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प्रो. कांचा इलैया का खुद को कमरे में कैद कर लेना लोकतंत्र के लिए शर्मनाक

नई दिल्ली- 2 अक्टूबर को जंतर मंतर पर दलित लेखक संघ, समता साहित्य समिति, प्रगतिशील लेखक संघ, जन संस्कृति मंच और सेंटर फॉर दलित लिटरेचर एंड आर्ट ने मशहूर दलित लेखक प्रो. कांचा इलैया की सुरक्षा के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन का आयोजन किया। और सरकार व न्यायालय से कांचा इलैया की सुरक्षा व्यवस्था करने का आग्रह किया।



प्रदर्शन में बड़ी संख्या में  लेखकों, बुद्धिजीवियों, कलाकारों और पत्रकारों ने शिरकत की। कार्यक्रम का संचालन डॉ. गुलाब ने किया। इस अवसर पर प्रो. श्यौराज सिंह बेचैन, वरिष्ठ पत्रकार मोहनदास नैमिशराय, प्रो. रजतरानी मीनू, प्रो. चमनलाल, डॉ. कौशल पंवार, डॉ. रतनलाल, प्रो. हेमलता महेश्वर, प्रो. रेखा अवस्थी, प्रो. वीरेंद्र यादव, प्रो. धर्मपाल पीहल, प्रो. अजमेर सिंह काजल, प्रो. संजीव, जगदीश जेंद, डॉ. बजरंग बिहारी तिवारी, दलीप कठेरिया, एम एम पी सिंह, कांता बौद्ध, मुकेश मानस, कैलाश चंद चौहान, रमेश भंगी, हीरालाल राजस्थानी, वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश, और आनंद प्रधान ने शिरकत की। इनके अलावा उदय प्रकाश, भाषा सिंह, नरेंद्र किशोर, केवल गोस्वामी, नियाज वारिस, चंचल चौहान, हरपाल सिंह भारती, डॉ. नामदेव, डॉ. नीलम, टेकचंद, रजनी अनुरागी, के पी सिंह, रजनी दिसोदिया, मुकेश कुमार, कांति मोहन, सैयद अजहरुद्दीन, रामनरेश, संजीव चंदन, डॉ.जसवंत जन्मेजय, सतनाम सिंह , अमर सिंह, संजय जोशी, अंजलि, इरफान की विशेष उपस्थिति रही।  



कार्यक्रम के दौरान सभी ने एक स्वर में कट्टरवादी ताकतों की निंदा की। और कहा कि किसी भी लोकतंत्र में विचार की लड़ाई लड़ने वालों की सुरक्षा का जिम्मा सरकार का होना चाहिए। अगर लेखक और विचारक खुद को खतरे में महसूस कर रहे हैं तो ये दुखद है और इसके लिए सत्ता जिम्मेदार है। किसी भी देश को उसका बौद्धिक वर्ग ही दिशा देता है, अगर बौद्धिक वर्ग ही खुद को कैद कर लेगा तो समझ लेना चाहिए कि कहीं ना कहीं लोकतंत्र खतरे में है। विचारधारा कोई भी हो, उसका हनन नहीं किया जाना चाहिए, अगर विचारधारा ही दबा दी जाएगी तो अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में चली जाएगी। जो लोग तर्क नहीं कर सकते, वे ही हमले करते हैं।  



कांचा इलैया हिंदू धर्म का विरोध नहीं करते हैं वे धर्म में व्याप्त अराजकता और पाखंडवाद का विरोध करते हैं जिसे समझने की जरूरत है। अगर कांचा इलैया कहते हैं कि मैं हिंदू नहीं हूं तो वे ये भी बताते हैं कि मैं हिंदू क्यों नहीं हूं, इसलिए उनका विरोध करने वालों को सबसे पहले उन्हें पढ़ने की जरूरत है ना कि आंख बंद करके उनका विरोध करने की। कांचा इलैया राष्ट्रहित की बात करते हैं ना कि राष्ट्र विरोध की। अगर किसी के विचार सुनने और कहने की परंपरा समाज में नहीं रहेगी तो समझ लेना चाहिए कि देश खतरे की तरफ बढ़ रहा है, जिस पर सभी को एकजुट होने की जरूरत है। ये सिर्फ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ही नहीं सभी तरह के मानवाधिकारों का भी हनन है।

  
गौरतलब है कि पिछले कुछ दिनों से कांचा इलैया आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में अपनी किताब 'सामाजिका स्मगलेर्लु कोमाटोलु' को लेकर भारी विरोध का सामना कर रहे हैं। कुछ दिन पहले उन्हें जान से मारने और जीभ काटने की धमकियां भी मिलीं थीं। 23 सितंबर को वारंगल जिले में एक कार्यक्रम के दौरान उन पर वैश्य समाज के लोगों ने उन पर हमला कर दिया था। और कांचा इलैया को पास ही के थाने में जाकर शरण लेकर जान बचानी पड़ी थी।    

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