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मेरे लिए स्वतंत्रता का क्या अर्थ है ? : डॉ. श्यौराज सिंह बेचैन

मेरे लिए स्वतंत्रता का क्या अर्थ है ? यह प्रश्न ऐसा नहीं है कि जिस पर मुझे कभी विचार करने की आवश्यकता न पड़ी हो, यह प्रश्न ऐसा भी नहीं जो किसी व्यक्ति विशेष से ही संबंधित हो, स्वतंत्रता के सभी के लिए अलग-अलग और कुछ मामलों में एक जैसे मायने हो सकते हैं । स्वतंत्रता कोई एक आयामी व्यवस्था नहीं है । वैयक्तिक और सामाजिक जीवन में इसके अनेक क्षेत्र हैं । सामान्य तौर पर अथवा रूढ़ अर्थ में स्वतंत्रता से सभी के लिए मात्र इतना आशय लिया जाता है कि हम एक राष्ट्र के रूप में ब्रिटिशों की गुलामी से आजाद हो गए और अब हमारे ऊपर हमारे द्वारा चुने हुए शासक शासन करते हैं । पर क्या सच में मेरे लिए यह वैसी स्वतंत्रता बन पाई जैसी स्वतंत्रता की कल्पना बाबा साहब अंबेडकर, महात्मा गांधी या शहीद भगत सिंह कर रहे थे । 

जिस रूप में यह स्वतंत्रता मेरे जैसे लोगों तक पहुंची है, उसे हम कैसे समझे ? मतलब यह कि व्यक्ति के स्वतंत्र होने के लक्षण क्या हैं ? हम यह कैसे पहचान करें कि अमुक व्यक्ति सच में आजाद है, जैसा उसे उस देश के संविधान के अनुसार स्वतंत्र होना चाहिए था। 

स्वतंत्रता बंदिशों से मुक्त खुले में सांस लेने की एक अनुभूति है । यह मानवाधिकार की पहली शर्त है । यह मनुष्य जीवन की उपलब्धि है, कि वह स्वतंत्र है तो स्वतंत्र अनुभव भी करे । सब क्षेत्रों में विकास के रास्ते खुले होने चाहिए । जाति, धर्म या लिंग के आधार पर उसका कोई रास्ता रुकना नहीं चाहिए । पर क्या हम कह सकते हैं कि कला, सिनेमा, मीडिया जैसे क्षेत्रों के रास्ते अछूतों के लिए भी खुले हैं । वहां जाति वर्चस्व जैसी स्थिति नहीं है । इन क्षेत्रों में एससी-एसटी की स्वतंत्रता की छाती पर कुछ गैर दलित जातियों के दबंगों ने उछल कूद नहीं मचा रखी है । मैं व्यक्ति के रूप में समाज की इकाई हूं और मैं ऐसे देश का नागरिक हूं जो सामाजिक संस्कृतियों और सामाजों का समूह है । जिसमें बहुलता और विविधताएं हैं । तो मैं जिस समाज का हिस्सा या प्रतिनिधि हूं । कमोवेश उस समाज के हिस्से स्वतंत्रता कम और समस्याएं अधिक आई हैं । कृपया कवि के शब्दों में जरा मेरी स्थिति तो जानें- 

जाको धन धरती हरियौ, ताहि रख्यौ नहीं संग। 
जो पै रखनों हूं परयौ, तौ करि रख्यौ अपंग ।।

यानी पहले तो दलित आदिवासी का धन धरती छीना और फिर उसे अपने साथ भी नहीं रखा । गांव के एक कौने पर बसा दिया या महानगरों के अविकसित इलाकों की ओर धकेला । विकास के साधनों से वंचित कर उसे विकलांग बना कर रखा । आज भी एससी-एस टी के स्पेशल कंपोनेंट प्लान का 280 करोड़ रुपया उनके विकास कार्यों पर लगने को पड़ा है । बजट की यह धन राशि इन वर्गों की शिक्षा, दवा, आवास आदि विकास कार्यों पर लगने के बजाय या तो कॉमनवेल्थ गेम्स जैसी गैर एससी-एसटी मद में खपा दिया जाता है या लैप्स हो जाता है । नतीजा स्वतंत्रता में सुख का हिस्सा राई और दुख पर्वत सा होता चला जा रहा है । जो व्यक्ति साहित्यकार होता है उसका सरोकार व्यापक समाज से होता है । वह सामूहिक स्वातंत्रीय का चिंतन करता है । देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा जीवन की मूलभूत सुविधाओं से वंचित रहता है, वह दासता की दादी-नानी अविद्या, असुरक्षा और गरीबी रूपी समस्याएं सुरसा की तरह हमारे रास्ते में मुंह फाड़े खड़ी हैं । राजनीति सत्तर की पूतना मौसी बनी बच्चों जैसे अबोधपन को क्या सच में जीवनदायी दूध पिला रही है ? जबकि हमें पीने योग्य पानी, रहने योग्य आवास और जीने योग्य भोजन व औषधि प्राप्त नहीं हैं । 

ऐसे में क्या दलित आदिवासी भारत के लिए स्वतंत्रता बेमानी नहीं है ? क्या ऐसी स्वतंत्रता को हमारी सामाजिक दासता का अघोषित पर्याय नहीं कहा जाए ? जब हमारे समाजों के लिए स्वतंत्रता अर्थहीन हो तो मेरे जैसे किसी व्यक्ति के लिए वह सामाजिक दृष्टि से अर्थवान कैसे हो सकती है ? जो जातीय दबंगई हमारी स्वतंत्रता को अपने पेरों से कुचल रही है क्या उन जातियों के स्वभाव, संस्कार और सोच इतनी सुधर सकी है कि पर जाति देश बधुंओं के अधिकार और के अधिकार और स्वतंत्रता उन्हें देना अपना नैतिक दायित्व समझ सकें ? 

अस्पृश्यता -भारत के दलित समुदाय के लिए स्वतंत्रता तब तक बेमानी होगी जब तक समाज में अस्पृश्यता  कायम रहेगी, अस्पृश्यता स्वतंत्रता पर बहुत बड़ा सवाल है । सत्तर साल की आजादी में अस्पृश्यता बची हुई तो इसका मतलब है कि इसे समाप्त करने की दिशा में कारगर कुछ नहीं हुआ है । डॉ. बी आर अंबेडकर अस्पृश्यता की तुलना दासता से करते थे । जब बाल गंगाधर तिलक ने कहा था कि ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’ तब डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि ‘अस्पृष्यता का अंत करना मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है ।’ अब तिलक और गांधी जी का काम तो पूरा हो गया । स्वराज तो उन्नीस सौ सेंतालीस में मिल गया । परन्तु अस्पृश्यता आज दो हजार सत्तरह में भी मौजूद है । इसका मतलब डॉ. अंबेडकर के सपनों की स्वतंत्रता तो आई ही नहीं । जिस अनुपात में अस्पृश्यता में कमी आएगी उसी अनुपात में ही स्वतंत्रता वंचितों को मिल पाएगी । अपितु अस्पृश्यता शारीरिक प्रकार से बढ़कर मानसिक प्रकार की हो चुकी है । कुछ शिक्षित और सुधरे हुए लोग अस्पृश्यता भूल कर सहभोजन तो कर लेंगे पर उसके अधिकार या उसके समाज हित के विरुद्ध कार्य करेंगे, मतदान करने में भी अघोषित अस्पृश्यता का ही व्यवहार करेंगे । अस्पृश्यता और बहिष्कार की प्रवृति ने हम दलितों के लिए स्वतंत्रता अर्थहीन कर दी है । इससे हमारे देश में सुधार कार्य ठप पड़े हैं और दलित आदिवासियों के विकास के रास्ते बंद कर दिए गए थे । 

स्मरण हो कि बाबा साहब डॉ. अंबेडकर ने ‘स्वराज की तुलना सुराज से नहीं शीर्षक संपादकीय  (मूकनायक 14/02/1920) में लिखा था कि हिन्दुस्तान का संस्कृति  की दृष्टि से जंगली लोगों में प्रथम अथवा सुधरे हुए राष्ट्रों में आखिरी नंबर लगा है ।’ ऐसा मैं नहीं कहूंगा कि अछूत समस्या पर किसी ने कुछ कहा नहीं या सोचा । गांधी जो फील्ड के चैंपियन थे । परन्तु वे कानून के बजाय स्पृश्य हिन्दुओं की इच्छा पर छोड़ रहे थे कि वे स्वेच्छा अस्पृश्यता त्याग देंगे।
इस दृष्टि से शहीदे आजम भगत सिंह ने ‘अछूत की समस्या’ शीर्षक से अपने लेख में हमारी स्वतंत्रता की फिक्र जाहिर की है । यह वही समय था जब डॉ. अंबेडकर दलितों को अल्पसंख्यक श्रेणी में रखते हुए पृथक निर्वाचन देने  की मांग कर रहे थे । भगत सिंह ने अस्पृश्यता निवारण के काम के बारे में लिखा था कि- ‘यह काम उतने समय तक नहीं हो सकता हो सकता, जितने समय तक कि अछूत कौमें अपने आपको संगठित न कर लें । हम तो समझते हैं कि उनको अलग संगठनबद्ध करना या मुसलमानों के बराबर गिनती में होने के कारण उनके बराबर अधिकारों की मांग करना, बहुत आशाजनक संकेत हैं । या तो सांप्रदायिक भेद का झंझट ही खत्म करो नहीं तो उनके अलग अधिकार उन्हें दे दो।’  इसी लेख में भगत सिंह ने आगे कहा था कि  ‘अछूत कहलाने वाले असली जन सेवक भाइयों उठो, अपना इतिहास देखो ! गुरु गोविंद की फौज की असली शक्ति तुम्ही थे । शिवाजी तुम्हारे भरोसे ही सब कुछ कर सके ।  तुम्हारी कुर्बानियां स्वर्ण अक्षरों में लिखी हैं । (किरती 2 जून 1928 के अंक में विद्रोह नाम से)’ स्वामी अछूतानंद इतिहास खंगाल कर बता रहे थे कि किस तरह मूलनिवासियों की स्वतंत्रता, सम्मान और संपत्ति छीन ली थी । देश के नैसर्गिक स्वामियों को मार-पीट कर जगंलों में खदेड़ा या अछूत बना कर मेहनताना दिए बेगारें ली। 

अव संविधान में दिए गए अधिकारों को देखकर संविधान की प्रस्तावना की परिकल्पना के अनुसार मुझे यह कहना मुश्किल होगा कि बहुसंख्य अछूत, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों की कुछ खास वर्चस्वशाली सामाजिक राजनैतिक शक्तियां वस्तुगत दृष्टि से स्वतंत्रता को साझा कर हमारे लिए भी अर्थपूर्ण बना रही हैं । 

विद्या के बिना स्वतंत्रता की कल्पना जागृत नहीं हो सकती है। बिना गुणकारी विद्या के स्वतंत्रता हासिल नहीं होती है । मार्टिन लूथर किंग से लेकर नेल्सन मंडेला तक ने अश्वेत गुलामों को गोरों की गुलामी से स्वतंत्रत होने के लिए विद्या को आंदोलन बनाया था । हमारे देश में भी महात्मा ज्योतिबा फूले और सावित्रीबाई फूले ने विद्या का महत्व समझा और डॉ. अंबेडकर ने ‘शिक्षित बनो’ का नारा दिया था । शिक्षा सस्ती समान और सर्वसुलभ हो इस बात पर उन्होंने सर्वाधिक बल दिया था । सार्वजनिक विद्या विस्तार से ही दुनिया के अनेक देशों में उनके स्वराज का विस्तार हुआ है । अमेरिका, फ्रांस, कनाडा, जर्मन, चीन, जापान इत्यादि देशों में प्रगति का वाहन विद्या ही बनी थी । विद्या ही सपने, पात्रता और लायकी प्रदान करती है । विद्या के अभाव में देश के संसाधनों में हिस्सेदारी और जीविका के अवसर छीन लिए जाते हैं और अस्पृश्यों के लिए स्वतंत्रता शाब्दिक जुगाली बन कर रह जाती है।

स्वाबलंबन के अभाव में व्यक्ति का तेज चला जाता है । उसकी मनोभूमि में मानवोचित आत्मसम्मान और स्वाभिमान का बीजारोपण नहीं होता । उसके उलट उसकी स्वतंत्रता दुराभिमानियों के हाथों का खिलौना बनकर रह जाती है । वस्तुगत रूप में स्वतंत्रता उन्हीं को मिल पाती है, जिन्हें देश की सब तरह की सत्ताओं में समान भागीदारी करने के अवसर मिल पाते हैं  और जिन्हें सामाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक विषमताओं के नीचे दबाया जाता है उनकी स्वतंत्रता का कोई मतलब नहीं रह जाता है । कमी का दंश गहरे तक टीस पहुंचाता है । भारत का विशाल दलित वर्ग इसी अववंचना का शिकार हुआ नजर आता है । मेरा इसी से एक भुक्तभोगी नाता है । मेरा जन्म देश को स्वतंत्रता मिलने के बाद हुआ । परन्तु पांच- छै साल की उम्र में जब मेरे पिता की असामयिक मृत्यु हुई और मुझे विरासत में मुर्दामवेशी का काम बेगार का काम और परिवार में बचे तीन दादा भाइयों में दो नेत्रहीन थे और एक विक्लांग । दो-ढाई बीघा बंजर जमीन,अनपढ़ और विधवा मां के पास कोई हुनर नहीं, आय का कोई स्रोत नहीं, कोई जमा पूंजी नहीं । उसके चार में एक बच्चा दवा और भोजन के अभाव में मर गया । नाना ने मां का पुनर्विवाह कर दिया । मुझे पांच से पन्द्रह वर्ष तक की उम्र में एक वक्त की रोटी के लिए बाल बेगार करनी पड़ी, जबकि यही उम्र बच्चे के पढ़ने लिखने और खेलने कूदने की उम्र होती है । और कुपोषण का शिकार होना पड़ा । तब मेरे लिए मेरी स्वतंत्रता कहीं किसी मतलब की रही होती तो वह उम्र स्कूल जाने, सपने देखने और किताबों में डूबने की उम्र थी । पर क्या स्वतंत्रता ने मेरी कोई खैर खबर ली थी ? अगर मेरे लिए भी कोई स्वतंत्रता थी और मेरी कोई चिंता थी तो मैं 1968 में आठ-नौ साल की उम्र में दिल्ली के राजौरी गार्डन में कभी रगड़ाई की मशीन पर बाल श्रम कर रहा था तो कभी कॉलोनी में आवाज लगा लगा कर नींबू, अंडे बेच रहा था, घर-घर अखबार डाल रहा था, रात के ग्यारह-ग्यारह बजे तक होटल पर जूठे बर्तन धो रहा था और हमउम्र बच्चों को पीठ पर बस्ता लादे स्कूल जाते हसरत भरी नजर से देखता रहा था ? तब मेरी स्वतंत्रता कहां थी ? 

जब 1970-73 के दौरान मुझे भूख और गठिया की बीमारी ने तोड़ कर रख दिया था । जब मैं 12-14 साल की उम्र में लाठी के सहारे उठता चलता था तब दवा और रोटी मयस्यर नहीं थी । शारीरिक श्रम के अलावा जीने का रास्ता नहीं था और शरीर साथ नहीं दे रहा था । जब मैं नहीं जानता था कि मेरी स्वतंत्रता कहां थी ? मैं गठियाबाय के दर्द के साथ डिबाई रेलवे क्रासिंग पर बूट पॉलिश करने बैठ गया था । 

मेरे इर्द गिर्द स्वतंत्रता ने कैसा समाज दिया उसका एक उदाहरण पेश करना चाहूंगा । यह लगभग 1971 का समय रहा होगा । मैं अपनी बहन के गांव डूंगर मिर्जापुर में था । इस गांव में जाटों, ब्राह्मणों और जाटों की आबादी लगभग बराबर-बराबर थी । केवल एक परिवार बाल्मीकियों से था, जो जाटवों से सटा हुआ था । उस समय कई दिनों तक मूसलाधार बारिश हुई थी । जाटवों का कुआं नीचे में था और बगैर जगत का था । बाल्मीकि परिवार इसी कुएं से पानी लेता था । बारिश के पानी सहित गंदा कूड़ा कचरा जाटवों के कुएं में आकर भर गया, जिससे कुएं का पानी पीने लायक नहीं रहा । लेकिन ब्राह्मणों और जाटों के कुओं की जगतें ऊंची थी वे बहाव के पानी से बचे रहे । जब जाटव और बाल्मीकि और जाटव जाटों-ब्राह्मणों के कुएं पर पानी मांगने गए थे, मेरे हाथ में बाल्टी थी और मेरी बहन के हाथ में गागर परन्तु जाटों और ब्राह्मणों ने किसी को भी एक बूंद भर भी पानी नहीं दिया था । तब मजबूरन हम सब ने अपने कुएं में भरा गंदा पानी छान-छान कर पीया और पीने के बाद हर घर में हर सदस्य बीमार पड़ा कई बच्चों की मौतें हुईं, मेरा मुंह गला सूज गया था, मेरी बहन बीमार हुई और बहनोई गंगाबासी के गले में तो ऐसा इंफेक्शन हुआ कि मेरी आंखों के सामने दिल्ली के इर्विन अस्पताल में उनकी मौत हुई । ऐसे में सामाजिक सहयोग, समानता और सदभाव लाए बगैर मेरे जैसों के लिए स्वतंत्रता के क्या मायने हो सकते हैं आप ही बताएं।  

मैं जानता हूं आज के दिन हम अंग्रेजी राज को मुंह भर कर गालियां देते हैं । खूब कोसते हैं । परन्तु अंग्रेजी राज में मिशनरियों ने जिन अछूतों से छुआछूत किए बगैर मुफ्त में अंग्रेजी तालीम दी, अंग्रेजों ने भूमिहीनों को जमीन दी, स्वतंत्रता मिलने के बाद जाति दबंगई बढ़ी और जीमनें छीन ली गई । हजारों दलित परिवार गांव से भागने को मजबूर कर दिए गए। 

मैं उत्तर प्रदेश के गांव में पैदा हुआ । मेरे गांव में अंग्रेजों के जमाने का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र था, आज नहीं है । दो सरकारी स्कूल थे और उनमें सब जातियों के बच्चों को मुफ्त और एक समान शिक्षा दी जाती थी । आज सरकारी स्कूल मरणाशन्न अवस्था में हैं और प्राइवेट दुकानों पर तालीम तराजू में बिक रही है । मेरे भाई बंधु गांव में छोड़ कर रोजगार की तलाश में शहरों की ओर भाग रहे हैं । जहां सिलम्स में झुग्गी झोपड़ियों में फुटपाथों पर जानवरों की तरह पड़े हैं, न बच्चों को शिक्षा है न कोई रोजगार है । तो कह सकता हूं कि स्वतंत्रता मिली तो खूब पर हमारी मां-बहनों के सिर से मानव मल का टोकरा नहीं उतरा, सीवर में उतर कर मौत की गोद में जाने की मजबूरी समाप्त नहीं हुई । 
डॉ. श्यौराज सिंह बेचैन, प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली ।  
  


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