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राजनीतिक चाल को समझें दलित...

11 अगस्त 2018: चालू मानसून सत्र में उग्र हिंदुत्व और गौ रक्षकों के कारण चहुं ओर आलोचनाओं का शिकार हो रही नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने रूख में बदलाव दर्शाते हुए दलितों और पिछड़ों के लिए अपने पिटारे को खोल दिया है। जाहिर तौर पर, यह बदलाव चुनावी लाभ के लिए ही है...और कुछ नहीं। वैसे भी राजनीति में कुछ भी बिना लिये-दिये नहीं होता। वह एक हाथ से दलितों और ओबीसी को दे कुछ रही है तो दूसरे हाथ से बहुत कुछ लेने की तैयारी भी कर रही है।

चालू मानसून सत्र में रोहिणी आयोग के कार्यकाल विस्‍तार को कैबिनेट की मंजूरी मिली, एससी/एसटी एक्ट संसद में पारित और ओबीसी छात्रवृत्ति में इजाफे की घोषणा की गई। सरकार ने इस योजना का दायरा बढाने के उद्देश्य से इसमें संशोधन करते हुए देश में ही उच्च शिक्षा हासिल करने वाले उन परिवारों के छात्रों को पोस्ट मैट्रिक छात्रवृति देने का निर्णय लिया है, जिनके परिवार की वार्षिक आमंदनी डेढ़ लाख रूपये है। पहले यह सीमा एक लाख रूपये थी। (अब आप सोचिए कि आज के समय में आमदनी की ये तय सीमा कितनी प्रासंगिक है।)  सरकार ने ओबीसी जातियों को भाजपा से जोड़ने की कोशिश के तहत राष्‍ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा दिलवाया और उसे अधिक शक्ति संपन्न बनाया गया है। वे अब पिछड़ा वर्ग का उपवर्गीय विभाजन कर अति पिछड़ों को भाजपा के साथ जोड़ने की कोशिश में हैं। संसद ने बीते 9 अगस्त को अनुसूचित जाति और जनजाति-अत्‍याचार निवारण संशोधन विधेयक 2018 पारित कर दिया है।

 देखा यह जा रहा है कि भाजपा ऐसे हर हथकंडे का प्रयोग कर रही है जिससे भाजपा अनुसूचितजाति/जनजाति और पिछ्ड़ों के वोट हासिल कर सके। बीजेपी चुनावी साल में वोटों का हर समीकरण साधने के लिए हर दांव आजमा रही हैं। फिलहाल 11.08.2018 को मेरठ में आयोजित भाजपा कार्यसमिति की बैठक के जरिए वेस्ट यूपी के दलितों और पिछड़ों खासकर जाटों के प्रति प्रेम दिखाने के लिए मेरठ में डा. आंबेडकर और चौधरी चरण सिंह के बड़े-बड़े कटआउट बराबर में लगाए गए हैं। इसी के साथ पार्टी में लंबे वक्त से अलग-थलग धकेल दिए गए लालकृष्ण आडवाणी को यहां खास तव्वजो दी गई हैं। (मुझे लगता है कि अडवाणी जी की भी खाल मोटी है, तमाम अपमानों के बाद भी अपने ही चेलों के सामने हाथ जोड़कर एक लाचार और असहाय की भूमिका मे खड़े नजर आते हैं)। उनका भी कटआउट अटल बिहारी वाजपेयी के साथ लगाया गया है। उनके साथ ही वीर सावरकर का कटआउट लगाकर अपने अजेंडे को भी बीजेपी ने साफ कर दिया है।

यथोक्त के आलोक में, कहा जा सकता है कि जहाँ गैर दलित राजनीतिक दल दलितों को एकजुट न होने देने के मंत्र पढ़ रहे हैं, वहीं दलित वर्ग के युवा और पढ़े-लिखे लोग अपने निजी हितों की साधना के लिए भाजपा और कांग्रेस के लिए काम करने में रत हैं। शेष रह जाती है आम जनता, जो अपने हितों के साधना के लिए राजनीतिक नेताओं के हाथों की कठपुतली बनकर रह जाती है। इतना ही नहीं, गैर दलित राजनेताओं के साथ-साथ मनुवाद के समर्थक दलित नेताओं के कुचक्र में फंसकर रह जाती है। इन सारी चालबाजियों के चलते आज जरूरत है कि दलित समाज का वोटर इन सब चालबाजियों को नकारकर समूचे समाज के हित में मत विभाजन करे। दलित वर्ग से उपजे राजनेताओं के सिर पर भी यह जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वो बहुजन समाज के हितों की खातिर निजी हितों को नकार कर ही नहीं अपितु सामूहिक हितों के साधना के लिए एकजुट हो जाएं। अन्यथा वो दिन दूर नहीं कि यदि भाजपा ही पुन: सत्ता में आ गई तो 85% दलित अपने पूर्वजों की स्थिति में ही पहुँच जाएंगे। उल्लेखनीय है कि 09.08.2018 को दिल्ली के जंतर मंतर पर मनुवादी ताकतों द्वारा संविधान को जलाने की घटना व बाबा साहेब डा. अम्बेडकर मुर्दाबाद के नारों का उदघोष हुआ।  यह कोई अनायास होने वाली घटना नहीं है....यहाँ यह कहना जल्दबाजी कहा जा सकता है किंतु है नहीं कि मौजूदा सरकार की यह एक सोची समझी राजनीतिक चाल है, इसे नकारा नहीं जा सकता। कारण कि इस सरकार का ‘नाक काटकर, अपने ही रूमाल से पौंछना’ एक जगजाहिर इतिहास रहा है। ... अब संविधान को जलाने पर एक दो के खिलाफ एफआईआर दर्ज होगी.... कुछ को कुछ दिनों के लिए जेल भेज दिया जाएगा... फिर वो जमानत पर जेल से बाहर आ जाएंगे। सरकार उनको जेल भेजे जाने का श्रेय ले लेगी। ... किंतु भीम आर्मी के रावण की तरह उनपर रासुका नहीं लगाएगी। इसलिए मनुवादी दलित नेताओं के इतर अम्बेडकरवादी दलित नेताओं का दायित्व है कि वो समग्र बहुजन समाज के हितों की रक्षार्थ एक साथ आ जाएं।

मेरी दृष्टि में तो बीजेपी को रोकने के लिए मायावती, जिग्नेश और चंद्रशेखर को एक साथ आ जाना चाहिए। यहाँ सपा की भागीदारी अपेक्षित है। यद्यपि भीम आर्मी के चन्द्रशेखर को बसपा का धुर विरोधी करार दिया जाता रहा है। यह शंका इसलिए भी है कि बसपा ने कभी भी चन्द्रशेखर का खुलकर समर्थन नहीं किया, किंतु विरोध भी तो नहीं किया। भीम आर्मी को यह समझना होगा और तमाम विवादों को भुलाकर बसपा के समर्थन में आना चाहिए ताकि बहुजन समाज के हितों की रक्षा संभव हो सके। यदि गुजरात के जिग्नेश भी साथ आ जाते हैं तो उन लोगों का मुंह देखने लायक ही रह जाएगा, जो कहते आए हैं कि मायावती के इस मिशन में बड़ी चुनौती दलितों में उभर रहे क्षेत्रीय क्षत्रप हैं।

कहा जाता है कि गुजरात के दलित नेता जिग्नेश मेवाणी, ‘चंद्रशेखर रावण’ के काफी करीब रहे हैं और उस समय वह भी मायावती के विरोध में थे। किंतु अब खबर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में एक दलित सम्मेलन में जिग्नेश ने कहा कि मायावती उनकी बहन हैं। मोदी से उनका कोई संबंध नहीं है। मैं और चंद्रशेखर मायावती के दायें और बायें हाथ हैं। हम सब अब एक साथ हैं।

शायद मेरे यथोक्त निवेदन का केवल यही तो आशय था। यहाँ मुझे यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि तथाकथित अम्बेडकरवादी राजनेता मनुवाद की शरण में गुलामी की चरण वन्दना करने में मशगूल हैं, तो रहें किंतु उन्हें कभी भी इतिहास इसलिए माफ नहीं करेगा कि दलित होने के नाते उन्होंने हमेशा दलितों का ही खून पीकर अपना आँगन आबाद किया।        


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