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दलित की बारात शांति व्यवस्था के लिए खतरा- उत्तरप्रदेश पुलिस

कासगंज- उत्तर प्रदेश के कासगंज के सवर्ण बाहुल्य गांव में एक दलित युवक अपनी बारात चढ़ाने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है। जातिवाद का दंभ इस कदर है कि पुलिस ने भी बारात निकालने की परमीशन देने से इंकार कर दिया है। स्थानीय पुलिस का कहना है कि दूल्हा दलित है और उसके बारात निकाले जाने से इलाके में हिंसा हो सकती है, हैरानी की बात यह है कि जिस गांव में बारात जानी है, वहां आज तक दलितों की बारात नहीं निकाली गई।

संजय कुमार जाटव हाथरस के हसायां ब्लॉक में रहते हैं। वह ब्लॉक पंचायत सदस्य भी हैं। उनकी सगाई इसी साल फरवरी में कासगंज के निजामपुर की रहने वाली शीतल कुमारी से हुई थी। अब शादी 20 अप्रैल को होनी है। जिस इलाके में युवती का घर है, उस इलाके में 40 दलितों के घर हैं जबकि 300 उच्च जाति के हैं। 

संजय के मुताबिक, शीतल ने उन्हें बताया कि उनके गांव में किसी भी दलित की बारात नहीं निकलती। शीतल से यह बात पता चलने के बाद संजय ने स्थानीय पुलिस से संपर्क कर बारात निकालने की अनुमति मांगी, लेकिन पुलिस ने अनुमति देने से मना कर दिया। पुलिस ने कहा कि वह इलाका उच्च जाति के लोगों का है, उनके बारात निकाले जाने से वहां हिंसा हो सकती है। 

उन्होंने मुख्यमंत्री के पोर्टल में शिकायत दर्ज कराई, वहां से स्थानीय पुलिस को मामला भेजा गया। स्थानीय पुलिस ने एक एसआई को जांच के लिए भेजा। जांच में एसआई ने कहा कि निजामपुर गांव में दलित की बारात निकालने के लिए अनुमति नहीं दी जा सकती है। अगर ऐसा हुआ तो वहां हिंसा हो सकती है। उसके बाद डीएम और एसपी ने भी इस बात को स्वीकार किया। 

पुलिस की रिपोर्ट में लिखा है कि निजामपुर गांव में कभी किसी दलित की शादी का समारोह नहीं होता है। अगर इस पुरानी परंपरा को तोड़ने का प्रयास किया गया तो इलाके की शांति-व्यवस्था भंग हो सकती है। 

संजय ने कहा कि उनके ससुरालवालों ने उन्हें बताया कि एक दशक पहले एक दलित परिवार ने गांव में बारात निकालने का प्रयास किया था, जिसके बाद उच्च जाति के लोगों ने उन्हें प्रताड़ित और अपमानित किया। अब संजय अपनी शादी में बारात निकालने की अनुमति के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं। संजय ने बताया कि जब उन्हें यह बात पता चली कि निजामपुर गांव में किसी भी दलित की बारात नहीं निकलती तो वह आश्चर्यचकित हो गए। 

आप एक भांड की तरह खुद के सभ्य और आधुनिक होने का चाहे कितना भी ढोल पीट लें लेकिन जिस समाज की महान परंपरा सिर्फ दलित युवक के घोड़ी पर बैठने भर से भंग होती हो ऐसे समाज का नष्ट होना तय है। जब पुलिस प्रशासन भी ऐसी गुंडागर्दी को परंपरा का नाम देने लगे तो मामला बहुत गंभीर हो जाता है, जब आप एक अदने से गांव में शांति व्यवस्था नहीं बनाकर रख सकते तो आप काहे की पुलिस हो भाई....

मुख्य संवाददाता
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1 Comments

  •  
    munish kumar gautam
    2018-03-04

    जिला कासगंज के छोटे से गांव में दबंग लोग भारतीय कानून की धज्जिया उढ़ाते हुए , एक समुदाय की बारात नही चढ़ने देते। और पुलिस इस अत्याचार को पुरानी परंपरा मान रही है। ये पुलिस के लिए डूब मारने के सामान है। यदि पुलिस उस छोटे गांव में कानून व्यवस्था लागू नही करा सकती तो उससे अत्याचार रोकने की क्या उम्मीद की जा सकती। जिले के सभी पुलिस अफसरों को तुरंत सस्पेंड कर देना चाहिए। पुलिस विभाग से जुड़े शोषित समाज के अन्य पुलिस अधिकारियो को इस मामले में हस्तछेप करना चाहिए। इस घटना ने भातीय संविधान और लोकतंत्र की धज्जिया उढ़ा दी है।

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