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नोटबंदी का लक्ष्य आर्थिक कम राजनीतिक अधिक

नोटबंदी की पहली सालगिरह पर अधिकतर विपक्षी दलों ने सत्ताधारी पार्टी भाजपा के इस कदम को तुगलकी फरमान के रूप में याद किया है। दूसरी ओर भाजपा ने नोटबंदी और जीएसटी के फैसले को मोदी सरकार का सराहनीय कदम बताया है। नोटबंदी के परिणाम स्वरूप सितम्बर 2017 के अंत तक चलन में बडे नोटों का मूल्य 12 लाख करोड़ रुपये है यदि नोटबंदी नहीं होती तो यह राशि 18 लाख करोड़ होती। इसका अर्थ यह है कि 6 लाख करोड़ मूल्य की मुद्रा चलन से बाहर होने के कारण मुद्रा स्फीति पर अंकुश तो लग गया परन्तु निवेश में कमी के कारण आर्थिक प्रोन्नति, रोजगार उत्सर्जन, और घरेलू मांग में कमी से अर्थव्यवस्था में मंदी के लक्षण दिखने लगे हैं।

देश के 33 गैर सरकारी संगठनों द्वारा किये गए सर्वेक्षण में दावा किया गया है कि 55 प्रतिशत लोगों का मानना है कि नोट बंदी से काले धन का सफाया नहीं हुआ और 48 प्रतिशत लोगों की राय है कि आतंकवादी हमलों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। सामाजिक संगठन अनहद के नेतृत्व में देश के 21 राज्यों में 3647 लोगों के सर्वेक्षण के दौरान नोटबंदी से जुड़े 96 प्रश्न पूछे गए थे।

केन्द्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने कहा कि ‘पिछले वर्ष 500 और एक हजार रुपये के उस समय प्रचलन में जारी नोटों को बंद करने के केन्द्र सरकार के निर्णय को उसने भ्रष्टाचार निरोधक अभियान में शामिल किया है जिससे कई भ्रष्ट अधिकारियों और व्यक्तियों को गिरफ्तार करने के साथ ही भारी मात्रा में अवैध राशि जब्त की गयी है’।

मोदी जी का काला धन विरोधी अभियान 2014 के लोक सभा चुनाव की रैलियों में दिखाई दिया। उस समय उन्होंने अपने भाषणों के माध्यम से विदेशी काले धन पर बड़ा हमला किया। जनता को बताया कि भाजपा की सरकार बनने पर गरीबों के अच्छे दिन आएंगे, सबके खाते में 15-15 लाख रूपये जमा हो जायेंगे। दिन बीतते गए लोग उनसे पूंछने लगे मोदी जी हमने तो आपकी सरकार बना कर अपना वायदा पूरा कर दिया परन्तु अभी 15 लाख रूपये हमारे खाते में कब आएंगे?

  उपरोक्त प्रश्न का प्रधानमंत्री जी के पास कोई जवाब आज तक नहीं है। इसलिए जनता का ध्यान भटकाने के लिए 8 नवम्बर 2016 को रात के बारह बजे नोटबंदी का फरमान जारी करके 500 और 1000 के नोटों को चलन से बाहर कर दिया। यदि प्रधानमंत्री जी चाहते तो उक्त फरमान भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर से भी करवा सकते थे, परन्तु उन्होंने इस बड़े आर्थिक फैसले का श्रेय खुद लेने के लिए ऐसा नहीं किया। उन्हें उम्मीद थी कि काला धन बाहर आये या न आये लेकिन देश के सबसे बड़े सूबे में होने वाले विधान सभा चुनाव में राजनीतिक फायदा अवश्य ले सकते हैं।

यह सर्व विदित है कि चुनावों में काले धन के रूप में नकदी का दुरुपयोग होता है। उक्त चुनावी नकदी अनैतिक तरीकों से जुटाई जाती है। चुनाव के समय राजनीतिक दलों से टिकिट लेने के लिए प्रत्याशी अपनी बेनामी परिसम्पत्तियों को बेच कर नकदी जुटाते हैं। राजनीतिक दल प्रत्याशियों से मिलने वाले पैसे को अपने कार्यकर्ताओं के नाम से छोटे चंदे के रूप में अपनी पार्टी के खाते में जमा कर देते हैं। पार्टी का टिकिट दिलाने का माध्यम बनने वाले पार्टी पदाधिकारी भी अपने लिए कुछ नकदी चाहते हैं। इसी समय कुछ पूंजीपति भी अपनी प्रिय पार्टी की सरकार बनने पर अपने कारोबार को बढ़ाने के आश्वासन के बदले गुप्त चंदे के रूप में धन देते हैं। अवैध कारोबार करने वाले कारोबारी भी अपने धंधे की सुरक्षा की गारंटी के लालच के बदले में काला धन राजनेताओं को उपलब्ध कराते हैं।
         
पूरे देश को काले धन विरोधी अभियान ने प्रभावित किया गया है। आम नागरिकों के रूप में, हम सभी को नकदी की परेशानियों का सामना करना पड़ा और एटीएम के लिए लंबी कतार में इंतजार करना पड़ा, इसके बावजूद, यह कदम बड़े पैमाने पर सरकार द्वारा समर्थित था।

एक दशक पहले तक भारतीय चुनावों में बूथ कैप्चरिंग सबसे बड़ी समस्या थी। समय और चुनाव आयोग बूथ कैप्चरिंग के प्रयासों के साथ लगभग समाप्त हो गया था, लेकिन चुनावी धन अभी भी हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए एक गंभीर खतरा बना हुआ है।

आज के समय में चुनाव लड़ना एक महँगा सौदा है। चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित व्यय सीमाएं कारगर साबित नहीं हुई हैं। कुछ दलों को छोड़कर अधिकतर राजनीतिक दल समृद्ध व्यावसायिक वर्ग से गुमनाम दान लेते हैं और वे ज्यादा टैक्स भुगतान में छूट पा लेते हैं। राजनीति में काले धन को कम करने के लिए 2017-18 की बजटीय घोषणापत्रों के द्वारा वित्तमंत्री जी ने पार्टियों को मिलने वाले बीस हजार तक के गुमनामी चंदे की राशि को कम करके दो हजार रुपए तक कर दिया है। द्रविड़ियन राजनीतिक पार्टियां धन शक्ति पर चुनाव जीतने के लिए मशहूर हैं। उत्तर प्रदेश की प्रमुख पार्टियां भी टिकट बेचकर चुनावों के लिए काले धन का इस्तेमाल करने के लिए चर्चित रही हैं। नोटबंदी के कारण यूपी चुनावों में स्पष्ट रूप से कुछ पार्टियों के पास चुनवी खर्च करने के लिए पैसे कम पड़ गये थे।

सरकारी योजना के मुताबिक काले धन पर निर्भर राजनीतिक दलों के पास जब नकदी की कमी हो गयी तो काले धन के संरक्षक नेता सत्त्ता से दूर हो गए। इस तरह नोटबंदी चुनाव सुधारों की दिशा में एक आवश्यक कदम हो सकता है। अगर राजनीति में भ्रष्ट लोगों से काले धन के रूप में चंदे की आवश्यकता नहीं रहेगी तो ईमानदार राजनेता भ्रष्ट व्यवसायियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने में संकोच नहीं करेंगे। संविधान और बेहतर शासन के द्वारा ही हम अर्थव्यवस्था को अधिक समृद्ध कर सकते हैं।

एक नए अध्ययन के अनुसार भारत की ‘काली अर्थव्यवस्था’ का मूल्य लगभग 30 लाख करोड़ रुपए से अधिक अथवा कुल सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 20 प्रतिशत है। सभी को मालूम है नोटबंदी से पहले प्रॉपर्टी कारोबार में कालेधन के प्रयोग के कारण नोएडा जैसे शहर में आशियानों के दाम 14 फीसदी बढ़ कर आम आदमी की पहुँच से बहार हो गए थे। अध्ययन में कहा गया था कि काले धन पर हो रही कार्रवाई के अनपेक्षित परिणाम देखने को मिल रहे हैं। जैसे कि उस समय काले धन को नकदी के रूप में वरीयता दी जाने लगी थी और बैंकों में इसे कम से कम जमा किया जा रहा था। उक्त अध्ययन के अनुसार भारत की ‘काली अर्थव्यवस्था’ का आकार 1970 और 1980 के दशक में तेजी से फैला लेकिन इसके बाद से ही धीरे-धीरे सिकुड़ रहा है। अब यह देश के सकल घरेलू उत्पाद का 20 प्रतिशत के आसपास है। आमतौर पर ‘काली अर्थव्यवस्था’ से तात्पर्य उन वित्तीय गतिविधियों से लिया जाता है जो औपचारिक बैंकिंग तंत्र के बाहर होती हैं। इनमें स्वर्ण तथा रियल एस्टेट जैसी उच्च मूल्यों वाली सम्पदा में नकदी लेन-देन शामिल होते हैं।

रियल एस्टेट कारोबार पर नोटबंदी की मार सबसे अधिक पड़ी है। इस बुरे दौर में रियल सेक्टर की बारधी दर 60 प्रतिशत तक घट चुकी है। इसकी सबसे बड़ी वजह नकदी का चलन खत्म हो जाना।

नोटबंदी के अतिरिक्त रेरा कानून एवं जी.एस.टी. भी प्रॉपर्टी कारोबार को प्रभावित करने वाले कारण रहे हैं। अब यह सेक्टर अर्थव्यवस्था में मांग एवं रोजगार में सुधार होने के बाद ही रफ्तार पकड़ सकेगा।

नोटबंदी ने रियल एस्टेट सेक्टर में बड़ा बदलाव होने से सिस्टम में 80 प्रतिशत तक पारदर्शिता बढ़ गई है। नोटबंदी से इस सैक्टर में मुख्यत: 3 फायदे हुए हैं जिन्हें हम एक बड़े बदलाव के तौर पर देख सकते हैं। ये 3 बदलाव हैं- सिस्टम में पारदर्शिता का बढऩा, कैश वाले लेन-देन का करीब-करीब खत्म होना और डिवैल्पर्स व कारोबारियों के काम करने के तरीके बदलना। निश्चित ही इन बदलावों से इस सैक्टर को एक पॉजीटिव संकेत देखने को मिल सकता है।

दुष्परिणाम
सरकारी आंकड़े बता रहे हैं कि भारतीय अर्थ-व्यवस्था में भयंकर गिरावट आ गई है। सकल घरेलू उत्पाद की बृद्धिदर 2017 की अंतिम तिमाही में 8 प्रतिशत से घटकर 5.7 प्रतिशत रह गयी है। कहने को यह सिर्फ दो प्रतिशत की गिरावट है लेकिन इस दो प्रतिशत का मतलब होता है, लाखों करोड़ रूपये की कमी। इसके कारण लाखों लोग बेरोजगार हो गए हैं, कल-कारखाने ठप्प हो गए हैं, किसानों की दुर्दशा बढ़ गई है। पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहनसिंह ने इसकी भविष्यवाणी पहले ही कर दी थी।

नए नोटों को छापने में 30 हजार करोड़ रु. बर्बाद हुए। 2 हजार के नोटों ने काले धन का भ्रष्टाचार बढ़ा दिया। कितना काला धन अब तक पकड़ा गया, ठीक-ठीक पता नहीं। नेताओं, अफसरों और सेठों ने काले को सफेद करने के लिए क्या-क्या तिकड़में कर डालीं, इस पर एक श्वेत पत्र अभी तक आ जाना चाहिए था, नहीं आया। जिनके परिजन बैंकों की लाइन में लगे-लगे परलोक पहुंच गए उनका क्या कसूर था, उसकी भरपाई क्या हो सकती है? पुणें के समाजसेवी, अनिल बोकील की नोटबंदी की इस योजना को अपना बनाकर अधकचरे ढंग से लागू किया जिसके दुष्परिणाम सामने आये, जबकि इसे योजनाबद्ध तरीके से क्रियान्वित किया जाता तो अर्थव्यवस्था को चोट नहीं लगती।

नोटबंदी से केवल ६% कालेधन पर प्रहार हुआ था परन्तु अभी भी ६० फीसदी ब्लैकमनी बेनामी संपत्ति के रूप में विद्द्मान है। अब आम नागरिकों सहित विपक्ष की नजर इस बात पर बनी है कि नोटबंदी का एक वर्ष पूरा होने पर, पीएम मोदी क्या नया फैसला लेने जा रहे हैं? लोगों का मानना है कि 10 नवंबर की केन्द्रीय मंत्रियों की बैठक के बाद पीएम मोदी भ्रष्टाचार और बेनामी संपत्ति के खिलाफ अगले कदम से जुडी योजना पर कोई बडा ऐलान कर सकते हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार नोटबंदी के बाद अब बेनामी संपत्ति के खिलाफ बडे पैमाने पर पूरे देश में अभियान चलाया जाएगा। 2019 के लोक सभा  चुनाव में 60% करप्शन के खिलाफ जंग को जारी रखने का मजबूत संकेत देना चाहती है। ज्ञातव्य है कि पीएम मोदी ने नोटबंदी के बाद अपना अगला टारगेट बेनामी संपत्ति को ही बनाया है। माना जा रहा है कि आगे के प्लान के तहत अगर किसी जमीन के मालिकाना हक के कानूनी सबूत नहीं मिले तो बेनामी संपत्तियों को सरकार अपने कब्जे में ले सकती है।

नोटबंदी का एक वर्ष पूरा होने पर विपक्ष ने सरकार को घेरने की रणनीति बनाई है। विपक्ष नोटबंदी की सालगिरह को काला दिवस के रूप में मनाएगी। ज्ञातव्य है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी अपनी रैलियों में नोटबंदी को लेकर पीएम मोदी और सरकार पर निशाना साधते रहते हैं। वहीं सरकार ने सारी आलोचनाओं को दरिकनार करते हुए पीएम मोदी की अगुआई में 8 नवंबर को ऐंटी ब्लैक मनी डे मनाने का फैसला लिया है।

अंत में
याद रहे 'पनामा लीक', 'पैराडाइज लीक'  और 'विकिलिक' के माध्यम से जिन भारतीयों के नाम विदेशी बैंकों में कालाधन जमा करने के मामले में उल्ल्खित किये गए हैं उनके नाम सरकार घोषित नहीं करना चाहती। जिन 700 के करीब पूंजीपतियों के नाम जिन्होंने बैंकों का 9 लाख करोड़ रुपया कर्ज का अदा नहीं किया है उनका नाम भी सरकार जनता को उनकी बदनामी के कारण बताना नहीं चाहती। मंदिरों में जमा 50 लाख करोड़ का काला धन (सोना) भी सरकार उजागर नहीं करना चाहती। 28 लाख करोड़ का विदेशी धन भी सरकार देश में वापस नहीं लाना चाहती। सरकारी खर्चे पर चुनाव कराके काले धन का राजनीतिक दुरुपयोग भी सरकार नहीं रोकना चाहती। आरटीआई के दायरे में राजनीतिक पार्टियों को शामिल कराने में भी सरकार की कोई दिलचस्पी नहीं दिखती। लोकपाल का मुद्दा न अन्ना हजारे उठा रहे हैं और सरकार ने उसे ठन्डे बस्ते में डाल दिया है। आज समय आ गया है कि तथाकथित सिविल सोसाइटी को इन बिन्दुओं पर अपनी आवाज उठानी चाहिए। राजनीतिक पार्टियों से इस सम्बन्ध में उम्मीद छोड़ देनी चाहिए। सत्ता में आने के बाद सभी पार्टियां अपने राजनीतिक वायदे भूल जाती हैं।

बेरोजगारी विस्फोटक बिन्दु पर पहुँच चुकी है हमारे देश में युवाओं को रोजगार नहीं मिला तो उनका असंतोष अर्थव्यवस्था को चौपट कर सकता है। इसलिए तमाम रिपोर्टों का अध्ययन करने के बाद गरीब और अमीर के बीच बढ़ती खाई को पाटना सरकार की योजनाओं की प्राथमिकता होनी चाहिए। राजनीतिक बदले की भावना से किसी वर्ग विशेष या प्रतिद्वंदी पार्टी के लोगों को प्रताड़ित करना भारतीय संविधान और लोकतंत्र का गाला घोंटने के सामान होता है। जनाक्रोश हमेशा महंगा पड़ता है।
 


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