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‘शिक्षक दिवस’ का चयन और भारतीय जातिवादी मानसिकता

शिक्षक दिवस एक बहुत ही पवित्र और सराहनीय दिवस है।  ऐसे में इस दिन की महत्ता और बढ़ जाती है जब गुरु-शिष्य की परंपरा और मर्यादा खत्म हो रही है। वास्तव में डॉ एस राधाकृष्णन भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत एक प्रख्यात शिक्षाविद, महान दार्शनिक, जननायक, उत्कृष्ट वक्ता थे और उन्हें स्वतंत्र भारत के दूसरे राष्ट्रपति बनने का भी गौरव प्राप्त हुआ था। उन्होंने अपने जीवन के महत्वपूर्ण 40 वर्ष शिक्षक के रूप में बिताए। इसके साथ ही वे हिंदू धर्म के प्रबल समर्थक और ज्ञाता थे। शिक्षा के लिए उन्होंने बहुत कुछ किया। उनकी योग्यता और उपलब्धियां अतुलनीय हैं। शिक्षक के रूप में विश्व पटल पर उन्होंने अपनी एक अलग पहचान छोड़ी थी। एक बार डॉ एस. राधाकृष्णन के कुछ छात्र और दोस्त उनसे मिलने आए और कहा कि वो उनका जन्मदिन मनाना चाहते हैं, इस पर डॉ राधाकृष्णन ने सहमति जताते हुए कहा कि मेरा जन्मदिन अलग से मनाने की बजाए इसे ‘शिक्षक दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा तो मुझे गर्व महसूस होगा। इसके बाद 5 सितंबर 1962 से देश में 5 सितंबर का दिन ‘शिक्षक दिवस’ के रूप में मनाया जाने लगा।
  
वहीं दूसरी तरफ 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नाय गाँव में जन्मी सावित्री बाई फुले ने घर-घर जाकर बच्चियों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया और शिक्षा की अलख जगाई । वे देश की पहली महिला शिक्षिका थी।  1848 से लेकर 1852 के दौरान सावित्री बाई फुले ने अपने पति और सामाजिक क्रान्तिकारी नेता ज्योतिबा फुले के साथ मिलकर बिना किसी की आर्थिक मदद के 18 स्कूल खोले, सामाजिक क्रान्ति का बिगुल बजा दिया था। जातिवाद के सबसे घिनौने दौर में जब सावित्री बाई बच्चियों को शिक्षा की और मोड़ने की मुहिम चला रही थीं, तो उन पर गोबर और पत्थर फेंके जाते थे । ज्योतिबा और सावित्री बाई के इस कदम से उस समय पूरा ब्राह्मणवादी समाज नाराज था, जिसके चलते ज्योतिबा के पिता जी ने भी उनका साथ छोड़ दिया और उन्हें घर से चले जाने की हिदायत दे डाली थी । जिसके बाद वो अलग रहने लगे थे। सावित्री बाई फुले ने पहला स्कूल महाराष्ट्र के पुणे में खोला, और अठारहवाँ स्कूल भी पुणे में ही खोला । पुणे के भिडेवाड़ा में 1848 में खुले पहले स्कूल में मात्र नौ छात्राओं ने दाखिला लिया। जिनकी आयु चार से छह वर्ष के बीच थी। उस दौर में पुणे अस्पृश्यता का सबसे भयावह और अमानवीय उदाहरणों में गिना जाता था। ऐसे में इसी जगह पर दलित-वंचित और स्त्री समाज के लिए स्कूल खोलना ब्राह्मणवाद पर चोट करने जैसा था। इन छह छात्राओं की कक्षा के बाद सावित्री बाई फुले के घर-घर जाकर बच्चियों को पढ़ाने का आह्वान करने का फल ये निकला कि पहले स्कूल में ही इतनी छात्राएं हो गई कि एक और अध्यापक नियुक्त करने की नौबत आ गई । ऐसे समय विष्णुपंत थत्ते ने मानवता के नाते मुफ्त में पढ़ाना स्वीकार कर विद्यालय की प्रगति में अपना योगदान दिया। सावित्री बाई फुले ने 1849 में पूणे में ही उस्मान शेख के यहां मुस्लिम स्त्रियों व बच्चों के लिए प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र खोला। 1849 में ही पुणे, सतारा और अहमद नगर जिले में पाठशाला खोली। जिसमें लड़के और लड़कियां दोनों पढ़ने आते थे।    

ये कैसी व्यवस्था और स्वार्थ है कि कोई खुद ही अपने जन्मदिन को एक पहचान के रुप में देने की वकालत करे, और उसे मान भी लिया जाए। जब शिक्षक दिवस से एस. राधाकृष्णन जी का नाम जोड़ दिया जाता है तो कहीं ना कहीं उसमें जातिवाद की दुर्गंध आने लगती है। दरअसल सावित्री बाई फुले और एस राधाकृष्णन का कोई मुकाबला हो ही नहीं सकता, लेकिन यहां उनकी उपलब्धियां इसलिए बताए जाने की जरूरत है कि जिससे ये समझा जा सके कि इस मूल्यांकन की जरूरत क्यों पड़ रही है कि असली शिक्षक दिवस का हकदार कौन और क्यों है ? जब हम शिक्षा की बात करते हैं तो उस दौर की परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना चाहिए, जिसमें काम किया गया, और किस तरह की पहल की गई। इसके अलावा विपरीत परिस्थितियों में नए रास्ते बनाने के लिए किस तरह कदमों को आगे बढ़ाया गया। ये सब सावित्री बाई ने किया था शायद इसीलिए वो अलग पहचान रखती हैं ।   


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