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अपने समाज को क्या दे रहे हैं संपन्न हो चुके दलित- मोहनदास नैमिशराय

दिल्ली के ज़ाकिर हुसैन कॉलेज में 11 व 12 अक्टूबर को दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सहयोग से आयोजित इस संगोष्ठी का विषय था ‘भारतीय दलित साहित्य और स्त्री चिंतन’। कार्यक्रम का उद्घाट्न डॉ प्रेम सिंह ने किया। मंच का संचालन डॉ नीलम कुमारी ने किया।

संगोष्ठी चार सत्रों में आयोजित की गई, पहले सत्र का विषय था भारतीय समाज का बदलता स्वरूप, स्त्री चिंतन और दलित साहित्य।  इस मौके पर डॉ प्रेम सिंह ने कहा कि वर्तमान दौर में साहित्य में स्त्री चेतना कई स्तरों पर आवश्यक है, दलित साहित्य अलगाव का साहित्य नहीं बल्कि समाज के फलक पर अपने सर्जन की उपयोगिता के साथ उभरा साहित्य है, उन्होंने स्त्री चेतना के नायक डॉक्टर भीमराव अंबेडकर और डॉक्टर लोहिया के विचारों पर भी प्रकाश डाला। बीज भाषण पढ़ते हुए सुशीला टाकभौरे ने भारतीय साहित्य और स्त्री चेतना के विभिन्न आयामों पर बोलते हुए कहा कि वर्तमान कानून, मीडिया, साहित्य और आंदोलनों के फलक पर स्त्री चेतना की कमान अनिवार्य हो गई है।
  
दूसरे सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ जयप्रकाश कर्दम ने की, उन्होंने कहा कि स्त्री चेतना के बिना कोई भी साहित्य पूरा नहीं हो सकता। वरिष्ठ साहित्यकार एवं स्त्रीवादी लेखिका रजनी तिलक ने भारतीय समाज के बदलते स्वरूप, स्त्री चिंतन और दलित साहित्य पर पेपर पढ़ा। उन्होंने बुद्ध काल से स्वतंत्रता पूर्व महिलाओं के संघर्ष, स्त्री मुक्ति आंदोलन के इतिहास और संघर्ष पर बोलते हुए कहा कि दलित स्त्री चेतना एक नया संघर्ष खड़ा करना चाहती है। जहां तमाम उपजातियों की पीड़ा, उत्पीड़न और उनके संघर्षों को नया आयाम मिले। डॉ. रजत रानी मीनू ने कहां कि दलित महिलाओं का दोहरा शोषण हो रहा है। केरल से आए राधा मणि ने पेपर पढ़ा और कहा कि दलितों में महिलाओं को अभी सम्मान नहीं मिला है।

दूसरे सत्र के दौरान ‘भारतीय दलित साहित्य की आत्मकथाएं और स्त्री चिंतन’ में डॉ सोमा कुमार ने तीन आत्मकथाओँ पर चर्चा की  ‘मेरा बचपन मेरे कंधों पर ’  उचक्का और जूठन, उन्होंने बताया कि तीनों में ही किस तरह दलितों को शिक्षा से दूर करने के षड़यंत्र रचे जाते हैं। श्यौराज सिंह बेचैन की ‘मेरा बचपन मेरे कंधों पर ’ में लेखक को शिक्षा के लिए बचपन में किन कठिन संघर्षों से गुजरना पड़ता है। ‘उचक्का’ में बच्चों के स्कूल जाने के बाद बीमार होने को अंधविश्वास से जोड़ दिया जाता है, और जानबूझकर ये फैलाया जाता है कि बच्चे स्कूल जाने के कारण बीमार हुए हैं। लेकिन शिक्षक समझाते हैं कि ऐसा स्कूल जाने के कारण नहीं हुआ है, उसके बाद अंधविश्वास में फंसे लोग फिर से बच्चों को स्कूल भेजने पर राजी होते हैं। इसी तरह जूठन में प्रिंसिपल ओमप्रकाश वाल्मिकी जी से पूरा स्कूल साफ करवाता है। इन सब कहानियों में शिक्षा के प्रति एक ललक दिखती है।
 
डॉ सुशील कुमार ने कहा कि दलित साहित्य में दलित साहित्यकारों की छटपटाहट दिखती है। जब रचनाकार अपने भोगे हुए को लिखता है तो उसकी प्रमाणिकता बढ़ती है। इस बात पर भी विवाद रहा है कि इन्हें आत्मकथाएं नहीं आत्मतथ्य कहना चाहिए। उन्होंने कहा कि महिलाओं को लिखने और अपनी आवाज़ उठाने की प्रेरणा दलित साहित्य से ही मिली है।  

जामिया मिलिया इस्लामिया की प्रोफेसर हेमलता माहेश्वर ने कहा कि यहां यह समझना बेहद जरूरी है कि गैर दलित स्त्री, दलित स्त्री के साथ कैसा व्यवहार करती है। स्त्रीवाद दलित स्त्री के लिए सवाल खड़े नहीं कर पा रहा है। उन्होंने कहा कि बाबा साहब की 22 प्रतिज्ञाएं दलित साहित्य का पैमाना होनी चाहिएं। अगर आप ईश्वर, भाग्य, आत्मा और पुनर्जन्म के किसी एक कोने में भी कदम रखते हैं तो आप दलदल में धंसते चले जाएंगे। और बाबा साहब हमें इन्हीं में से निकालने की बात करते हैं।
  
मोहनदास नैमिशराय जी ने बहुत सी आत्मकथाओं का वर्णन किया और कहा कि अगर दलित आत्मकथाएं नहीं आतीं तो ब्राह्मण समाज विचलित नहीं होता। दलित आत्मकथाओँ ने दलित साहित्य को सशक्त किया है। दरअसल दलित आत्मकथाओं में पूरा इतिहास और राजनीति आती है, पीड़ा आती है, भोगा हुआ आता है,  और ये सब जानबूझकर नहीं लाया गया है, वो सब यथार्थ पर आधारित है।

आत्मकथाओं के महत्व को बताते हुए उन्होंने कहा कि महिलाएं जो आत्मकथाएं लिख रही हैं, उनमें पुरूष वर्चस्व के खिलाफ तो स्वर उभर रहे हैं, लेकिन ब्राह्मणवाद के खिलाफ स्वर नहीं उभर रहे हैं। जिस कारण उनके लेखन में एकपक्षीयता दिखती है, जिसे सही नहीं ठहराया जा सकता। महिला हो या पुरुष, लेखकों और बुद्धिजीवियों को पूर्वाग्रह से ग्रसित नहीं होना चाहिए। वरना उनके लेखन मे नकारत्मकता दिखने लगती है जो समाज के लिए ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि दलित साहित्य भूकंप की तरह सामने आया था लेकिन अब उसमें परिवर्तन होता दिख रहा, अब जो दलित साहित्य लिखा जा रहा है उसमें वो धार नहीं दिखती है, इस पर हम सबको विचार करना चाहिए।

उन्होंने एक बड़ा सवाल खड़ा करते हुए कहा कि स्थापित हो चुके साहित्यकार, प्रोफेसर, आईएएस, इंजीनियर, कलेक्टर, कमिश्नर, अधिकारी या बिल्डर और संपन्न हो चुके दलित अपने समाज के लिए क्या कर रहे हैं, वे समाज को वापस क्या दे रहे हैं। सिर्फ अपनी आत्कथाओं का वर्णन करके और वाहवाही लूटने और पुरस्कार पाने से जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती है। अपने साहित्य को दूर दराज के गांवों और आम लोगों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी आपकी ही बनती है ताकि लोग उसका फायदा उठा सकें। बेशक आप लाख परेशानियां झेलकर यहां तक पहुंचे हैं और स्थापित हुए, तो आपके ऊपर भी ये सवाल खड़ा होता है कि अच्छी पोजीशन में आ जाने के बाद अब आप खुद समाज के लिए कितना चिंतित हैं।

तीसरे सत्र में ‘भारतीय मीडिया और सिनेमा में स्त्री-चिंतन’ पर मोतीलाल नेहरू कॉलेज के डॉ अश्वनी कुमार ने मीडिया की महता बताते हुए कहा कि भारत में आज पत्रकारिता भावावेश में की जा रही है, जबकि उसे वस्तुस्थिति पर आधारित होना चाहिए। पत्रकारिता पर हिंदुवादी मानसिकता हावी है, और इसी के आधार पर काम किया जा रहा है। किसी आंदोलन की रुपरेखा पर काम नहीं किया जा रहा है। साथ ही उन्होंने जोड़ा कि आज दलित साहित्य के बिना कुछ भी आगे नहीं बढ़ सकता है।

डॉ सुधा सिंह ने बताया कि किस तरह से भारतीय सिनेमा में हिंदुवाद को परोसा जाता रहा है, उन्होंने फिल्म पूरब-पश्चिम का उदाहरण दिया जिसमें पश्चिम की संस्कृति को हेय दिखाया गया और भारतीय संस्कृति या कहें हिंदुत्ववादी संस्कृति को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया। इसके अलावा स्त्री चित्रण में भी दो महिलाओं के जरिए पूरी संस्कृति को माप दिया गया। इसके अलावा बॉबी और जूली जैसी फिल्मों में हिंदू परिवारों को नैतिक और ईसाई परिवारो को अनैतिक दिखाया गया है ये किसी से छिपा नहीं है। बॉलीवुड में शुरू से ही जातिवादी मानसिकता हावी रही है।  

सत्र की अध्यक्षता कर रहे डॉ श्यौराज सिंह बेचैन ने प्रकाश डाला कि सिनेमा में दलित स्त्रियों की भूमिका को कैसे दिखाया जाता है। उन्हें कभी नायिका के तौर पर नहीं दिखाया जाता। उन्हें निरीह, शोषित या भोग की वस्तु के रुप में ही प्रदर्शित किया जाता है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि मीडिया जाति सापेक्ष होकर चलता है नाकि जाति निरपेक्ष होकर। ये बहुत चिंताजनक बात है कि आज 2017 में भी मीडिया में दलितों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं दिखता है। उन्होंने कहा कि मीडिया में दलित स्त्री को सिर्फ रेप और उत्पीड़न की ख़बरों तक ही सीमित रखा जाता है। उपलब्धि के तौर पर वह गायब दिखती है। मीडिया मायावती के भ्रष्टाचार को बढ़ा चढ़ाकर दिखाता है जबकि साउथ की अम्मा के सौ गुना ज्यादा भ्रष्टाचार को गैर जरूरी समझता है। इसलिए जब तक ईमानदार प्रयास नहीं होंगे तब तक समान-संस्कृति खतरे में रहेगी।  

चौथे सत्र में ‘जाति, धर्म, लिंग, डॉ अंबेडकर का चिंतन और स्त्री चिंतन’ विषय पर बोलते हुए मोतीलाल नेहरू कॉलेज के डॉ राजेश कुमार ने कहा कि सवर्ण महिलाओं को सकारात्मक दिखाया जाता है और दलित महिलाओं को नकारात्मक दिखाया जाता है। सवर्ण महिलाओं को घर में वर्चस्व वाला दिखाया जाता है, और दलित महिलाओं को सेक्स सिंबल तक ही सीमित रखा जाता है। मानसिक बदलाव की बहुत आवश्यकता है जो आधुनिक और मेच्योर हो चुके सिनेमा में भी नहीं दिखता।
  
डॉ अनु मेहरा ने कहा कि भारतीय समाज में हर तबके की महिला का उत्पीड़न होता रहा है, सवर्ण महिलाओं का भी उत्पीड़न होता है लेकिन दलित महिलाओं का ज्यादा होता है। बाबा साहब ने संविधान बनाते समय महिला अधिकारों का ध्यान रखा, और इसीलिए उन्होंने सिर्फ दलित महिलाओं के लिए ही नहीं बल्कि हर तबके, हर जाति-धर्म की महिलाओं की बात की।
  
जेएनयू के डॉ राजेश पासवान ने कहा कि जितना हमारा समाज आज संपन्न है, अगर बाबा साहब के समय इसका 10 प्रतिशत भी रहा होता तो आज देश की दशा-दिशा कुछ और होती। लेकिन बाबा साहब ने उस समय भी अकेले अपने बौद्धिक बल पर खुद को साबित किया। अगर हम बाबा साहब के आदर्शों और सूत्रों को लेकर चलें तो हम एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकते हैं।
  
जेएनयू के प्रो. विवेक कुमार ने अध्यक्ष भाषण पढ़ते हुए कहा कि जो तथाकथित ऊपर के समाज हैं उनके पास सांस्कृतिक पूंजी है और उसका संचयन है, और जो नीचे के लोग हैं उन्हें संस्कृति की वंचना झेलनी पड़ती है। तो कुछ लोगों की चेतना का सृजन वंचना के आधार पर हुआ है, और कुछ लोगों की चेतना का सृजन सांस्कृतिक पूंजी संचयन के आधार पर हुआ है। और उसी संचयन के आधार पर वो साहित्य का उत्पादन कर रहे हैं, और हम लोग जो साहित्य सृजन कर रहे हैं उसमें सांस्कृतिक पूंजी का अभाव है, वो सांस्कृतिक वंचना के आधार पर लिखा जा है। जिसे दलित साहित्य कहा जाता है। और इसीलिए सामाजिक संरचना व साहित्य में जाति साफ-साफ दिखाई देती है। मुख्यधारा के साहित्य में हमेशा गुरू का महिमामंडन किया जाता रहा लेकिन जब जूठन, मुर्दइया और मेरा बचपन मेरे कंधों पर, के गुरूओं का जो रूप सामने आया वो हैरान करने वाला था। जिसमें गुरू जाति से जोड़कर शिष्य को देख रहा है, उस पर अत्याचार कर रहा है। दलित साहित्य में जिस तरह के गांवों का चित्रण किया गया वो बिल्कुल उलट दिखता है। दलित साहित्य में जो चित्रण और व्यथा दलित समाज की है वो उनके साहित्य में कहीं नहीं दिखती।
  
प्रो विवेक कुमार ने बाबा साहब के चिंतन की महत्ता का जिक्र करते हुए कहा कि बाबा साहब के आंदोलन के कारण ही आज के दलित साहित्य में समानता,  स्वतंत्रता, बंधुता और नवीन समाज की संरचना के मूल्य है। उन्होंने बताया कि दलित महिलाओं के अधिकारों के लिए बहुजन नायकों की परंपरा को देखा जा सकता है जिनमें संत रैदास, फूले, पेरियार, नारायण गुरू और बाबा साहब हैं। ये अपने दौर में दलित स्त्री के उत्थान के लिए चिंतित थे। बाबा साहब ने कहा था कि मैं किसी देश की या समाज की तरक्की को महिला की तरक्की से जोड़कर देखता हूं। इसलिए बाबा साहब ने सिर्फ दलित महिलाओं के लिए ही नहीं बल्कि हर तबके की महिलाओं के उद्धार के लिए काम किया और उसे मजबूत बनाने के लिए कानूनी रूप भी दिया।      


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