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भाजपा के मुंह में अम्बेडकर बगल में राम

2014 में अप्रत्याशित बहुमत से राजनीति में एक नये अवतार का अवतरण हुआ। किंतु बड़े-बड़े झूठ और जुमलों की बरसात के साथ। यदि यह मान भी लिया जाए कि चुनावी भाषणों का कोई मापदंड नहीं होता है तो भी कुछ तो नैतिकता होनी ही चाहिए कि नहीं? सबसे बड़ी हद तो तब हो गई, जब मोदी जी ने जिस जवाहर लाल नेहरु को चुनावी भाषणों में पानी पी-पी कर बेतहाशा कोसा, उसी नेहरु के उस कथन की चोरी कर ली जिसे नेहरू ने प्रधानमंत्री बनने पर कहा था। नेहरू ने कहा था कि मुझे प्रधानमंत्री नहीं अपितु “प्रथक सेवक” कहा जाए। मोदी जी ने प्रधानमंत्री बनते ही नेहरू के इस कथन में परिवर्तन करके खुद को “प्रधान सेवक” कहने की जहमत कर डाली। क्या यह किसी चोरी अथवा झूठ से कम है? 

इतना ही नहीं, मोदी जी ने चुनावी भाषणों से लेकर आज तक आरएसएस के किसी भी नेता को इतना श्रेय नहीं दिया है जितना कांग्रेस के सरदार पटेल को दिया है। कारण कि सरदार पटेल उस गुजरात से ताल्लुक रखते है जिसके कि मोदी जी मुख्यमंत्री रह चुके हैं। मोदी जी आरएसएस के किसी भी नेता का नाम उस प्रकार नहीं लेते जिस प्रकार वो कांग्रेस के सरदार पटेल का नाम लेते हैं।  इसका सबसे बड़ा कारण ये है कि आरएसएस के किसी भी नेता के खाते में राष्ट्रप्रेम से जुड़ी किसी भी प्रकार की पूंजी नहीं है फिर उनके उल्लेख अथवा महिमा मंडन के लिए कोई स्पेस ही नहीं रह जाता। मोदी जी की ये राजनीति नहीं अपितु कूटनीति ही कही जाएगी कि वो अपनी राजनीति को केवल और केवल कांग्रेस और समाज के दलित व पिछ्डों के कन्धों पर चढ़कर बरकरार रखने में गतिशील हैं।

कहना अतिशयोक्ति न होगा कि आज देश के सभी राजनीतिक दलों में दलित व पिछ्ड़ों ... खासकर दलितों के हितेशी दिखने की होड़ लगी हुई है।... विशेष रूप से  भाजपा इस दिशा में सबसे आगे है। अब क्यूंकि भाजपा सत्तासीन है इसलिए वह बाबा साहेब अम्बेडकर के बहाने समाज के दलित वर्ग को जाल में फंसाने का कोई अवसर गंवाना नहीं चाहती, फलत: प्रधानमंत्री और उनके मंत्री झूठ का सहारा लेने से कतई ही नहीं झिझक रहे हैं।   

अन्य मंत्रियों की छोड़िये, प्रधान सेवक मोदी जी ने बाबा साहेब की 127वीं जयंती की पूर्व संध्या पर 26 अलीपुर रोड, दिल्ली पर बाबा साहेब के नाम पर बने  “अम्बेडकर राष्ट्रीय स्मारक” के उदघाटन भाषण में कुछ ऐसे झूठ बोले जिनको छिपाना नामुमकिन है। मोदी जी ने कहा कि बाबा साहेब अम्बेडकर को अडवानी जी और अटल जी के आग्रह पर तत्कालीन प्रधान मंत्री वी. पी. सिंह ने “भारत रत्न” से विभूषित किया। जो कि सरासर झूठ है। 

उल्लेखनीय है कि बाबा साहेब को भारत रत्न से विभूषित करने की कवायद राजीव गांधी  की सरकार बनने के पहले से ही चली आ रही थी किंतु नाना-प्रकार के अप्रत्यक्ष विरोधों के चलते बाबा साहेब अम्बेडकर को भारत रत्न से विभूषित नहीं किया गया किंतु वी. पी. सिह के प्रधानमंत्री काल में बाबा साहेब को भारत रत्न से विभूषित किया गया जिसमें अडवानी जी और अटल जी की कोई भूमिका नहीं थी। हां! ये बात जरूर थी कि भाजपा वी. पी. सिंह की सरकार को बाहर से सपोर्ट कर रही थी जिसे वी. पी. सिंह द्वारा मंडल आयोग लागू करते ही वापस ले लिया गया था और भाजपा मंडल आयोग को लागू करने के खिलाफ देशव्यापी आन्दोलन की अगुआ बन गई।

प्रधान सेवक जी ने यह भी कहा कि अटल जी के शासन काल में ही संसद भवन के केन्द्रीय हाल में बाबा साहेब का तैल-चित्र लगाया गया। उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि कांग्रेस ने संसद भवन के केन्द्रीय हाल में बाबा साहेब का तैल चित्र लगाने से यह कहकर इंकार कर दिया कि केन्द्रीय हाल में तैल-चित्र लगाने के लिए समुचित स्पेस नहीं है। जबकि बाबा साहेब का तैल-चित्र लगवाने की कवायद से जुड़े ‘डा. बी. आर. अम्बेडकर मंच’ के महासचिव का कहना है कि संसद भवन के केन्द्रीय हाल में बाबा साहेब का छोटे आकार का तैल चित्र दिनांक 09.08.1989 को लगाया गया, जब राजीव गान्धी की सरकार थी। और बाबा साहेब का बड़े आकार का तैल-चित्र दिनांक 12.04.1990 को लगाया गया, जब वी. पी. सिंह की सरकार थी। और यह भी कि बाबा साहेब का “छोटा” और “बड़ा” तैल-चित्र ‘डा. बी. आर. अम्बेडकर मंच’ के द्वारा ही उपलब्ध कराए गए थे न कि सरकार द्वारा।

मोदी जी ने यह भी कहा, ‘1951 में कैबिनेट से इस्तीफा देने के बाद बाबा साहेब ने 1952 में लोकसभा का आम चुनाव लड़ा था। कांग्रेस द्वारा की गई खिलाफत के कारण बाबा साहेब को हार का  अपमान सहना पड़ा।  इसके बाद उन्होंने 1953 में भंडारा सीट से लोकसभा का उपचुनाव लड़ा । कांग्रेस ने फिर बाबा साहेब को लोकसभा में पहुंचने से रोक दिया। इस लगातार अपमान के समय उनका साथ दिया था,  डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने । उन्हीं के प्रयासों से बाबा साहेब राज्यसभा में पहुंचे।’ किंतु यह सत्य से कोसो दूर की बात है। अपितु सच्चाई ये है कि बाबा साहेब ने 1952 में राज्यसभा सदस्य के रूप में संसद में मुम्बई का प्रतिनिधित्व किया था ।

यथोक्त के आलोक में यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि आरएसएस और इसके समर्थक संगठन बाबा साहेब अम्बेडकर के बारे में समय-समय पर कुछ न कुछ अनाप-सनाप अफवाह उड़ाते रहते हैं। कोई उन्हें ईश्वरवादी तो कोई उन्हें सनाड्य ब्राह्मण सिद्ध करने की कवायद करता दिखता है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि हिन्दूवादी शक्तियां बाबा साहेब को किसी न किसी तरह अपने पाले में खिंचने का प्रयास करती ही रहती हैं। इनके द्वारा दलित हितों की चिंता का ढिढोरा पीटते हुए अपना प्रचार करना और दलितों के वोटों को हथियाना ही मूल उद्देशय है और कुछ नहीं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि इस प्रकार के झूठे प्रकरणों का उल्लेख करना आम दलित को बरगलाने का काम करना है।
इस संदर्भ में दलित चिंतक डा. कुसुम वियोगी के यहाँ प्रस्तुत कथन से विमुख नहीं हुआ जा सकता कि आज कट्टरपंथी हिन्दुओं ने नरमपंथी हिन्दुओं की मानसिकता को लील लिया है। आज हम सबको जान लेना चाहिए कि कट्टरपंथी हिन्दू संगठनों और राजनीतिक दलों के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ आम्बेडकरवादियों, आम्बेडकरी विचार दर्शन को मानने वाले जनसंगठनों और राजनीतिक पार्टियो से है। अब साधारण जनमानस भी चुनौती दे रहा है। इसलिए डा. अम्बेडकर की विचारधारा का भगवाकरण कर यह सरकार राजनीतिक चरित्र हनन के उद्देश्य से कार्य कर रही है। यह वैचारिक हत्या का घिनौना कुकृत्य है। सच मायने में तो यह मनुवाद का एक नया संस्करण है।  कहना न होगा कि दलितों को दलित-हित कानूनों से वंचित करना ...मसलन सरकार के संकेत पर न्यायपालिका द्वारा Sc/St अत्याचार निरोधक अधिनियम 1989 की धार को कुन्द करना, संविधान बदलने की मंशा को लेकर चलना, आरक्षण को खत्म करने की कवायद करना, अम्बेड़कर का महा-गुणगान कर अम्बेडकरी विचारधारा का भगवाकरण करना, भ्रामक प्रचार कर दलित, पिछड़े व अल्पसंख्यक समुदाय को गुमराह करना, जाति एवं साम्प्रदायिक हिंसा में देश के अवाम को झोंकना एक सोची समझी साजिश और षड्यंत्र का हिस्सा है। ‘पंचतीर्थ स्थल’ के नाम से बाबा साहेब डा.अम्बेडकर के ऐतिहासिक स्थलों का हिन्दूकरण करना कट्टरपंथी हिन्दुओं अर्थात आरएसएस का एक गुप्त एजेंडा है।

उपरोक्त के आलोक में, आज दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को अपने हितों की साधना के लिए सचेत रहने की आवश्यकता है। जनता को सरकार की कथनी और करनी के अंतर को समझना होगा। यदि आज का प्रतिरोधी स्वर आगे भी बना रहता है तो समाज के हितों की साधना की कामना की जा सकती है...अन्यथा नहीं। जनता को समझ लेना चाहिए कि आज भाजपा के मुंह में अम्बेडकर और बगल में राम है।

 लेखक:  तेजपाल सिंह तेज (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हैं- दृष्टिकोण, ट्रैफिक जाम है, गुजरा हूँ जिधर से आदि ( गजल संग्रह), बेताल दृष्टि, पुश्तैनी पीड़ा आदि (कविता संग्रह), रुन-झुन, खेल-खेल में आदि ( बालगीत), कहाँ गई वो दिल्ली वाली ( शब्द चित्र), दो निबन्ध संग्रह  और अन्य। तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ग्रीन सत्ता के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका अपेक्षा के उपसंपादक, आजीवक विजन के प्रधान संपादक तथा अधिकार दर्पण नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं। स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं। हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं।


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