img

बसपा की तुगलकी हरकत

बहुजन नजर से... 

अभी हाल ही में बसपा के नाम से बने ट्वीटर हैंडल पर एक पोस्टर जारी हुआ था, जिसमें बहन मायावती के साथ पहली बार अखिलेश यादव, लालू प्रसाद यादव, तेजस्वी यादव, शरद यादव, ममता बनर्जी और सोनिया गांधी भी नजर आ रही थीं और संदेश था – ‘सामाजिक न्याय के समर्थन में विपक्ष एक हो’ ।  इसके साथ ही पहली बार बसपा के पोस्टर में भगवान बुद्ध द्वारा विश्व कल्याण के लिए दिया गया संदेश – ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ भी नजर आ रहा था । परंतु, तुरन्त ही बसपा की ओर से बयान जारी कर इस कथित पोस्टर से पल्ला झाड़ लिया गया । वास्तविकता क्या है या क्या थी ये तो बहन मायावती को ज्ञात होगा या बसपा के नीति निर्धारक सतीश चन्द्र मिश्रा को पता होगा या उनके दामाद को, जो कि बसपा के सोशल मीडिया के प्रधान बताए जाते हैं । जो भी हो पर एक अच्छा संदेश तो अवश्य था । परंतु उस कथित पोस्टर की वास्तविकता को नकार कर बसपा ने वही किया जो कि वर्षों पहले मुगल शासक तुगलक बिन कासीम ने किया था- दिल्ली से दौलताबाद और दौलताबाद से दिल्ली वापस !

2012 में 88 विधानसभा सीटों के बाद 2017 में केवल 19 विधानसभा सीटों के साथ राजनीतिक सत्ता से सिकुड़ती जा रही बसपा 2014 में तो लोकसभा में जीरो पर आउट हो गई थी । और वैसे भी 2007 में बसपा को जो 208 सीटें यूपी विधानसभा चुनाव में प्राप्त हुई थी, वे बसपा को ब्राह्मणवादियों द्वारा प्रचारित – सोशल इंजीनियरिंग से नहीं, अपितु 85 प्रतिशत बहुजन समाज द्वारा दिए गए वोटों से प्राप्त हुई थी । उस समय मुख्य धारा की मीडिया (प्रिन्ट और इलेक्ट्रॉनिक) ने जोर-शोर से प्रचार किया था कि ब्राह्मण-बनिया-राजपूत (ठाकुर) गठबंधन के कारण ही बहन मायावती मुख्यमंत्री बन पाईं । उस समय मायावती सरकार में सतीष चन्द्र मिश्रा के परिवार से जुड़े 13 लोगों को अहम पद देकर लालबत्ती से नवाजा गया था ।  सुना तो यह भी था कि सतीश चंद्र मिश्रा की बहन को मुंबई से बुलाकर यूपी में महिला आयोग की अध्यक्ष बनाया गया था । इतनी ही नहीं 2008 में मायावती सरकार ने सतीश चंद्र मिश्रा की माता जी के नाम से लखनऊ में ‘डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय’ भी स्थापित किया था, जिसके लिए सरकारी तिजौरी से 300 करोड़ रुपये जारी किए गए थे ।

बसपा की 2007 की जीत का विश्लेषण सीएसडीएस के तब के प्रो. योगेन्द्र यादव और संजय सिंह की टीम ने जो किया था, उस हिसाब से बसपा को जो वोट पड़े थे, उनमें से 86 प्रतिशत दलित, 64 प्रतिशत मोस्ट बेकवर्ड, 26 प्रतिशत मुस्लिम, 10 प्रतिशत ब्राह्मण (10 प्रतिशत आबादी के)  8 प्रतिशत ठाकुर । जबकि ब्राह्मणों ने बसपा के केवल उन्हीं उम्मीदवारों को वोट दिए जहां ब्राह्मण प्रत्याशी थे । (डेक्कन क्रोनिकल - लखनऊ संवाददाता अमिता वर्मा की रपट) अर्थात बहन मायावती न तो ब्राह्मणों के वोट से मुख्यमंत्री बनी ना ही ठाकुरों के वोटों से।

2012 के चुनाव में बसपा 208 से 88 पर उतर आई और 2017 में तो मात्र 19 सीटों पर । चुनाव नतीजों का नीचे की ओर ढलता ग्राफ इस बात की ओर इशारा करता है कि बसपा की कार्यशैली और कार्यकलापों के संदर्भ में आत्म परीक्षण की जरूरत है । 1991 के पहले दिल्ली में बोट क्लब पर आयोजित एक रैली में कांशीराम जी ने ऐलान किया था कि 1991 में 14 अप्रैल को डॉ. बाबा साहब अंबेडकर की जन्म शताब्दी मनाई जाएगी । उस समय उतर प्रदेश में बसपा के 30 सांसद और 300 विधायक होंगे । परंतु ऐसा नहीं हुआ । तब प्रस्तुत लेखक ने 1992 में बसपा के तब के 13 रकाबगंज रोड मुख्यालय मे कांशीराम जी से मुलाकात कर 3 घंटे उनसे चर्चा की और गठबंधन की राजनीति का महत्व समझाया, जिसका नतीजा यह रहा कि 1993 में उतर प्रदेश में सपा-बसपा की सरकार बनी और इटावा से पहली बार कांशीराम जी, मुलायम सिंह जी के सहयोग से लोकसभा पहुंचे । प्रस्तुत लेखक ने कांशीराम जी से कहा था कि केवल दलितों के वोटों से न तो हम केन्द्र में सरकार बना पाएंगे ना ही प्रदेश में । हमें तो गठबंधन की राजनीति ही करनी होगी और वह भी समविचारी राजनीतिक सोच रखने वालों से।

आज भी बसपा को, बहुजन समाज को, गठबंधन की राजनीति से ही लाभ हो सकता है। इसलिए आज विपक्षी एकता की जरूरत है । ‘A Dynamics of Politics’ तो यही संदेश देती है कि समय की जरूरत को ध्यान में रखना होगा । एक समय था भाजपा राजनीति में अछूत समझी जाती थी, परंतु भाजपा ने गठबंधन की राजनीति से आज तक का सफर, 2 से 282 सांसद तक का तय किया।

कांग्रेस-मुक्त भारत का सपना देखने वाले डॉ. राम मनोहर लोहिया आज अपनी कब्र में अपने इरादों पर आंसु बहा रहे होंगे। उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि कांग्रेस से मुक्त भारत कैसा होगा । विगत 3 वर्षों से भारत जिस सामाजिक,राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक दौर से गुजर रहा है, उससे निजात पाना हो तो भगवा मुक्त भारत की पहल जरूरी है । और इसीलिए बसपा को अपना अहम त्याग कर अखिलेश यादव की सपा, कांग्रेस, राजद, शरद यादव, सीताराम येचुरी, शरद पवार के साथ ही गठबधंन की राजनीति करनी होगी। ओैर बसपा के अस्तित्व और एहमियत को ध्यान में रखकर सीटों के बटवारें पर बहुत अधिक अड़ियल रवैया न अपना कर अपना और बहुजन आदोलन का अस्तित्व बनाये रखने के लिए सूझबूझ से निर्णय लेना होगा । बसपा के तथाकथित पोस्टर का संदेश चाहे भूल से दिया गया हो- सामाजिक न्याय के समर्थन मे विपक्ष एक हो, सही संदेश है। तभी बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय हो सकता है।

नोट :  ये लेखक के निजी विचार हैं।

लेखक एडवोकेट राम खोब्रागडे
का जीवन परिचय
बामसेफ (1978) /डी-एस4/बसपा के संस्थापक सदस्य
एवं बामसेफ द्वारा प्रकाशित दी आप्रेस्ड इण्डियन (अंग्रेजी मासिक)
बहुजन संगठक (हिन्दी साप्ताहिक), बहुजन टाईम्स (हिन्दी दैनिक) का संपादन भी किया।
आप जन आंदोलन का सजग प्रहरी के 1995 से 1998 तक प्रधान सम्पादक भी रहे।
आपकी अब तक 5 किताबें प्रकाशित हुई हैं :
1) Social Education To Achieve Social Justice (1997)
2) Women’s Reservation Bill: A Deep Conspiracy to Deprive the Bahujans of Their Political Power (2002)
3) Indian Constitution Under Communal Attack (2004)
4)  Dr. Ambedkar - A Global Symbol Of Socio-Political Revolution (2005)
5)  उस पार  (हिन्दी कविता संग्रह - 2012) वर्ष 1998 में मलेशिया में आयोजित प्रथम अंतर्राष्ट्रीय दलित सम्मेलन के आयोजन में आपका बहुत बड़ा योगदान रहा। सम्मेलन के आयोजन हेतु आप एक  महीने तक मलेशिया में रहे थे।   


' पड़ताल ' से जुड़ने के लिए धन्यवाद अगर आपको यह रिपोर्ट पसंद आई हो तो कृपया इसे शेयर करें और सबस्क्राइब करें। हम एक गैर-लाभकारी संगठन हैं। हमारी पत्रकारिता को सरकार और कॉरपोरेट दबाव से मुक्त रखने के लिए आर्थिक मदद करें।

संबंधित खबरें

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked with *

0 Comments

मुख्य ख़बरें

मुख्य पड़ताल

विज्ञापन

संपादकीय

वीडियो

Subscribe Newsletter

फेसबुक पर हमसे से जुड़े