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*स्वतंत्रत भारत के परतंत्र लोगों की मुक्ति का मार्ग*

भाग्य, भगवान और भविष्य के ऐजेंट बन कर ब्राह्मण पुरोहितों ने भारत के करोड़ों शूद्र हिंदुओं को मानसिक गुलामी का शिकार बना रखा है। बेचारे हिन्दू-शूद्र, बच्चा पैदा कर सकते हैं लेकिन अपने बच्चे का नामकरण अपने आप नहीं कर सकते। मकान खुद बना सकते हैं लेकिन ग्रह प्रवेश ब्राह्मणों के बिना नहीं कर सकते। लोग शादी का रिश्ता स्वयं ढूँढ सकते हैं लेकिन ब्राह्मण के बिना विवाह की तारीख नहीं निकाल सकते। वे लोग कोई भी व्यवसाय कर सकते हैं लेकिन ब्राह्मण के बिना शुभ मुहूर्त नहीं निकाल सकते। जो लोग अपनी जिंदगी के फैसले स्वयं नहीं ले सकते, जिन लोगों को अच्छे बुरे का ज्ञान ना हो, जिन लोगों को आज भी अपने मां बाप से ज्यादा देवी देवताओं पर भरोसा हो, जो लोग कुत्ते, बिल्ली, पेड़ पौधों, विधवा, सधवा को अशुभ मानते हों, जो लोग शिक्षा से कोसों दूर भागते हैं, जो लोग मजबूरी को अपना भाग्य समझते हों यह उनके मानसिक गुलामी के लक्षण हैं। 

उपरोक्त मानसिक गुलामी अज्ञानता के कारण हमारे समाज को मिली है। मानसिक गुलामी से ग्रस्त इस विशाल शूद्र समाज को मुट्ठी भर चालाक लोग अपने वैचारिक मंत्र से चलाते हैं। इन अमानवीय सामाजिक कुरीतियों को कुछ जातियां अपने लिए भगवान का आदेश मान कर गंदे काम अपनी मर्जी से करने के लिए विवश हैं। क्या इस तरह की विवशताओं से मुक्ति दिलाने के लिए आजाद भारत का संविधान सक्षम है? 

इस बीमारी से मुक्ति के लिये प्रज्ञा (विज्ञान) और करुणा (मानवता) की शभारत रण में जाना होगा। बुद्ध और भीम के नवयान 'धम्म' में मुक्ति के रास्ते आप स्वयं खोज सकते हैं, किसी ऐजेंट की जरूरत नहीं है। 

शिक्षा से ग्यान से बुद्धि से तर्क से मस्तिष्क विकास से सम्मानित जीवन से आर्थिक मुक्ति से सभी तरह की गुलामी से छुटकारा मिल जायेगा।

अत्तः दीपो भवः भवतु सब्ब मंगलम् 
के.सी पिप्पल, आईइएस सेनि. 


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