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एक घंटी जाति व्यवस्था में सुधार के लिए भी बजा दीजीए साहबजी

एक घंटी जाति व्यवस्था में सुधार के लिए भी बजा दीजीए मोदी जी, बजा दीजीए कभी, चुपचाप, आधी रात को, ऐसी स्पेशल घंटी जिससे रात ही रात में “एक देश एक जात”  हो जाए और अगले दिन से देश में सरनेम लगने खत्म हो जाएं और भारत जाति विहीन समता समाज में बदल जाए और सारी दुनिया में सबसे घिनौनी पहचान रखने वाली जाति व्यवस्था में सबसे बड़ा सुधार हो जाए।
आपको तो आदत है आधी रातों को घंटी बजाने की कभी नोटबंदी के नाम पर तो कभी टैक्स सुधार के नाम पर। जिसके लिए आप अपने खास लोगों से भी सलाह लेना पसंद नही करते, ( जैसा की आपने नोटबंदी के समय किया था ) लेकिन इसके लिए पहले आपको अपने अंदर (अंतर्मन) की घंटी बजानी पड़ेगी। क्योंकि जब तक वो नही बजेगी तब तक ये काम नही हो पाएगा... हालांकि संघी मानसिकता रखने वालों के लिए ये काम जरा मुश्किल है। आपकी मार्केटिंग में लगे विभागों के अनुसार आप भारत के ही नही बल्कि विश्व के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री हैं। वैसे ये किसी से छिपा नही है कि आप उन्हीं कामों पर अपनी मुहर ठोकने में लगे हुए हैं जिनकी रणनीतियां पिछली सरकारों ने बनाई थीं। और जिनका आप विरोध करते नही थकते थे। आपके लिए भी ये एक मौका हो सकता है कि आप अपनी साफ सुथरी छवि बनाने लिए कम से कम एक काम तो ईमानदारी से कर दीजीए देश में सबसे बड़ा सुधार जाति सुधार करवा दीजीए। मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि जितनी उम्मीद आप को इन सुधार व्यवस्थाओं से है, इन सबसे ज्यदा सुधार जाति व्यवस्था खत्म करने से आएगा, और देश ऐसी प्रगति की तरफ दौड़ लगाने लगेगा कि हमारे सामने चीन, अमेरिका भी पानी भरते नजर आएंगें। हालांकि मुझे पता है कि आप ऐसा नही कर पाएंगे क्योंकि आप साफ सुथरी छवि के लिए कितना भी दिखावा कर लें, घड़ियाली आंसू बहा लें, लेकिन आपका और संघ का रिश्ता नाभी-नाल की तरह जुड़ा है। और आपका पालन-पोषण वहीं हुआ है इसलिए उसके खिलाफ नही जाना आपकी मजबूरी है। एक प्रधानमंत्री होने के नाते आपको भी ये जानकारी होगी ही कि जब से आप लोगों ने पैर पसारे हैं तब से दलितों के खिलाफ उत्पीड़न का ग्राफ बहुत तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन क्या करें हम तो जनता हैं, उम्मीद करना हमारा काम है आखिर जनता जो ठहरे। मुझे एक शिकायत और है आपसे कि आपको विदेशियों की पीड़ा तो दिखती है लेकिन अपने देश के दलितों की पीड़ा महसूस नही होती, वरना आप जैसा लोकप्रिय प्रधानमंत्री दलितों के खिलाफ बढ़ रहे अत्याचारों पर कुछ तो संज्ञान लेता।
अगर कोई जागरूक दलित (जस्टिस कर्णन) आपको सुधार करने के लिए सचेत करने की कोशिश करता है तो आप और आपका बनाया हुआ सिस्टम उसे ही अपराधी बना देता है। चंद्रशेखर के ऊपर तो इनाम घोषित करवा दिए जाते हैं लेकिन संघ से जुड़ी सेनाओं को पोषित किया जाता है। खैर हमें कोई हैरानी नही है आपके ऐसे निर्णयों पर, जो ज्यादातर दलितों के खिलाफ ही जाते हैं... लेकिन कई बार बड़ी कोफ्त होती है आपके ढोल की पोल देखकर इसलिए आज मन कर गया आपसे मन की बात कहने का, हालांकि हमारी बात का कोई मतलब नहीं हैं,  लेकिन कई बार लगता है कि जो हम कर सकते हैं वो तो करें, इसलिए ये पत्र आपको लिख दिया, अपने मन की भड़ास निकालने के लिए। बेशक आप मन की बात कीजिये लेकिन दलितों के मन में पल रही भड़ास को थोड़ा तो महसूस कीजिये।   


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