img

नीतीश... नैतिकता बनाम अवसरवाद

बहुजन नजर से...

समाजवादी राजनीतिक दलों और समाजवादी विचारधारा की इस समय देश में जो स्थिति है, उसे देखकर किसी भी सामान्य समाजवादी कार्यकर्ता का दिल पसीज ना जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। कांग्रेस के समानांतर ही, परन्तु अलग पहचान बनाकर 1936 में समाजवादी कार्यकर्ताओं ने गांधी जी के नेतृत्व में रहकर ही समाजवादी विचारधारा को आगे बढ़ाने का कार्य शुरू किया था। जयप्रकाश नारायण, डॉ राम मनोहर लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव, एस.एम. जोशी, नाना साहब गोरे, अच्युत पटवर्धन, जॉर्ज फर्नांडिस, हेम बरूआ, बेरिस्टर नाथ पौ, प्रो. मधु दंडवते ना जाने ऐसे कितने ही नाम इस संदर्भ में लिए जा सकते हैं। यह एक दौर था समाजवादियों का। शायद समाजवादी विचारधारा का वह वह स्वर्ण युग ही था।

आज एक बार फिर से समाजवादी अप्रासंगिक से प्रासंगिक हो गए हैं। परन्तु स्वर्ण युग के लिए नहीं, अवसरवादी राजनीति के लिए। बिहार की जनता के साथ विश्वासघात के लिए समावजादी, प्रजा समाजवादी, संयुक्त समाजवादी से लेकर जनता पार्टी, जनता दल, जनता दल (यू), जनता दल (एस) समतापार्टी आदि नामों के साथ समाजवादी, फिर से एक बार विभाजन के कगार पर खड़े हैं। दोष विचारधारा में ही है या नेतृत्व की क्षमता में, परन्तु समाजवादी विचारधारा अब तो अपनी अंतिम यात्रा पर नजर आ रही है।

साथ ही कर्पूरी ठाकुर के शिष्य समझे जाने वाले लालू प्रसाद यादव नीतिश कुमार, रामविलास पासवान और शरद यादव आज अलग अलग गुटों में बंटकर अपने अस्तित्व की एक पार्टी का नाम धारण कर राजनीति में जिंदा रहने के प्रयास में जुटे है। जनता दल (यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ने बीजेपी के विरोध में लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस से मिलकर 2015 में बिहार विधानसभा का चुनाव जीता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विशाल प्रचार के बावजूद 41.9 % वोट के साथ 243 में से 178 सीटों पर विजय हासिल की। बिहार की जनता ने लालू-नीतीश-कांग्रेस गठबंधन को बिहार की सत्ता की बागडोर सौंपी थी। परंतु नीतीश के पाला बदलने से महागठबंधन में दरार निर्माण कराकर बीजेपी-संघ ने एक बार फिर 1995 के सपा-बसपा गठबंधन को तोड़ने वाले प्रयोग से बहुजन की एकता पर कुठाराघात किया है।

नीतीश कुमार के किसी प्रवक्ता ने शरद यादव से इस्तीफा मांगा है, यह कह कर कि वे अब जनता दल (यू) में नहीं हैं। शरद यादव कहते हैं कि वे ही असली जनता दल (यू) हैं, नीतीश कुमार के जनता दल (यू) को वे सरकारी जनता दल कहते हैं।

नीतीश कुमार के प्रवक्ता को शरद यादव से इस्तीफा मांगने के बजाय नीतीश कुमार को ही इस्तीफा देने के लिए कहना चाहिए था। क्योंकि बिहार की जनता ने महागठबंधन को सत्ता सौंपी थी ना कि बीजेपी के साथ सरकार बनाने के लिए। नीतीश कुमार ने बिहार की जनता को धोखा दिया, विश्वासघात किया, उनके वोटों को बीजेपी की झोली में डालकर जो महापाप किया, इसके लिए उन्हें बिहार की जनता कभी माफ नहीं करेगी। इसलिए इस्तीफा नीतीश कुमार दें ना कि शरद यादव। अगर नीतीश कुमार नैतिकता का थोड़ा भी अर्थ समझते हों तो उन्हें ही नैतिकता का प्रदर्शन करना होगा। नैतिकता और अवसरवादिता दो अलग-अलग बातें हैं।  

लेखक बामसेफ के संस्थापक सदस्यों में रहे हैं। वर्तमान में समाजसेवा और साहित्य सृजन में जुटे हैं।
 


' पड़ताल ' से जुड़ने के लिए धन्यवाद अगर आपको यह रिपोर्ट पसंद आई हो तो कृपया इसे शेयर करें और सबस्क्राइब करें। हम एक गैर-लाभकारी संगठन हैं। हमारी पत्रकारिता को सरकार और कॉरपोरेट दबाव से मुक्त रखने के लिए आर्थिक मदद करें।

संबंधित खबरें

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked with *

0 Comments

मुख्य ख़बरें

मुख्य पड़ताल

विज्ञापन

संपादकीय

वीडियो

Subscribe Newsletter

फेसबुक पर हमसे से जुड़े