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भारत में विभिन्न प्रकार के गुलामों का आकलन

हमारे देश भारत को आजाद हुए सत्तर वर्ष से ऊपर हो गए हैं लेकिन आज भी देश की 132 करोड़ आबादी में कुल 1 करोड़ 84 लाख लोग गुलामों जैसी जिंदगी गुजार रहे हैं। यह आंकड़े वर्ष 2016 के हैं, जिन्हें मानवाधिकार समूह 'वाक फ्री फाउंडेशन' ने ग्लोबल स्लेवरी इंडेक्स-2018 नामक रिपोर्ट में प्रकाशित किया था। दुनिया के चार करोड़ गुलामों में से अकेले भारत में इसकी संख्या 46 प्रतिशत होना वाकई आजाद भारत के लिए शर्मनाक स्थिति है। उक्त शारीरिक गुलामी के अतिरिक्त भारत में मानसिक गुलामों का सर्वे किया जाय तो यह अनुमानित आंकड़ा 90 और 100 करोड़ के बीच हो सकता है।

प्राचीन ग्रीस के इतिहास में 399 ईसा पूर्व एथेंस के इतिहास में दासप्रथा का उल्लेख है। इस संदर्भ में प्रजातांत्रिक पद्धति और दूसरी शासन पद्धतियों में विशेष भेद नहीं था। वर्तमान राजनीतिक सिद्धांत में 'श्रम के महत्व' को मुख्य स्थान प्राप्त है। प्राचीन सिद्धान्तों में 'श्रम' राजनीतिक अधिकारों की अयोग्यता का परिचायक था। एक लम्बे अरसे तक ‘दस्तकारों’ को भी दासों की श्रेणी में रखा गया था। फिर भी अन्य देशों की अपेक्षा एथेंस में दासों की स्थिति अच्छी थी।

भारत में व्यक्तिगत गुलामी की अपेक्षा सामूहिक गुलामी पर जोर दिया गया है। इस लिए व्यक्ति चाहे जितना गुणवान हो यदि उसने गुलामों की जमात (शूद्र) में जन्म लिया है तो वह आजीवन गुलामी की पहिचान से पीड़ित रहेगा। जड़वादी हिन्दू वर्णव्यवस्था में जातीय गतिशीलता को पूर्णता: वर्जित कर दिया है। शूद्र वर्ण की लगभग 6743 जातियों के 100 करोड़ लोग मानसिक गुलाम होने के कारण गरीब, अशिक्षित, लाचार, पीड़ित, कमजोर और पराश्रित होकर गुलामी जैसा जीवन जीने को मजबूर हैं। आजाद भारत के संविधान ने इन लोगों की सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, प्रशासनिक और राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु आरक्षण की व्यवस्था की है।

भारत में उपरोक्त बंचित वर्गों की सभी तरह की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले नेताओं में डा अम्बेडकर का नाम सबसे ऊपर है। उनके संघर्ष के कारण देश के प्रत्येक वयस्क को सामान मताधिकार प्राप्त हो सका। वोट के अधिकार से आज सर्वहारा या बहुजन समाज अपना राजा स्वयं चुन सकता है। अब राजा रानी के पेट से नहीं बल्कि बैलट बॉक्स (EVM) से उत्पन्न होता है।

जिस समाज का राजा होता है वह समाज कभी गुलाम नहीं माना जाता है। जिस समाज की राजनीतिक सत्ता होती है उसी की सांस्कृतिक सत्ता भी धीरे धीरे स्थापित हो जाती है। आज सर्वहारा बहुजन समाज अपने राजनीतिक हथियार (वोट) का सही प्रयोग करना सीख जाये तो उसे सभी तरह की गुलामी से मुक्ति मिल सकती है।

बहुजन समाज की अनेकों राजनीतिक पार्टियां होने के कारण यह समाज सत्ता से दूर इस लिए चला जाता है क्यों कि उनका वोट अनेकों पार्टियों में बिखर जाता है। इसको बिखरने से रोकने के लिए आरक्षित शूद्र वर्ग की सभी राजनीतिक पार्टियों को हर छोटा बड़ा चुनाव, ‘महा संघ’ बना कर लड़ना चाहिए। महात्मा बुद्ध के तीन संकेतों अर्थात "बुद्धि की शरण में जाओ, संघ की शरण में जाओ और धम्म की शरण में जाओ" को हमें मद्देनजर रखते हुए सभी राजनीतिक निर्णय लेने चाहिए। 

शारीरिक श्रम हेतु मानव जाति को गुलाम या दास बनाना एक तरह की आर्थिक गुलामी की प्रथा थी। प्राचीनकाल में जानवरों की तरह जंजीरों में बांधकर उनकी खरीद फरोख्त होती थी। परन्तु मानसिक गुलामों को जंजीरों में बांधने की जरुरत नहीं होती। वे स्वतः ही मालिक के पुचकारने या इशारे पर दुम हिलाने लगते हैं। विजित देशों के नागरिकों को गुलाम बना कर शारीरिक श्रम करने के लिए रखा जाता था। उन्हें राजनीतिक अधिकारों से बंचित रखा जाता था। राजनीति करने की बात तो दूर वह उसके बारे में सोच भी नहीं सकते थे। "कोई नृप होय हमें का हानी, चेरी चोरी होइ ना रानी" वाली कहावत चरितार्थ थी। मार्क्स का ‘सर्वहारा आर्थिक और राजनीतिक गुलाम’ है तो अंबेडकर का ‘दलित सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक गुलाम’ है। लोहिया का पिछड़ा भी ‘सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक गुलाम’ है। लोकतंत्र की स्थापना होने के बाद भारत में इनको राजनीतिक अधिकार डा.अंबेडकर ने दिलाये हैं। शिक्षा का अधिकार अंबेडकर ने दिलाया है। मजदूरों को वाजिब मजदूरी निर्धारण करवाने का नियम डा आंबेडकर ने बनबाया है। मानसिक गुलामी से मुक्ति के लिए बौद्ध धम्म बाबासाहब ने खुद ग्रहण किया और सभी सांस्कृतिक गुलामों को ग्रहण करने हेतु प्रेरित किया है। आर्थिक मुक्ति हेतु शिक्षा के अधिकार का प्रयोग करके सम्मान जनक कामधंधे करने के लिए प्रेरित किया है।

सामान्यतः गुलामी तीन प्रकार की होती है। 1. राजनैतिक गुलामी 2. आर्थिक गुलामी 3. सांस्कृतिक गुलामी। हमारा देश विदेशी शासकों द्वारा कई बार गुलाम बनाया गया। सबसे पहले आर्यों द्वारा सिंधु घाटी की सभ्यता के नाग वंशीय सौदरियों को परास्त करके वैदिक संस्कृति को स्थापित किया। वैदिक युग के समय में सौदरियों को अपभ्रंश नाम शूद्र दे दिया गया। ऋग्वेद में शूद्र वर्ण का उल्लेख नहीं किया गया है, उसमे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य का ही वर्णन है। शूद्रों ने जब तक आर्यों की गुलामी स्वीकार नहीं की तब तक उनको अपनी व्यवस्था में स्थान नहीं दिया। कालांतर में सौदरियों की कुछ जातियों ने उनसे नजदीकी बना ली उनको शूद्र वर्ण के रूप में मान्यता दे दी। बाद में जैसे जैसे शूद्र जातियां उनके नजदीक आती रहीं और उनकी राजनीतिक सत्ता को मान्यता देती रहीं उसी क्रम में उनको नीचे की श्रेणी में डालते गए। जिन्होंने सबसे अंत में गुलामी स्वीकार करी उनको सेवक, दस्तकार और साफ सफाई जैसे घृणित कार्य करने को मजबूर किया गया। परन्तु जो लोग अंत तक उनके नजदीक नहीं आये तो उनकी संस्कृति को जंगली जातियों या जनजातियों के नाम से पहिचान मिली।

शूद्रों का पुनरुत्थान
शूद्रों के पुनरुत्थान तथा वैदिक युग के पतन के बाद पुन: शूद्र वंशीय सम्राट महाराजा महापद्मनंद ने अपना शासन स्थापित करके आर्य कुलीन क्षत्रिय शासन का अंत किया। इनके निम्नलिखित 10 पुत्र थे। (1) गंगन पाल, (2) पंडुक, (3) पंडुगति, (4) भूतपाल, (5) राष्ट्रपाल, (6) गोविषाणक, (7) दशसिद्धक, (8) कैवर्त और (9) घनानंद, (10) चन्द नन्द।इनमें से घनानंद नौवां पुत्र था। जो नंदवंश का आगे चलकर अंतिम शासक बना। अलग-अलग इतिहास कार अपने अपने पृथक तर्क से इनके कुशासन व सुशासन काल का वर्णन करते है। नन्दवंश नाई शासक द्वारा स्थापित राजवंश था। घनानन्द के राज दरबार मे उपयोग मे लायी जाने वाली गणिकाएं अधिकांशत: ब्राह्मण व क्षत्रिय होती थी। इस लिए ब्राह्मण इतिहासकारों ने उसे क्रूर शासक की संज्ञा दी थी। घनानन्द काल मे आजीवक और बौद्ध धर्म अपनी चरम सीमा में थे। उनके दरवार में आजीवक अमात्यों की संख्या सर्वाधिक होती थी। वे आजीवकों को सबसे अधिक गुफाएं दान देते थे तथा ब्राह्मणों को सबसे कम, इसी बजह से विष्णुगुप्त उनसे कुंठित था।

सम्राट धनानंद मगध के शक्तिशाली लोकप्रिय एवं अनीश्वरवादी राजा थे। उनके शासन में कोई भी निर्धन नहीं था सभी धन एवं धान्य से परिपूर्ण थे जनता पूर्णतः सुखी थी क्यूंकि उस समय जातियां जन्म से नहीं कर्म से निर्धारित होती थीं। सभी जातियां घृणा का प्रतीक न होकर श्रम के विभिन्न विभागों का प्रतीक थीं। किसी भी जाति का व्यक्ति अपनी विशिष्ठ कार्यकुशलता के द्वारा ग्रामप्रधान जिला प्रमुख या राजा बन सकता था।

धनानंद नाइ समाज से निकल कर अपनी बुद्धि और कार्यकुशलता द्वारा राजा बना था। जनता में वह पूरी तरह स्वीकार्य था। उसने राज्य की सुख समृद्धि को स्थाई रखने के लिए कुछ कठोर नियम बनाये थे।  उन्ही नियमों में से एक था ब्राह्मणों का राज्य की सीमा में प्रवेश निषिद्ध करना और इसको सुनिश्चित करने के लिए उसने एक गुप्तचरों की टुकड़ी बनाई हुई थी, जिसका काम था ब्राह्मणों की राज्य के बाहर की देशद्रोही गतिविधियों पर नजर रखना।

एक बार राजा ने बुद्ध्पूर्निमा पर सामूहिक भोज का आयोजन करवाया और राज्य भर की जनता को न्योता भिजवा दिया। इस भोज में विष्णुगुप्त नामक एक ब्राह्मण घुसपैठिया भी भेष बदल कर सम्मिलित हो गया। उसने स्वयं को शूद्र जैसा दिखने के लिए श्यामवर्ण में बदल लिया था। लेकिन बुद्धिमान गुप्तचरों की निगाहों को धोखा ना दे पाया और पकड़ा गया। उसे सम्राट के सामने लाया गया। सम्राट ने उसपर दया कर उसे कुछ अपमानित करके ही छोड़ दिया। जो आगे चलकर सम्राट की भयंकर भूल साबित हुई।यही विष्णुगुप्त आगे चलकर चाणक्य बना और सम्राट धनानंद के पतन का कारण बना। धनानद को बर्बाद करने के लिए इस कुटिल चाणक्य ने विदेशी आक्रमणकारियों को निमंत्रण देकर देश को भयंकर युद्ध की विभीषिका में धकेल दिया।

चंद्र गुप्त मौर्य से अशोक तक
इस ऐतिहासिक दुर्घटना को अधिक महत्त्व न दिए जाने का एक कारण यह भी है की चाणक्य ने नन्दसत्ता का पतन करवा कर चन्द्रगुप्त मौर्य को सत्ता दिलवाई और चन्द्रगुप्त का पोता महान बौद्ध सम्राट अशोक हुए। 

इस सत्ता हस्तांतरण के खेल में चाणक्य स्वयं राजा नहीं बना ये उसकी कोई महानता नहीं मानी जा सकती। क्यूंकि ये उसकी मज़बूरी थी इसके चलते सत्ता के केंद्र में शूद्र वंश का शासक ही रहा।

ब्राह्मण की सत्ता जनता कभी स्वीकार ना करती, इसलिए चाणक्य ने मौर्य जाति के चन्द्रगुप्त का इस्तेमाल किया। चन्द्रगुप्त मौर्य उसके बाद बिदुसार मौर्य जैसे राजा उसके लिए वैसे ही थे जैसे ब्राह्मणों के षड्यंत्र में फंसे राजा रामचंद्र।

चाणक्य ने मौर्य वंश के माध्यम से भारत को ब्राह्मण धर्म का गुलाम बनाने का पूरा षड्यंत्र किया था। परन्तु सम्राट अशोक ने ब्राह्मणवाद को शीघ्र समझ लिया और उन्होंने बुद्धिज्म को स्वीकार कर ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय, की नीव रखी।

सम्राट अशोक से ब्रहद्रथ तक
यह बात किसी से छिपी नहीं है कि भारत के इतिहास में सम्राट अशोक का साम्राज्य सबसे बड़े भूभाग पर फैला था। इतने बड़े  क्षेत्र पर किसी ने भी शासन नहीं किया। उनका धम्म 'शासक' और 'प्रजा' दोनों के लिए नैतिक संहिता का निर्धारण करता है। नैतिकता के पथ पर चलने की अपेक्षा अपनी प्रजा से भी सम्राट करते थे। उन्होंने बौद्ध धर्म अपने प्रजाजनों पर लादा नहीं था। वे सांस्कृतिक व राजनीतिक बहुवाद के प्रतीक थे उनकी विचारधारा को भारतीय संविधान ने आत्मसात किया है। चार सिंहों का उनका प्रतीक, भारतीय मुद्रा में अंकित है और उनका चक्र, भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का भाग है।

अशोक के शासन को कभी कोई सैन्य चुनौती नहीं मिली। वे 50 से भी अधिक वर्षों तक शासक रहे। 205 ईसा पूर्व में यूनानी सम्राट एन्टियोकस ने उत्तर-पश्चिम से आक्रमण किया और पंजाब व अफगानिस्तान सहित कुछ उत्तर-पश्चिम हिस्सों पर कब्ज़ा कर लिया। अशोक को असली चुनौती बाहरी आक्रांताओं से नहीं बल्कि उनके साम्राज्य के अंदर से मिली। बौद्ध धर्म के बढ़ते प्रसार पर ब्राह्मणवादी प्रतिक्रिया उनके लिए सबसे बड़ी समस्या थी। अशोक ने धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान जानवरों की बलि देने पर प्रतिबंध लगा दिया था। इससे ब्राह्मणों की आय में कमी आई। बौद्ध धर्म के प्रसार के कारण वर्ण और जाति व्यवस्था कमज़ोर पड़ी। जिस धार्मिक धारा को सांप्रदायिक ताकतें वैदिक धर्म बता रही हैं वह दरअसल तत्समय में प्रभावकारी ब्राह्मणवाद था।

इन कारकों के चलते अशोक के साम्राज्य में प्रतिक्रांति हुई। प्रतिक्रांति का नायक बना सम्राट अशोक के पोते बृहद्रथ का ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र शुंग। उसने सम्राट ब्रहद्रथ को अशोक विजय दशवीं के दिन मौत के घाट उतार दिया।

ब्राह्मणवाद की पुनर्स्थापना
पुष्यमित्र शुंग ने अशोक साम्राज्य के एक हिस्से सिंध में शुंग वंश के शासन की स्थापना की। इस प्रतिक्रांति के परिणामस्वरूप बौद्ध धर्म उसके मूल देश से गायब हो गया। अंबेडकर लिखते हैं, ‘‘सम्राट अशोक ने जानवरों की बलि देने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया। इसके कारण लोगों ने धार्मिक कर्मकांड संपन्न करवाने के लिए ब्राह्मणों को बुलाना बंद कर दिया। ब्राह्मण पुरोहित बेरोज़गार हो गए। उनका महत्व और सम्मान भी कम हो गया। इसलिए ब्राह्मणों ने मौर्य सम्राट बृहद्रथ के विरूद्ध पुष्यमित्र शुंग के नेतृत्व में विद्रोह किया। शुंग एक सामवेदी ब्राह्मण था और बृहद्रथ की सेना का सेनापति भी’’

आठवीं शताब्दी के बाद से शंकर ने बुद्ध की विचारधारा के खिलाफ वैचारिक लड़ाई जारी रखी। बुद्ध कहते थे कि यही दुनिया असली दुनिया है और हमें इसी पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए। शंकर कहते थे कि यह दुनिया एक माया है। शंकर की विचारधारा ने अंततः ब्राह्मणवाद को देश में पुनर्स्थापित कर दिया और 1200 ई. के बाद बौद्ध धर्म यहां से पूरी तरह गायब हो गया। फिर अशोक के शासनकाल को आलोचना का विषय क्यों बनाया जा रहा है? अशोक के बौद्ध धर्म अपनाने से ब्राह्मणवाद को बहुत बड़ा धक्का लगा। ब्राह्मणवाद, हिंदू धर्म पर हावी था। अशोक, अहिंसा और बहुवाद में विश्वास करते थे। बौद्ध धर्म जातिविहीन समाज का प्रतीक था। अहिंसा की नीति अपनाने के बाद भी मौर्य साम्राज्य 50 वर्षों तक बना रहा। उसे कमज़ोर किया ब्राह्मणवादियों ने।

आजादी से व्यक्तित्व विकास
जब व्यक्ति आजाद होता है तब उसे अपने मन के भाव और विचारों को स्पष्ट रूप से दूसरों के सामने प्रकट करने का मौका मिलता है। लेकिन जब वह गुलाम होता है तब वही विचार जनहित के होने के बावजूद दूसरों के सामने प्रकट नहीं कर सकता। आजाद व्यक्ति अपने सभी मानवीय अधिकार प्राप्त करके असीम आनंद का अनुभव करता है। प्रकृति ने संसार के सभी व्यक्तियों को जीवन के सभी नैसर्गिक अधिकार दिए हुए हैं। उन तमाम मानव अधिकारों का हनन करने के वाले वर्ग ने मनुवादी व्यवस्था बनाई है। ऐसे लोगों से अपने मानवीय अधिकार छीन लेने चाहिए।

महात्मा ज्योतिबा फुले ने मिशनरियों के अच्छे कामों से खुश होकर कहा था "हम कुदरत से प्रार्थना करते हैं कि उनके प्रयास सफल होते रहें और उन्हें आगे भी इसी तरह कामयाबी मिलती रहे"।

बेरोजगारी और आरक्षण सामाजिक गुलामी का परिणाम
वर्ष 2001 से 2011 के दौरान 15 से 24 वर्ष के युवाओं की आबादी में दोगुनी से ज्यादा वृद्धि हुई है। वर्ष 2001 में युवाओं की आबादी एक करोड़ थी जो 2011 में 2.32 करोड़ हो गई थी यानि इसमें दोगुना से ज्यादा वृद्धि दर्ज हुई। आंकड़ों से साफ है कि युवाओं की तादाद जहां तेजी से बढ़ रही है वहीं उनके लिए उस अनुपात में नौकरियां नहीं बढ़ रही हैं। भारत में गुलामों और बेराजगारी के आकड़े सरकार के लिए चिन्ताजनक हैँ। बेरोजगार युवाओं की तेजी से बढ़ती तादाद देश के लिए खतरे की घंटी है।  देश की आधी से ज्यादा आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही है। लगभग 45 फीसदी युवा बेरोजगार है। पेट की मजबूरी के कारन यहां की बहुत सी युवतियां देहव्यापार के दलदल में धस रही हैं। इसके चलते देश में सेक्स पर्यटन को बढ़ावा मिल रहा है। सभी तरह के अपराधों में तेजी से बढ़ोत्तरी हो रही है। युवा मानसिक बीमारों की संख्या में लगातार बृद्धि हो रही है जो एक बेहतर राष्ट्र के लिए चिंताजनक स्थिति है।

महात्मा फुले ने आधुनिक भारत में सत्यशोधक समाज के माध्यम से मानसिक गुलामों को मुक्ति का मार्ग सुझाया। उन्होने 'गुलामगिरी' किताब लिखी जिसके प्रभाव से छत्रपति शिवाजी के बंशज छत्रपति शाहू महाराज ने कोल्हापुर स्टेट में 26 जुलाई 1902 को शूद्रों को 50 फीसदी सरकारी नौकरियों में आरक्षण दे दिया। बाबा साहब आंबेडकर ने अपने दोनों पूर्बजों का कर्ज उतारने के लिए भारतीय संविधान में पिछड़े वर्गों को उनकी जनसँख्या के अनुपात में आरक्षण की व्यवस्था करदी। जिसके तहत अन्य पिछड़े वर्गों को 52 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था मंडल कमीशन ने 1990 में की। बहुजन नायक कांशीराम जी ने कहा था कि 85 फीसदी आरक्षित वर्ग को बहुजन समाज के नाम से अपने वर्ग की नई पहिचान बना कर, गुलामी से मुक्ति की नहीं बल्कि शासक बनने की तैयारी करनी चाहिए। उसके लिए उनहोंने स्वयं राजनीतिक पार्टी बना कर लड़ाई शुरू की थी।

कल तक दलित, पिछड़े, आदिवासी, धार्मिक अल्पसंख्यक, जाट, कापू, मराठे और पटेल अलग अलग होने के कारण राजनीतिक रूप से दूसरों पर निर्भर थे, वे आज अपनी अपनी हिस्सेदारी जनसँख्या के अनुपात में मांग रहे हैं। परन्तु अपनी सत्ता बना कर बहुजन समाज सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक मुक्ति का लक्ष्य प्राप्त कर सकता है।

इस पुस्तक में डॉ चिरंजी लाल जी ने बहुत ही मेहनत करके मानसिक गुलामी से संबंधित तथ्य इकट्ठा करके सुधी पाठकों के सामने रखने का प्रयास किया है। सभी तथ्य बहुजन समाज के निर्माण के लिए सदुपयोगी हैं जो राष्ट्र निर्माण की जड़ है। मुझे विश्वास है की पाठक गण इस पुस्तक को पढ़ कर सराहना करेंगे। इसके ज्ञान ज्ञान का उपयोग राष्ट्र और समाज हित में करेंगे। इस अथक प्रयास के लिए में रतन प्रकाशन को साधुवाद देना चाहता हूँ।

के सी पिप्पल, आईईएस (पूर्व अति. आर्थिक सलाहकार, भारत सरकार)संस्थापक, राष्ट्रीय समग्र विकास संघ 


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