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उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव 2017 : बसपा के बढ़ते कदम

पहले यू. पी. में निकाय चुनावों को आगे खिसकाया...क्योंकि यू. पी. के निकाय चूनावों में भाजपा की जीत लगभग तय ही थी। स. पा. के शासन काल में भी मेयर की 12 सीटों में से 10 सीटों पर काबिज थी। भाजपा यू. पी. के निकाय चूनावों को गुजरात के विधानसभा चूनावों के पास खींच कर ले गई।  

अब जबकि उत्तर प्रदेश के निकाय चुनावों में भाजपा पहले नंबर की पार्टी बनकर उभरी है तो भाजपा ने उत्तर प्रदेश के मुकाबले गुजरात में उत्तर प्रदेश की जीत का जीतोड़ जश्न मनाकर गुजरात के चुनावों को अपने हक में करने का उपक्रम किया है.... वोट पड़ने तक यह जश्न मनाया जाता रहेगा।    

गौरतलब है कि इस बार गुजरात के चुनावों में पाटीदारों, दलितों और अल्पसंख्यकों के भाजपा विरोधी आन्दोलनों के चलते भाजपा काफी कमजोर बताई जा रही थी। और कांग्रेस के जीतने की सौ प्रतिशत बात की जा रही थी। उत्तर प्रदेश के निकाय चुनावों के परिणाम इस धारणा को कुप्रभावित नहीं करेगा, ऐसा तो नहीं कहा जा सकता। कांग्रेस के गढ़ अमेठी में कांग्रेस का खाता तक न खुलना, भाजपा के चुनाव प्रचार को जैसे सबसे बड़ा हथियार मिल गया है।  

इतना ही नहीं, गुजरात के चुनावों के मद्देनजर हिमाचल प्रदेश चुनाव के परिणाम भी एक माह के लिए टालकर गुजरात चनाव के परिणाम के साथ 18 दिसंबर 2017 को घोषित करने योजना इसीलिए बनाई गई क्योंकि हिमाचल प्रदेश के परिणामों पर भाजपा जीत और हार के संशय में पड़ी थी। अब यदि भाजपा हिमाचल प्रदेश में हार भी जाती है तो उसके परिणामों का गुजरात के चनावों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला। ऐसे में चुनाव आयोग को एक स्वतन्त्र इकाई मानने का उपक्रम कैसे किया जा सकता है..... यह भी कि भाजपा की चुनावी परियोजना को मानना पड़ेगा।

उत्तर प्रदेश के निकाय चुनावों में बहुजन समाज पार्टी ने दूसरा स्थान प्राप्त करके उज्ज्वल भविष्य के प्रति आशा का दीप जरूर ही प्रज्वलित किया है, वह भी बिना किसी खास प्रचार के। इसके उलट भाजपा के मुख्यमंत्री सहित उसके तमाम मंत्री और संतरी सब के सब चुनावी जंग में जुटे थे। अब जरूरत ये है कि बसपा भविष्य की चुनौतियों को ध्यान में रखकर समाज और पार्टी की उम्मीदों को पूरा करने के लिए जी जान से काम करे।


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