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सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक समानता के लिए 'स्टालिन' की योजनाओं का अध्ययन ज़रूरी- के सी पिप्पल

18 दिसम्बर 1879 में जार्जिया के एक मोची परिवार  में जन्में सोसो जो बाद में एक तानाशाह शासक जोसेफ़ स्टालिन के नाम से मशहूर हुए साम्यवादी शासन की स्थापना और दुश्मनों के खात्मे के लिए जब स्टालिन ने सख्त अनुशासन और राज्य के आंतक का सहारा लिया तो लाखों लोग मारे गए थे। इन्हें 2 बार शान्ति के नोबल पुरस्कार के लिए भी नामित किया गया।  सोचने वाली बात है कि हजारों लाखों लोगों की मौत का कारण बनने वाला व्यक्ति शांति के नोबल के लिए नामित हो। दूसरे विश्व युद्ध का अंत करने में स्टालिन की अहम भूमिका मानी जाती है।
 
इतिहासकार कहते हैं कि जॉर्जिया को अपने सोवियत काल के अतीत से रूबरू होने की जरूरत है। ओल्गा कहते हैं,“जॉर्जिया में पुरानी पीढ़ी के ज्यादातर लोग ये सोचते हैं कि स्टालिन एक ऐसे महान राजनेता थे जिन्होंने कुछ छोटी-छोटी गलतियां की थीं। बेशक कुछ लोग उनका इतिहास जानने में दिलचस्पी नहीं रखते हैं वे स्टालिन को पसंद नहीं करते हैं।" स्टालिन को रूस का ‘लौह पुरुष’ भी कहा जाता है।
   
संयुक्त सोवियत समाजवादी गणतन्त्र रूस जब 1917 की क्रान्ति के बाद महाशक्ति बना, तो लेनिन की मृत्यु के बाद टाटस्की तथा स्टालिन में देश के नेतृत्व को संभालने के लिए संघर्ष हुआ, जिसमें स्टालिन को सफलता प्राप्त हुई। स्टालिन ने देश की अर्थव्यवस्था को सुधारने, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उसे मजबूत बनाने तथा सैनिक दृष्टि से सशक्त बनाने हेतु महत्वपूर्ण कार्य किया और संसार में उसको प्रतिष्ठित किया।   

स्टालिन के पिता एक मोची थे जो अपनी तेरहवीं संतान ‘सोसो’ को एक पादरी बनाना चाहते थे, किन्तु स्टालिन मार्क्सवादी विचारधारा से इतना प्रभावित था कि वह ‘सोशल डेमोक्रेटिक’ पार्टी का सदस्य बना। लेनिन की तरह ही वह अपने क्रान्तिकारी विचारों के कारण जार शासन की आंखों की किरकिरी बना हुआ था। इस दौरान उसे कई प्रकार की जेल-यातनाएं सहनी पड़ी। बॉल्शोविक क्रान्ति में भाग लेने के कारण उसे साइबेरिया के ठण्डे प्रदेशों में कैद रखा गया।
   
क्रान्ति के बाद उसे मुक्त कर उसकी योग्यतानुसार कम्युनिस्ट पार्टी के मन्त्री पद पर नियुक्त किया गया। लेनिन की मृत्यु के बाद स्टालिन को ही सर्वाधिक योग्य समझकर उसे नेतृत्व का भार सौंपा गया। स्टालिन ने शासन का भार अपने हाथ में लेते ही सर्वप्रथम पूंजीपतियों का नाश करके नयी आर्थिक नीति की घोषणा की, जिसमें देश के सभी कारखानों पर सरकार का अधिकार हो गया। मजदूरों को नकद वेतन की जगह एक प्रकार के कार्ड दिये गये, जिन्हें दिखाकर उन्हें उपयोग की वस्तुएं प्रदान की जाती थीं।
   
रूस की जमीन पर राज्य का अधिकार हो गया। जमींदारों से जमीनें छीन ली गयी। किसानों के पास उसके तथा उसके परिवार के पोषण जितना ही अनाज शेष रखा गया। बाकी पर सरकार का अधिकार हो गया।  कृषि पर राज्य का अधिकार हो गया। कृषि कार्य राज्य का कार्य बन गया, पशु संपत्ति भी राज्य की हो गयी। इस कारण हुए विद्रोह को उसने थोड़े ही समय में दबा दिया।
   
रूस में तीन प्रकार के फॉर्म बनवाये गये, जो सभी सरकार के संचालन व नियन्त्रण में थे।  व्यवसायों के संचालन के लिए प्रत्येक कारखानों का वर्गीकरण उत्पादन के आधार पर किया गया, जिसे सिडिंकेट नामक संस्था के अधीन कर दिया गया।  मुनाफे का निश्चित भाग राज्य सरकार को दिया जाता था। एक भाग मजदूरों की चिकित्सा व सुविधाओं पर व्यय किया जाता था।   

1928 में अन्य सुधारों के साथ-साथ स्टालिन ने देश की आर्थिक दशा सुधारने के लिए पंचवर्षीय योजनाओं की शुरुआत की, जिसमें प्रथम पंचवर्षीय योजना द्वारा, कृषि द्वारा, उत्पादन में वृद्धि, बांधों का निर्माण कर विद्युत उत्पादन करना तथा उद्योग-धन्धों में इसका उपयोग करना शामिल था।

विशाल कारखानों, तेल कुओं का निर्माण, कृषि का राष्ट्रीकरण किया, सामूहिक फॉर्मों में सिनेमा और क्लबों का निर्माण नवीन सभ्यता से किसानों को परिचित कराने हेतु किया। 1933 में द्वितीय पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत यातायात साधनों में रेलों और सड़कों का निर्माण, व्यावसायिक केन्द्रों, व्यावसायिक नगरों तथा उद्योगों का विकास किया गया।

यूरोपीय देशों की तुलना में आर्थिक दृष्टि और सभ्यता से पिछड़े हुए देश की दशा को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाने के लिए स्टालिन ने राष्ट्रों के प्रतिनिधियों को विदेशों में भेजा।  इटली, फ्रांस और जापान से सन्धि की। शिष्टमण्डलों का विदेशों में आदान-प्रदान कर विदेशों से मैत्री सम्बन्ध स्थापित किया।   

शैक्षिक प्रगति हेतु जनता की शिक्षा के साथ-साथ रूसी भाषा की उन्नति पर विशेष ध्यान दिया गया। विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति तथा विशेष कॉलेज खोले गये।  जार तथा पोप समर्थित धार्मिक सम्प्रदायों को नष्ट करके धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था कायम की। 5 मार्च 1953 में  यह महान शासक हमेशा हमेशा के लिए इस दुनिया से अलविदा कह गया।   

स्टालिन का रूस आज भी अपनी नवीन साम्यवादी व्यवस्था के लिए स्टालिन का हमेशा ऋणी रहेगा। यद्यपि स्टालिन ने देश की सम्पन्नता और गौरव में वृद्धि के लिए अपनी नीतियों का कठोरतापूर्वक पालन करवाया, तथापि उसने नीतियों का निर्दयतापूर्वक दमन करवाया, जो राष्ट्रहित के लिए ही था।   

हिटलर के बाद का सबसे बड़ा तानाशाह स्टालिन जिसके बारे में कहा जाता है कि अपने जीवनकाल में लगभग 2 करोड़ लोगों को मरवाया और अपने खुद के परिवार के लोग भी उसमें शामिल थे। जिस कारण उसके दिल का दौरा पड़ कर मरने के समय उसके पास कोई मौजूद नहीं था।  जो लोग भारत में सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक समानता लाने में विश्वास रखते हैं। उन समाज सुधारकों और राजनीतिज्ञों को स्टालिन की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक योजनाओं का अध्ययन अवश्य करना चाहिए। उनकी कुछ योजनाओं पर चलकर हम भारत के शोषित लोगों को सामाजिक सम्मान और आर्थिक मुक्ति दिला सकते हैं।   

याद रहे भारत के समाजवादी, साम्यवादी राजनीतिज्ञ और समाजसेवी लोग स्टालिन की नीतियों में विश्वास नहीं रखते, क्योंकि वह एक मोची जाति का बेटा था। इसीलिए भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों की नीतियों से भारत का दलित- मजदूर वर्ग खुश नहीं है, यही उनके पतन का कारण है।   1089 के बाद भारत में कांशीराम जी के बहुजन आंदोलन से दलित पिछड़े वर्ग का मजदूर प्रभावित होकर और कम्युनिस्ट पार्टियों से तंग आकर BSP के साथ तेजी से जुड़ा।  परंतु बहुजन समाज पार्टी ने सत्ता में आने के लिए पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद से समझौता कर लिया। इसलिए यह वर्ग तेजी से बीएसपी से हटने लगा। जिसके कारण उत्तर प्रदेश में भी BSP का ग्राफ गिरने लगा। अगर समय रहते बीएसपी ने अपनी नीतियों और व्यवहार में परिवर्तन नहीं किया तो यह पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी की तरह एक इतिहास बन जाएगी। 

लेखक भारत सरकार के भारतीय आर्थिक सेवा विभाग में अपर आर्थिक सलाहकार रह चुके हैं


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1 Comments

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    2017-11-07

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