासा हुआ तो जाहिर है अनुसूचित/जनजाति वर्ग के लोगों इसका जमकर विरोध किया तो जातिसूचक शब्द के इस्तेमाल पर DSSSB ने खेद जताया और कहा कि इवैलुएशन के दौरान इस प्रश्न को काउंट नहीं करेंगे. बोर्ड ने कहा, 'दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड के संज्ञान में आया है कि हाल में एमसीडी प्राइमरी टीचर के लिए जो परीक्षा हुई उसमें एक सवाल में जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल हुआ है जो अनजाने में हुई गलती है. इस बारे में स्पष्ट किया जाता है कि पेपर सेट करने की प्रक्रिया बेहद गोपनीय होती है और पेपर का कंटेंट बोर्ड के अधिकारियों के साथ साझा नहीं किया जाता है. पेपर के अंदर क्या था यह उम्मीदवारों के सामने ही पहली बार सामने आया. जिस प्रश्न से समाज के किसी वर्ग विशेष की भावनाओं को ठेस पहुंचती है उसके लिए हमें खेद है. बोर्ड कदम उठा रहा है जिससे कि पेपर सेट करने वाले लोगों को इस विषय के बारे में जागरुक बनाया जा सके और भविष्य में दोबारा ऐसी घटनाएं ना हो.  

इस बारे में स्पष्ट किया जाता है कि पेपर सेट करने की प्रक्रिया बेहद गोपनीय होती है और पेपर का कंटेंट बोर्ड के अधिकारियों के साथ साझा नहीं किया जाता है. माना कि ऐसा होता हो किंतु क्या पेपर सेटर ही एक अकेला मालिक होता जो जैसा चाहे वैसा पेपर तैयार करदे. यह विश्वास करने वाली बात नहीं है. कोई न कोई तो समिति होती होगी जो पेपर सेटर द्वारा तैयार किए पेपर का अवलोकन करता होगी. क्या उनके दिमाग में भी इस इस प्रश्न की ओर ध्यान नहीं गया.  

स्मरणीय है कि सामाजिक स्तर पर तो ऐसे कुकृत्य हमेशा से होते रहे हैं . मसलन.... विगत में जातिसूचक शब्द का इस्‍तेमाल के लिए फंसे सलमान खान और शिल्पा शेट्टी भी चर्चा में बने रहे थे. उनकी इस हरकत के लिएदेश के अलग-अलग हिस्सों में विरोध प्रदर्शन भी हुए. वहीं अब मुंबई में भी दोनों के खिलाफ जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल के लिए एफआईआर दर्ज की गई. यह भी कि सलमान की फिल्म ‘टाइगर जिंदा है’ के रिलीज होने के मौके पर ही उनका विरोध शुरू हो गया और कई सिनेमाघरों में तोड़फोड़ की गई.  

पीलीभीत के बीसलपुर कोतवाली क्षेत्र के एक होटल में खाना खाने गए दलित लोगों को होटल मालिक ने खाना देने से इंकार ही नहीं किया अपित उन्हें जातिसूचक गालियां देकर होटल से भगा दिया था. पीलीभीत के बीसलपुर कोतवाली क्षेत्र के कस्बा निवासी अखिल भारतीय सफाई मज़दूर कांग्रेस के अध्यक्ष आकाश वाल्मीकि ने पुलिस को दी तहरीर में बताया कि वो अपने साथी गुलविन्दर वाल्मीकि संतोष वाल्मीकि सुमित वाल्मीकि और संजय वाल्मीकि के साथ बीसलपुर थाना क्षेत्र के ईदगाह चौराहे पर न्यू शमा होटल पर नॉनवेज खाने के लिये गये थे. तभी वहां मौजूद कस्बे का ही रहने वाला दबंग इरशाद उर्फ भूरा व होटल मालिक के पुत्र ने उसे व उसके साथयों को गालियां देनी शुरू कर दीं. साथ ही जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करते हुये होटल पर खाना खिलाने से इंकार कर दिया.  

एटा में दलित छात्र को तार से बांधकर जमकर पीटा, जातिसूचक शब्द भी कहे. बताया ये जा रहा है कि घायल छात्र को जब उसके परिजन कोतवाली लेकर पहुंचे तो पुलिस ने कार्रवाई करने से इंकार कर दिया. इसके बाद पुलिस और परिजनों में जमकर बहस हुई. घायल छात्र का कहना है कि मामला भाजपा नेता से जुड़ा है. छात्र के मुताबिक कुछ समय पहले उसकी उन लोगों से कहासुनी हो गई थी जिसका बदला लेने के लिए उन लोगों ने उसे बेरहमी से पीटा है. जब इस मामले में एएसपी एटा संजय कुमार से बात की गई तो उन्होंने एससी/एसटी एक्ट के तहत कड़ी कार्रवाई की बात कही है  

गोरखपुर विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग में जहर खाकर शोध छात्र दीपक कुमार ने बृहस्पतिवार को खुदकुशी करने की कोशिश की. गंभीर हालत में शोध छात्र को जिला अस्पताल ले जाया गया. हालत बिगड़ने के बाद उसे बीआरडी मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया गया. जहर खाने से पहले शोध छात्र ने मोबाइल से वीडियो बनाया और डीन कला संकाय प्रो सीपी श्रीवास्तव के साथ विभागाध्यक्ष प्रो द्वारिकानाथ पर उत्पीड़न का गंभीर आरोप लगाया.  दीपक ने कहा कि तीन महीने से दौड़ाया जा रहा है. साथ ही जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करके अपमानित किया जा रहा. इस मामले को विश्वविद्यालय प्रशासन ने गंभीरता से लिया.  

आजमगढ़ में दलित राजगीर की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई. तीन आरोपी गिरफ्तार भी हुए किंतु वही ढाक के तीन पात. हिन्दुस्तान टीम, फरीदाबाद के अनुसार ट्यूशन से पढ़कर घर जा रहे स्कूटी सवार कक्षा नौवीं के छात्र के साथ मारपीट करने तथा जातिसूचक शब्दों का प्रयोग कर जान से मारने की धमकी देने का मामला प्रकाश में आया है. बताया जा रहा है कि सदर थाना पुलिस ने पीड़ित छात्र की शिकायत पर चार नामजद आरोपियों के खिलाफ एसएटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कर लिया है.

यथोक्त जो भी वारदातें हैं, सामाजिक स्तर पर होने वाले भेदभाव का प्रदर्शन हैं, जो नई नहीं हैं किंतु हैं तो दलित विरोधी ही. प्रशासन है कि ऐसे घटनाओं के खिलाफ या तो कोई कार्यवाही होती ही नहीं या फिर कछुए की चाल से कार्यवाही की जाती है. किंतु दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड (DSSSB) तो एक सरकारी संस्थान है. इसने ने शिक्षकों की भर्ती प्रकिया में इस तरह के जाति संदर्भित प्रश्न पूछकर जातिवादी मानसिकता का ही परिचय दिया है जो भारत के सामाजिक विकास में अवरोध तो पैदा करेगा ही अपितु समाज में वैमनस्य भी पैदा करेगा. सरकारी संस्थानों में विशेषकर शिक्षण संस्थानों में ऐसे प्रश्न पूछकर जाति आधारित भेदभाव को बढ़ावा देना ही कहा जाएगा. अत: यह समाज हित में यह श्रेयकर ही होगा कि प्रश्न पत्र बनाने वाले  व्यक्ति और चयन बोर्ड के चेयरमैन को तत्काल प्रभाव से उनके पदों से बर्खास्त करेके इनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही भी की जाए. और बोर्ड द्वारा यह कहना कि पेपर की जांच के दौरान इस प्रश्न को काउंट नहीं किया जाएगा. तो क्या इससे कथित गलती की पूर्ति हो जाएगी? क्या दलितों के कथित अपमान का कलंक धुल जाएगा? क्या बोर्ड द्वारा अपने कुकृत्य पर अफसोस जाहिए करना काफी है. जातिसूचक शब्द के इस्तेमाल पर DSSSB द्वारा खेद जताना, तो ठीक ऐसे है जैसे नाक काटकर रूमाल से पौंछ देना.  

यहाँ यह भी अफसोस है दिल्ली के मुख्य मंत्री केजरीवाल और उप-मुख्य मंत्री मनीश सिसोदिया इस मामले पर मूकदर्शक बने हैं. विदित हो कि मनीश सिसोदिया शिक्षा मंत्री का कार्यभार सम्भाले हुए हैं. इनसे इस मसले पर कुछ बोलने की आशा भी नहीं की जा सकती क्योंकि ये वही लोग है जिन्होंने यूथ फार इक्वालिटी के बैनर तले सबसे पहली एम्स दिल्ली में अनुसूचित/अनुसूचित जाति के छात्रों हेतु आरक्षण का विरोध किया था. ऐसे में सवाल उठता है कि जब सरकार ही जातिवादी है तो जनता का क्या.

(लेखक कवि/गजलकार/पत्रकार व ख्यात आलोचक है)  


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