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हिन्‍दू-धर्म में ही विघटन क्यों?



       उल्लेखनीय है कि मुरादाबाद के लाइन पार रामलीला ग्राउंड में शनिवार (30.09.2017) को रावण का 80 फुट ऊंचा पुतला दहन किया गया। जब रावण के पुतले का दहन किया जा रहा था उस समय रामलीला के मंच पर मेयर विनोद अग्रवाल, विधायक रितेश गुप्ता मौजूद थे। जैसे ही भगवान श्रीराम ने जैसे ही रावण का वध किया और रावण का पुतला धूं-धूं कर के जल उठा, तभी रावण के सीने के अंदर से बसपा सुप्रीमो मायावती के 60वें जन्मदिन का एक पोस्टर दिखाई दिया। यह पोस्टर मेरठ का था और किसी बसपा नेता शैलेन्द्र चौधरी ने बधाई दी थी। इस पोस्टर पर संविधान के रचियता बाबा साहब भीमराव अंबेडकर, ज्योतिबा फुले, काशीराम सहित कई दलित धर्म गुरुओं के फोटो थे। रावण का पुतला जैसे ही जला तभी पुतले के अंदर से बसपा के इस पोस्टर ने रावण देखने आए लोगों का ध्यान अपनी और आकर्षित किया।

       बहुजन समन्वय समिति के मुख्य सयोंजक चंदन रैदास ने कहा कि यह दलितों का अपमान है। इसमें दलितों के धर्म गुरुओं का भी अपमान हुआ है। बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का भी फोटो इस बैनर में था। दलितों के महापुरूषों का अपमान सहन नहीं किया जाएगा। बसपा जिलाध्यक्ष ने बताया कि पूरा वीडियो वाट्सअप पर देखा है हाई कमान को पूरा मामला बात दिया है।

यहाँ सवाल यह उठता है तमाम राजनीतिक दल दलितों के वोट पर कब्जा करने की जुगत में तो दलित माहपुरुषों की प्रशंसा मे तो कसीदे गढ़्ते रहते हैं लेकिन मौका मिलते ही उनका अपमान करने से नहीं चूकते। मुरादाबाद की इस घटना में किसी न किसी राजनीतिक दल का हाथ की बात को कतई भी नहीं नकारा जा सकता।

ऐसी अनेक घटनाओं के चलते दलितों में रोष तो पैदा होता ही है अपितु उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए बाध्य भी करता है। फेसबुक  (12.06.2017) पर नरेन्द्र तोमर जी इस पर टिप्पणी करते हुए कहते है, “ आरएसएस और भाजपा भारत को 2023 तक हिंदू राष्ट्र बना देना चाहते हैं और इसको साकार करने की रणनीति पर विचार करने के लिये लगभग 150 छोटे बड़े हिंदू राष्‍ट्रवादी संगठन 14 से 17 जून तक गोवा में मीटिंग करने जा रहे हैं। आरएसएस और हिंदू महासभा से जुड़े हिंदू राष्ट्र  बनाने के इस विचार में 1992 में बाबरी मस्जिद गिराने के बाद एक नई जान सी पड़ी थी। केंद्र में मोदी सरकार बनने के साथ ही आरएसएस और भाजपा  फुफकारने ही नहीं डसने भी लगे थी। और उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनवा कर संघ ने तरह-तरह के नए पुराने उग्र हिंदुत्ववादियों को पूरी तरह से बेलगाम कर दिया । तथाकथित हिंदू राष्ट्रवादी ये तत्व इस देश में समान नागरिक संहिता के नाम पर चाहते हैं कि लगभग 80 प्रतिशत हिंदू आबादी वाले भारत में हर किसी का खान-पान, पहनावा, रहन सहन और पूजा पद्धति आदि एक समान वैसा हो जैसा ये मानते और चाहते हैं। यह कहना तो मुश्किल है कि तरह-तरह के स्वाथोँ का प्रतिनिधित्व करने वाले ये हिंदू राष्ट्रवादी क्या कोई समान रणनीति बना पाएंगे, पर यह स्पष्ट है कि अपनी उग्र कार्रवाईयों के जरिए आम लोगों का ध्यान उनकी मूल समस्याओं से हटाने की कोशिश जरूर करेंगे।” 

यथोक्त कथन से यह तो स्पष्ट होता ही है कि आज हम ऐसे कगार पर खड़े हैं कि न जाने कब किस प्रकार के सामाजिक बिखराव अथवा आतंक के शिकार हो जाएं। विज्ञान एवं तकनीकी के वर्तमान युग में भी धार्मिक कट्टरपंथी अपना-अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए नित नए-नए तरीके तलाशने में लगे हैं। धर्म के नाम पर उग्रवाद का सहारा लेना भी आजकल नैतिक हो गया है। मन्दिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरूद्वारे आदि का विवाद उठाना, लोगों की धार्मिक भावनाओं को भड़काना आदि इसी क्रम के आम कृत्य हैं। यही कारण है कि समय-समय पर धर्म परिवर्तन  के मामले अक्सर प्रकाश में आते रहते हैं। एक आंकलन के अनुसार पाया गया है कि हिन्दू धर्म ही सबसे ज्यादा विघटित हुआ है।

 धर्म परिवर्तन  का यह काम नया नहीं है। यह भी कि जब-जब भी धर्म परिवर्तन हुआ, तब-तब हिन्दुओं ने ही धर्म परिवर्तन किया। चाहे कोई ईसाई बना या सिख, चाहे कोई मुसलमान बना या बौद्ध.... वे सबके-सब हिन्दू ही रहे हैं। किंतु हिन्दू धर्म के ठेकेदारों को सदैव एक ही चिंता रही है कि उनके धर्म के लोग दूसरे धर्म में जा रहे हैं।  उन्हें इसकी चिंता कभी नहीं रही कि ये लोग हिन्दू धर्म छोड़कर दूसरे धर्मों में क्यों जा रहे हैं। कट्टरपंथी हिन्दू अपने ही धर्म के पिछड़े और दलित लोगों की कोई मदद नहीं करना चाहते और न ही उनकी सामाजिक-आर्थिक दशा सुधारने के प्रयास ही करते हैं।  दलितों और पिछड़ों को सामाजिक न्याय और सम्मान प्रदान करना तो कोसों दूर की गोटी रही है। जब हिन्दू समाज के दलित वर्ग के लोग हिन्दू धर्म छोड़कर कोई दूसरा धर्म ग्रहण करते हैं तो हिन्दू धर्म के नेता खूब हो-हल्ला मचाते हैं। वस्तुत: दलित वर्ग के लोग दूसरा धर्म इसलिए ग्रहण करते हैं कि वे अच्‍छी तरह समझ गए है कि हिन्दू धर्म में रहते उन्हें न तो सामाजिक-आर्थिक समानता मिलेगी और न ही भौतिक अत्याचारों से मुक्ति।

कहना अतिश्योक्ति नहीं कि भारतवर्ष एक ऐसा देश है जिसके समाज में गहरा अलगाव रहा है क्योंकि भारतीय जनसमूह में अलग-अलग प्रकार की अनेक जातियां व धर्म हैं। सबकी आर्थिक, धार्मिक एवं सामाजिक स्थिति अलग-अलग हैं। हिन्दू धर्म में व्यापक जाति-भेद ही हिन्दू धर्म के निरंतर विघटन का मूल कारण कहा जाएगा। स्पृश्य हिन्दू और अस्पृश्य हिन्दू के बीच की सामाजिक असमानता ने धर्म परिवर्तन में और चार चाँद लगाए हैं। कितना अफसोसनाक सत्य है कि एक हिन्दू एक गैर-हिन्दू के प्रति मुख्यत: हिन्दूपन की भावना से व्यवहार करता है किंतु अपने ही धर्म की दूसरी जाति के हिन्दू के प्रति जाति-भावना से व्यवहार करता है।

इससे पहले कि आज की सामाजिक स्थिति पर बात की जाए, मैं दिसंबर 1992 के अयोध्या कांड पर कुछ बात करना चाहता हूँ। गौरतलब है कि दिसंबर 1992 के अयोध्या कांड के उपरांत तो अनेक नए प्रश्नों ने जन्म लिया। विभिन्न शंकाओं/आशंकाओं ने खूब सिर उठाया।  बाबरी मस्जिद के विनाश को कोई तो राष्ट्रीय एकता के पुनर्गठन की प्रतिध्वनि के रूप में देख रहा था तो कोई इसे राष्ट्रीय मूल्यों के निर्वाह की प्रतिध्वनि के रूप में।  ‘राष्ट्रीय एकता के पुनर्गठन’  की बात एक राजनीतिक सोच ही कही जाएगी। अयोध्या कांड को राष्ट्रीय मूल्यों के विनाश की प्रतिध्वनि के रूप में देखना समसामयिक संदर्भों में न केवल सार्थक है अपितु तर्कसंगत भी है।

कहना अतिशयोक्ति न होगा कि अन्य धर्मों के मुकाबले हिन्दू धर्म अध्यात्मिकता अर्थात रूढ़ीवादिता को अधिक प्राथमिकता देता है। हिन्दू धर्म का विश्वास है कि कर्म से मुक्ति पाकर ही व्यक्ति जन्म और मृत्यु के बन्धन से मुक्ति पा सकता है।  यह मूर्खतापूर्ण मान्यता अनपढ़ों को अधिक प्रभावित करती है। उल्लेखनीय है कि भारत में हिन्दू धर्म जाति-प्रथा के पोषक तत्वों में प्रमुख हैं। हिन्दू धर्म ने श्रमिक वर्ग को अभावों भरा धर्मान्ध जीवन ही दिया है। फलत: पूंजीवादी वर्ग पूंजी के माध्यम से बिना किसी श्रम के धनी बना है और श्रमिक वर्ग  सिर पर धर्मान्धता का ताज पहन कर पूंजी से वंचित धर्म के बल पर जीवन चलाता है। पूंजीवादी वर्ग न केवल शासक है अपितु श्रमिकों का नाना प्रकार से शोषण करता रहा है।

यथोक्त के आलोक में, जगजाहिर है कि जातिगत अत्याचारों के चलते  धर्म परिवर्तन की गति को बल मिल रहा है और अक्सर धर्म परिवर्तन के मामले भाजपा के प्रनिधित्व वाले राज्यों में देखने को ज्यादा ही मिलते हैं। केन्द्र में भाजपा की सरकार के चलते भाजपा शासित राज्यों में जातीय दंगों में शामिल लोगों को राज्य और केन्द्र का अधोषित संरक्षण मिलता है। हाँ! बयानबाजी में जरूर अपराधियों के खिलाफ कार्यवाही करने की बार-बार घोषणा की जाती रहती है।

कहना अतिशयोक्ति न होगा कि केन्द्र में भाजपा सरकार के आते ही हिन्दुओं के स्वंभू गौरक्षकों के जैसे अपराधी समूहों की संख्या में तेज़ी से वृद्धि हो रही है। कहना न होगा कि उत्तर प्रेदश में योगी सरकार के शासन में आने के बाद से आरएसएस और उसके अनुषांगिक संगठन अपना असली रंग दिखा रहे हैं। ऐसे में पीड़ितों के पास  इसके सिवाए कोई विकल्प नहीं है कि वे ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म को त्याग दें। अल्पसंख्यक वर्ग भी इस त्रासदी से नहीं बचा है। और तो और अब तो भाजपा के जरिए आरएसएस दलितों और मुसलमानों के बीच अलगाव पैदा करने का काम कर रही है जो न केवल समाज की, अपितु देश की प्रगति में बाधक है। इससे सामाजिक सदभाव तो बिगड़ता ही है, साथ ही अनेक प्रकार की वैर भावना को स्‍थायित्‍व भी प्रदान करता है।

आज, स्वाधीनता के 70 साल, और भारतीय संविधान, जो सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है, के लागू होने के 67 साल बाद भी, जाति प्रथा जिंदा है। गोरखनाथ मठ के भगवाधारी आदित्यनाथ योगी के उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद एक बार फिर यह साबित हो गया है कि जातिप्रथा हमारे समाज में आज भी उतनी ही मज़बूत है जितनी पहले थी। योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से उत्तर प्रदेश में दलितों पर अत्याचार की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई है। सहारनपुर में हुई हिंसा इसका एक उदाहरण है। कुछ रपटों के अनुसार, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ गांवों के 108 दलित परिवारों ने योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से दलितों पर अत्याचार की घटनाएं बढ़ने पर अपना विरोध प्रदर्शन करने के लिए बौद्ध धर्म अंगीकार कर लिया है। सहारनुपर के कुछ गांवों में, ठाकुरों और दलितों के बीच हिंसक झड़पें हुईं जिनका मूल कारण जातिगत विद्वेष ही रहा है। ठाकुरों ने अंबेडकर की मूर्ति नहीं लगने दी और दलितों ने राजपूत शासक राणाप्रताप की जयंती मनाने के लिए एक जुलूस को निकलने नहीं दिया क्योंकि उसके लिए विधिवत अनुमति नहीं ली गई थी। दलितों का कहना है कि क्योंकि योगी खुद ठाकुर है, अत: आदित्यनाथ की सरकार, केवल ठाकुरों की सरकार बनकर रह गई है।

भाजपा के केन्द्र में आने के बाद, पिछले तीन वर्षों में दलितों के प्रति दुर्भावना और पूर्वाग्रह अलग-अलग तरीकों से प्रकट हुआ है। आईआईटी मद्रास में अंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल पर प्रतिबंध लगाया गया; हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के प्रशासन की दलित-विरोधी नीतियों के कारण वहां के शोधार्थी रोहित वेमूला की संस्थागत हत्या हुई; गुजरात के ऊना में पवित्र गाय की रक्षा के नाम पर दलितों को बर्बर ढंग से पीटा गया। दरअसल, हिन्दू राष्ट्रवाद की राजनीति, जाति व्यवस्था से दमित वर्गों के लक्ष्य से एकदम विपरीत दिशा की ओर ले जाने वाली है। हमें याद रखना चाहिए कि सामाजिक न्याय के महानतम पैरोकारों में से एक अंबेडकर ने मनुस्मृति को सार्वजनिक रूप से जलाया था। परंतु इसी मनुस्मृति का आरएसएस के चिंतकों, जैसे एम एस गोलवलकर ने महिमामंडन किया। गोलवलकर जैसे लोगों ने तो भारतीय संविधान तक का इस आधार पर विरोध किया कि जब हमारे पास मनुस्मृति के रूप में पहले से ही एक ‘अद्भुत’ संविधान मौजूद है तो हमें नए संविधान की ज़रूरत ही क्या है? जहां अंबेडकर कहते थे कि गीता, मनुस्मृति का संक्षिप्त संस्करण है। वहीं मोदी सरकार गीता का प्रचार-प्रसार करने में जुटी हुई है। वह वैदिक युग के मूल्यों को पुनर्जीवित करना चाहती है।

सहारनपुर के निकट मुरादाबाद के लगभग 50 दलित परिवारों ने यह धमकी दी है कि अगर आदित्यनाथ, भगवा ब्रिगेड द्वारा दलितों पर किए जा रहे हमलों को नहीं रोकते तो वे हिन्दू धर्म त्याग देंगे। इस आशय की खबर ‘द टाईम्स ऑफ इंडिया’ के 22 मई 2017 के अंक में छपी है। दलितों और मुसलमानों का कहना है कि योगी सरकार के शासन में आने के बाद से आरएसएस और उसके अनुषांगिक संगठन अपना असली रंग दिखा रहे हैं जिसके विरोध में दलितों ने “भीम आर्मी”  और कई अन्य दलित संगठनों ने  22 मई, 2017 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर विशाल रैली करके, उनके विरुद्ध किए जा रहे अत्याचारों का विरोध जताया था। यह  जबरदस्त विरोध प्रदर्शन इस बात की ओर संकेत करता है कि आर एस एस द्वारा हिन्दू धर्म के मूलतः समानता का धर्म होने की भ्रांति उत्पन्न करने का प्रयास सफल नहीं होगा। इससे हमें यह याद आता है कि अंबेडकर को अंततः धर्म द्वारा वैध ठहराई गई जाति प्रथा से बचने के लिए, हिन्दू धर्म का ही त्याग करना पड़ा था। आज भी दलित धर्म-परिवर्तन करने में अपनी मुक्ति देखते हैं। नेशनल दस्तक ब्यूरो ( 29.05.2017) के अनुसार तमिलनाडु के कुड्डालोर के देहाती हिस्सों में धर्म परिवर्तन की खबरें तो सुनी जारी रही हैं किंतु इस बार यहाँ के ग्रामीणों ने नहीं बल्कि दलित वर्ग से संबंधित 51 डाक्टरों ने हिन्दू धर्म को छोड़्कर बौद्ध धम्म को अपनाया है। सभी धर्मांतरित लोगों ने बताया कि वे जन्म के बाद से ही सामाजिक भेदभाव का सामना कर रहे हैं। 

खेद की बात है कि इतने पर भी आज तक  सहारनपुर में हिंसा की खबरें लगातार आ रही हैं। अफसोस की बात ये भी है कि पुलिस और स्थानीय अखबार इसके लिए लगातार पीड़ित पक्ष को ही जिम्मेवार ठहरा रहे हैं। इस क्रम में भीम आर्मी का नाम इस प्रकार उछाला जा रहा है, जिससे ऐसा लगने लगा है कि वही संगठन हिंसा के लिए जिम्मेवार है। उल्लेखनीय है कि धार्मिक अधिकारों पर संघ परिवार का पूरा पहरा है। जानना होगा कि हिन्दू धर्म के स्वंभू हिन्दू धर्मरक्षक धर्मांतरण को तो मुद्दा बनाते हैं लेकिन जाति पर आधारित शोषण-दमन, भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार जैसे मसले उनकी नजर में कोई समस्या नहीं हैं।

धर्मांतरण की इन घटनाओं के तटस्थ विश्लेषण से यह साफ़ हो जायेगा कि दूसरा धर्म ग्रहण करने वाले ज्यादातर लोग हिंदू समाज की दलित-वंचित जातियों के या फिर गरीब आदिवासी रहे हैं। हिंदू समाज में सबसे निचले पायदान पर रखी गई इन जातियों की सामाजिक हैसियत और उनसे ऊंची कही जाने वाली जातियों का उनके साथ बर्ताव किसी से छिपा नहीं है। ऊंची और दबंग जाति के लोग इनके साथ जानवरों सा बर्ताव करते हैं। दलित और वंचित जातियों को समाज में हर जगह भेदभाव का सामना करना पड़ता है। मंदिरों में उन्हें प्रवेश नहीं मिलता। उनका शोषण और दमन होता है। तनिक भी विरोध करने पर उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता है, जो गरीबी, अशिक्षा और अभाव से भरी उनकी जिंदगी को और भी दुखमय बना देता है। वैसे मेरे मन-मस्तिष्क में यह सवाल भी उठता है कि आखिर मन्दिर प्रवेश से दलितो को मिलने वाला क्या है? उल्टे हिन्दू धर्म की दासता ही हाथ लगेगी... और कुछ नहीं।

सारांशत: प्रत्येक आचरण में उसका विरोधी आचरण निहित होता है और इन विरोधी तत्वों एवं दृष्टिकोणों के आपसी अंतर्द्वद्वं के कारण ही परिवर्तन (समाज के संबंध में इसे सामाजिक परिवर्तन भी कह सकते हैं) की प्रक्रिया जन्म लेती है। आज हिन्दू समाज का बहुजन इन मूल्यों एवं अर्थों को खूब समझने लगा है और अनुपूरक प्रक्रिया के बल पर सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को निरंतर बल प्रदान करने की ओर अग्रसर है। अभी भी वक्त है कि हिन्दूवादी ताकतें आज के यथार्थ को समझें और समय रहते गैर हिन्दुओं के प्रति अपने अनाचारी व्यवहार में परिवर्तन लाएं। 
 
गौरतलब है कि हिन्दू राष्ट्रवाद, भारत के उस काल्पनिक इतिहास का पुनर्निमाण करना चाहता है, जिसमें हिन्दू धर्मग्रंथों के मूल्यों का बोलबाला था। वह वैदिक युग के मूल्यों को पुनर्जीवित करना चाहता है, जिनका एक प्रजातांत्रिक समाज में कोई स्थान नहीं हो सकता। हिन्दू धर्म की कई अन्य धाराएं भी हैं जिन्हें संयुक्त रूप से श्रमण परंपराएं कहा जाता है। ये परंपराएं ऊँच-नीच को खारिज करती हैं। परंतु हिन्दू धर्म के ब्राह्मणवादी संस्करण ने इन परंपराओं को हाशिए पर धकेल दिया है। पिछली लगभग एक सदी से ब्राह्मणवादी मूल ही हिन्दू राष्ट्रवाद का आधार बने हुए हैं। किंतु समय समय पर ब्राह्मणवादी मूल का नाना प्रकार से चलने वाले विरोध प्रदर्शन तो इस बात की ओर संकेत करते हैं कि आरएसएस और इसके समर्थक गुटों द्वारा दलित और दमित जातियों के लोगों पर किये जाने दमन के चलते, आरएसएस का हिन्दू धर्म के मूल को पुनर्स्थापित करने का भ्रामक प्रयास अब सफल होने वाला नहीं है। इससे हमें यह याद आता है कि अंबेडकर को अंततः धर्म द्वारा वैध ठहराई गई जाति व्यवस्था से बचने के लिए हिन्दू धर्म का ही त्याग करना पड़ा था। आज का दलित भी हिन्दू धर्म के त्याग में ही अपनी मुक्ति देखते हैं। 


 लेखक:  तेजपाल सिंह तेज (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हैं- दृष्टिकोण, ट्रैफिक जाम है, गुजरा हूँ जिधर से आदि ( गजल संग्रह), बेताल दृष्टि, पुश्तैनी पीड़ा आदि (कविता संग्रह), रुन-झुन, खेल-खेल में आदि ( बालगीत), कहाँ गई वो दिल्ली वाली ( शब्द चित्र), दो निबन्ध संग्रह  और अन्य। तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ग्रीन सत्ता के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका अपेक्षा के उपसंपादक तथा अधिकार दर्पण नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं। स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं। हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं



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