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इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने की प्रेस कांफ्रेस, चीफ जस्टिस की कार्यशैली पर उठाए सवाल

देश के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जजों ने मीडिया को संबोधित किया। जस्टिस चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ ने प्रेस कांफ्रेंस कर कहा कि अगर हमने देश के सामने ये बातें नहीं रखी और हम नहीं बोले तो लोकतंत्र खत्म हो जाएगा। हमने चीफ जस्टिस से अनियमितताओं पर बात की। लेकिन हम उन्हें समझाने में नाकाम रहे।  

जस्टिस जे चेलमेश्वर ने कहा, "हम चारों इस बात पर सहमत हैं कि इस संस्थान को बचाया नहीं गया तो इस देश में या किसी भी देश में लोकतंत्र ज़िंदा नहीं रह पाएगा. स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका अच्छे लोकतंत्र की निशानी है." "चूंकि हमारे सभी प्रयास बेकार हो गए, यहां तक कि आज सुबह भी हम चारों जाकर चीफ़ जस्टिस से मिले, उनसे आग्रह किया। लेकिन हम अपनी बात पर उन्हें सहमत नहीं करा सके. इसके बाद हमारे पास कोई विकल्प नहीं बचा कि हम देश को बताएं कि न्यायपालिका की देखभाल करें।

जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा कि वे मजबूर होकर मीडिया के सामने आए हैं, उन्होंने बताया कि दो महीने पहले हम सभी चार जजों ने चीफ जस्टिस को एक पत्र लिखा था, जो कि प्रशासन के बारे में था, हमने कुछ मुद्दे उठाए थे। हमने उनसे बताया कि जो कुछ भी हो रहा है, वह सही नहीं है। प्रशासन ठीक से नहीं चल रहा है। यह मामला एक केस के असाइनमेंट को लेकर था।' उन्होंने कहा कि हालांकि हम चीफ जस्टिस को अपनी बात समझाने में असफल रहे। इसलिए हमने राष्ट्र के समक्ष पूरी बात रखने का फैसला किया। 

उन्होंने कहा कि "मैं नहीं चाहता कि 20 साल बाद इस देश का कोई बुद्धिमान व्यक्ति ये कहे कि चेलमेश्वर, रंजन गोगोई, मदन लोकुर और कुरियन जोसेफ़ ने अपनी आत्मा बेच दी है।" ये पूछे जाने पर कि क्या आप मुख्य न्यायाधीश के ख़िलाफ़ महाभियोग चलाना चाहते हैं, जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा कि 'ये देश को तय करना है।' 

इसी साल अक्तूबर में मौजूदा मुख्य न्यायाधीश जस्टिस मिश्र की जगह लेने जा रहे जस्टिस गोगोई ने कहा, "ये देश का कर्ज़ था जो हमने चुकाया है।" यह पूछे जाने पर कि वो क्या मुद्दे थे, जिस पर चीफ़ जस्टिस से उनके मतभेद थे, जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा, "इसमें मुख्य न्यायाधीश का कुछ मामलों की सुनवाई को जजों को सौंपना भी शामिल था."


आपको याद दिला दें कि 23 जनवरी 2017 को जस्टिस कर्णन ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखी थी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट और मद्रास हाईकोर्ट के जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए थे, चिट्ठी में 20 जजों और सेवानिवृत्त जजों के नाम भी दिए गए थे, जिनके खिलाफ जांच की मांग की गई थी । जस्टिस कर्णन ने भी न्यायिक व्यवस्था में जातिवाद और भ्रष्टाचार महसूस किया था और अपनी ज़िम्मेदारी निभाते हुए प्रधानमंत्री को पत्र लिखा था  जिसकी जांच होनी चाहिए थी। उन्होंने पत्र के साथ  सुबूत भी प्रधानमंत्री को दिए थे, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने वो चिट्ठी उसी विभाग को भेज दी, जिसके ख़िलाफ़ चिट्ठी लिखी गई थी।

यहां सवाल उठता है कि जब जस्टिस कर्णन ने न्यायिक व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार और जातिवाद के खिलाफ जांच की मांग की, और वो खुद भी उससे पीड़ित थे तो क्या वो प्रक्रिया पूरी नहीं होनी चाहिए थी। क्या मामले की जांच के लिए संबंधित जांच ऐजेंसी को आदेश नहीं देने चाहिए थे। लेकिन प्रधानमंत्री जी ने संज्ञान लेने की जरूरत तक महसूस नहीं की । शायद जस्टिस कर्णन के प्रकरण से सबक लेते हुए ही इन चारोंं जजों ने प्रेस कांफ्रेंस की और पूरा मामला दुनिया के सामने लाना ही उचित समझा।

मुख्य संवाददाता
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