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रोहित सरदाना को गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार देने वालों की बुद्धि पर तरस खाया जा सकता है

केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा ने 2016 के पुरस्कारों की घोषणा कर दी है. बारह श्रेणियों में 26 लोगों को दिए जाने वाले पुरस्कारों की चार पेजी विज्ञप्ति की दूसरी श्रेणी (गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार) देखकर मैं अवाक रह गया. विज्ञप्ति के अनुसार, हिंदी पत्रकारिता तथा जनसंचार के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिए शीला झुनझुनवाला और रोहित सरदाना को गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा, जिसके तहत उन्हें पांच-पांच लाख रुपये की राशि मिलेगी.

देश और विदेश में हिंदी के शिक्षण-प्रशिक्षण, अनुसंधान और बहुआयामी विकास के लिए काम करने वाला यह संस्थान भारत सरकार के मानव विकास मंत्रालय के अधीन आता है. संस्थान द्वारा घोषित पुरस्कार के लिए चुने गए 26 विद्वानों पर बात क्या करना, यह टिप्पणी केवल गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार के लिए चुने गए टीवी पत्रकार रोहित सरदाना तक सीमित है.

संस्थान के निदेशक प्रो. नन्द किशोर पाण्डेय के नेतृत्व में उक्त पत्रकार का गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार के लिए चयन करने वाली कमेटी के सदस्यों की बुद्धि पर तरस ही खाया जा सकता है. यह सोचते हुए मैंने रोहित सरदाना द्वारा पिछले कुछ वर्षों में की गई पत्रकारिता और विद्यार्थी जी के जीवन का लक्ष्य एवं उनकी पत्रकारिता पर नजर डाली.

यह दिमागी कसरत करते हुए हम सोचने लगे कि क्या हिंदी पत्रकारिता का दायरा इतना दरिद्र है कि संस्थान को सांप्रदायिकता को बढ़ाने वाले पत्रकार का चयन करना पड़ा. संस्थान के इस चयन पर मैं ही नहीं हर वह शख्स आपत्ति करेगा जिसने गणेश शंकर विद्यार्थी को ठीक से पढ़ा होगा.

वैसे मैंने यह सोचा नहीं था कि गणेश शंकर विद्यार्थी की पुण्य तिथि (25 मार्च 2018) पर सांप्रदायिक सद्भाव समिति की ओर से राजेंद्र भवन में आयोजित गणेश शंकर विद्यार्थी स्मारक व्याख्यान देने के महज दस दिन बाद यह टिप्पणी लिखनी पड़ेगी. संस्थान ने इस चयन के जरिए विद्यार्थीजी की समूची पत्रकारिता और उनके काम का मजाक उड़ाने की हिमाकत की है.

दिलचस्प बात यह है कि जो व्यक्ति अपने जीवन के अंतिम समय तक किसानों और मजदूरों की लाठी बना रहा. सांप्रदायिक दंगों के खिलाफ लड़ता रहा. गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल बना रहा. सामाजिक एका के लिए काम करता रहा. उसी सामाजिक एका को कायम करने के प्रयास में हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक दंगों को शांत कराता हुआ आखिरकार शहीद हो गया. भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की ऐसी महान शख्सियत के नाम पर स्थापित पुरस्कार उस व्यक्ति को दिया जा रहा है जो गणेश शंकर विद्यार्थी के महान उद्देश्य और काम के उलट कामों के लिए जाना जाता है.

भगत सिंह और उनके साथी क्रांतिकारियों को ब्रिटिश सरकार ने 23 मार्च 1931 को फांसी दी थी. विद्यार्थी को इसकी सूचना अगले दिन यानी 24 मार्च की सुबह मिली थी. उसी समय वह घर से निकल गए थे. पूरा दिन शोक सभाओं और हड़ताल के आह्वान में रहे, लेकिन क्रांतिकारियों की फांसी के बाद देश के विभिन्न शहरों में दंगे भड़क गए थे. कानपुर में भी दंगा-फसाद शुरू हो गया था. देर रात घर लौटे विद्यार्थी ने परिवारीजनों को भगत सिंह और उनके साथियों की शहादत के बारे में बताया था.

Rohit Sardana AajTak Screenshot

वह बार-बार विचलित हो जाते थे. खिन्न और परेशान हो जाते थे. क्रांतिकारियों की फांसी से आहत और सांप्रदायिक दंगों से चिंतित विद्यार्थी पूरी रात सो नहीं पाए थे. वह बार-बार उठते थे. टहलने लगते थे. मां थोड़ी-थोड़ी देर बाद कहतीं, ‘बबुआ, थोड़ी देर आंखी झपक ल!’ इस पर विद्यार्थी का जवाब होता, ‘अम्मा, कुछ समझ नहीं आता, क्या करूं?’ मां अनहोनी की आशंका से सहमी सी थीं.

उनकी यह आशंका अगले दिन सही साबित हुई. हिंदुओं के मुहल्ले में कुछ मुस्लिम औरतें फंस गई थीं. उन्हें सुरक्षित बचाकर मुस्लिम मुहल्ले ले जाते हुए और वहां फंसे हिंदू परिवारों को सुरक्षित निकाल लाने की कोशिश करते हुए विद्यार्थी फसादी तत्वों के शिकार हो गए. उनकी बेटी विमला विद्यार्थी के शब्दों में कहें तो ‘दरअसल उन्हें फसादी तत्व भी कहना गलत होगा. मेरी निगाह में तो वे ब्रिटिश सरकार द्वारा बहकाए गए लोग होंगे.

’इस तरह विद्यार्थी उसी राह के पथिक बन गए जिस राह पर दो दिन पहले उनके क्रांतिकारी शिष्य गए थे. एक तरह से सांप्रदायिक दंगों ने उनकी नींद उड़ा दी थी. वह दो दिन से सो नहीं पाए थे, लेकिन उनके नाम पर स्थापित पुरस्कार के लिए ऐसे पत्रकार का चयन किया गया जिसने अपनी पत्रकारिता के जरिए लोगों खासकर सोचने-समझने तथा देश और समाज की चिंता करने वालों की नींद उड़ा रखी है.

फिलहाल सबसे तेज चैनल कहे जाने वाले चैनल ‘आज तक’ की नुमाइंदगी कर रहे इस पत्रकार के विशेष शो ‘दंगल’ के कुछ महीनों की कैचलाइन पर नजर डालेंगे तो आपको इसका सहज अंदाजा हो जाएगा. कासगंज हिंसा के दौरान तो उन्होंने सांप्रदायिक पत्रकारिता के कीर्तिमान तक बना डाले. एक दिन उन्होंने अपने शो की कैचलाइन बनायी-‘भारत में तिरंगा फहराया तो दंगा.

’अपरोक्ष रूप से समाज को दंगों की आग में झोंकने वाले यह महाशय यह नहीं समझते कि राष्ट्रभक्ति के नाम पर झूठ में सनी सामग्री प्रसारित करने से समाज में तनाव बढ़ेगा. दो धर्मों के बीच खुदी खाई पहले से कहीं अधिक चौड़ी होगी. वह यह भी नहीं देखते कि उनका संवाददाता क्या सूचना दे रहा है. उनकी इसी मनमानी के कारण एक ही समय दो अथवा उससे अधिक कहानियां चलने लगतीं.

एक तरह से रोहित सरदाना अपने शो के जरिए पूरे मुस्लिम समाज को भारत विरोधी, तिरंगा विरोधी, वंदे मातरम् विरोधी और पाकिस्तान परस्त बताने की कोशिश करते रहे. यह बात उनके सवालों से भी साबित हुई, जैसे-तिरंगा हिन्दुस्तान में नहीं तो क्या पाकिस्तान में फहराया जाएगा? क्या वंदे मातरम् और भारत माता की जय सांप्रदायिक नारे हैं? कासगंज में तिरंगे के दुश्मन कौन लोग हैं? पुलिस उनके नाम क्यों नहीं बता रही? देश के अंदर ऐसे कितने पाकिस्तान पनप रहे हैं?

इससे पहले भी एक वेबसाइट द्वारा नवंबर 2017 के अंतिम दस दिन का दो चैनलों के विशेष शो का अध्ययन किया गया था. उसमें भी रोहित सरदाना ने लगभग 95 फीसदी अपने शो को हिंदू बनाम मुस्लिम की बहस में बदलने का प्रयास किया. उनके निशाने पर मुसलमान और मौलाना रहे थे.

यह महोदय इस चैनल से पहले ‘जी न्यूज़’ टीवी न्यूज़ चैनल का हिस्सा हुआ करते थे. वहां ‘ताल ठोक के’ नामक शो करते थे. उसमें भी इनके अधिकतर विषय हिंदू बनाम मुस्लिम वाले होते थे अथवा इनके द्वारा जबरन बना दिए जाते थे. उस चैनल में काम करने के दौरान इनके कुछ शो का उल्लेख करना जरूरी है, जिससे पता चलेगा कि किस तरह की पत्रकारिता यह करते रहे हैं.

मई 2017 में किये गए एक शो का विषय था-‘देशद्रोही हुर्रियत को देश निकाला कब?’ उसमें पूछे गए सवालों की एक बानगी भी देख लीजिए-आतंक के दलालों की सेवा कब तक करेगा भारत?, आतंकियों के एजेंटों को देश निकाला कब?, आतंकियों के एजेंट भारत के वीवीआईपी क्यों? जबकि मामला यह था कि कश्मीर में आतंकी घटनाओं के लिए पाकिस्तान से धन मिलने का आरोप था, जिसमें एनआईए ने एक मामला दर्ज कर रखा था.

उसी संबंध में हुर्रियत नेता सैय्यद अली शाह गिलानी समेत कुछ नेताओं के खिलाफ एनआईए ने जांच शुरू की थी, लेकिन रोहित के सवालों से तो उक्त सभी नेता उसी दिन आतंकियों के एजेंट और दलाल घोषित कर दिए गए थे. इसी तरह मई के मध्य में ही ‘देश में देशद्रोह पर डबल स्टैण्डर्ड क्यों?’ शीर्षक से शो किया गया, जिसका मुखड़ा था-‘क्या कश्मीर में देश के गद्दारों को यह भरोसा हो गया है कि वह कुछ भी करते रहें, उनके खिलाफ या तो कार्यवाई नहीं होगी और होगी भी तो सिर्फ दिखावा करने के लिए और क्या कश्मीर में देशद्रोही हरकतों पर सरकार की आंख पर पट्टी बंधी है.

’मामला यह था कि यहां के पुलवामा के स्टेडियम में मैच के दौरान पाकिस्तान का राष्ट्रगान गाए जाने का आरोप था. साथ ही भारत विरोधी नारे लगाने और आतंक के कुछ आरोपियों के पोस्टर लगाने की भी बात सामने आई थी. खबर के तौर पर निश्चित रूप से यह सूचना प्रसारित की जानी चाहिए, लेकिन इसके लिए शब्दों के चयन पर विशेष ध्यान देने की जरुरत थी. इस हरकत के पीछे चंद लोग होंगे न कि सभी कश्मीरवासी, जैसाकि पत्रकार ने ‘कुछ’ अथवा ‘चंद’ शब्द का इस्तेमाल न करके सभी कश्मीरियों को गद्दार बताने का काम किया.

सितंबर 2017 में ‘ताल ठोंक के’ शो में रोहित सरदाना सांसद असदुद्दीन ओवैसी से बात करते हैं. सवाल किया की नालगोंडा में पांच मुस्लिम युवकों का इनकाउंटर किया गया, उसके लिए आपने क्या किया? ओवैसी ने जवाब दिया कि आप लोग चूंकि मेरे काम को दिखाते नहीं हैं. इसलिए आपको पता नहीं है. वैसे मैंने हुकूमत के खिलाफ माहौल बनाया. पब्लिक मीटिंग की. हाईकोर्ट में केस डाला है.

रोहित ने अपनी तरफ से जोड़ा कि आपका कहना है कि देश के खिलाफ दिए गए बयान मीडिया दिखाता है लेकिन अच्छाई करते हैं तो नहीं दिखाता है. नाराज ओवैसी ने कहा कि मैंने कब देश के खिलाफ कहा-सुबूत दीजिये और अगर सुबूत हो तो यहीं से जेल भिजवा दीजिये अन्यथा अपनी बात वापस लीजिये. इस पर रोहित गिलि गिलि अप्पा वाली स्टाइल में ओवैसी के भाई की टिप्पणियों का हवाला देने लगे.

इस पर ओवैसी ने कड़क अंदाज में कहा कि भाई ने बोला तो उनके खिलाफ केस बना. वह जेल गए. मामला अदालत में चल रहा है. लेकिन मैंने देश के खिलाफ क्या कहा इसका सुबूत आपको देना होगा. लेकिन रोहित सरदाना के पास इस बात का कोई सुबूत नहीं था. वह केवल अपनी मनगढ़ंत कहानी के जरिये जबरन वह शब्द डाल रहे थे, जिस पर उन्हें उस दिन मुंह की खानी पड़ी थी.

रोहित सरदाना की पत्रकारिता की बात हो और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) का जिक्र न आये ऐसा हो नहीं सकता है. वैसे तो उनके बारे में कहा जाता है कि जिन चंद पत्रकारों ने जेएनयू की सुपारी ली थी उसमें वह अगली पंक्ति के ‘योद्धा’ थे. यानी उन्होंने जेएनयू पर अनेक शो किये, लेकिन उदहारण के लिए एक शो का जिक्र यहां कर रहे हैं, जिसका शीर्षक था-‘गद्दारी पर सीनाजोरी क्यों?

’इसमें उनकी तरफ से सवाल उछाले गए कि जेएनयू में लगे देश के खिलाफ नारों पर हुई कार्यवाई पर राजनीति क्यों हो रही है? क्यों अभिव्यक्ति की आड़ में देश विरोधी करतूत पर पर्दा डाला जा रहा है? जिस जेएनयू से देशद्रोह की बदबू आ रही थी वहां पार्टियों को वोटों की खुशबू क्यों आने लगी?

    26  1890   25  1931
गणेश शंकर विद्यार्थी

ऐसे सवाल जब उछाले जा रहे थे तो तत्कालीन कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेता सीताराम येचुरी, तत्कालीन जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार और उमर खालिद के चित्रों का कोलाज लगातार दिखाया जा रहा था. राहुल गांधी और सीताराम येचुरी आदि नेता विद्यार्थियों का समर्थन करने जेएनयू गए थे. यही बात रोहित को पच नहीं रही थी.

इस तरह की पत्रकारिता ने जेएनयू को उस समय देशद्रोहियों के गढ़ के तौर पर प्रचारित किया था और उमर खालिद को अलगाववादी छात्र के तौर पर, लेकिन सच्चाई यह है कि वह एक सोची-समझी चाल थी, जिसमें केंद्र सरकार और उसके गोदी मीडिया ने मिलकर जेएनयू के खिलाफ एक प्रोपेगंडा बनाया था. निशाना बनाये गए जेएनयू के विद्यार्थियों के खिलाफ जांच एजेंसियों को अब तक उनके देश विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के सुबूत नहीं मिले हैं.

इस तरह से रोहित सरदाना पहले ‘जी न्यूज़’ में रहते हुए ‘ताल ठोक के’ और फिर ‘आज तक’ में आने के बाद ‘दंगल’ शो के जरिये समाज में नफरत फैलाने की पत्रकारिता का रिकॉर्ड बना रहे हैं.

उनके इस रिकॉर्ड के बारे में कुछ शो की चर्चा की गई है तो कुछ शो के शीर्षक पर भी नजर डाली जा सकती है-विकास के ‘मारे’-‘हिंदू आतंकवाद’ के सहारे, पीएम को ‘गाली’-हाफिज को ‘ताली’, ‘राष्‍ट्रवादी’ ताकतों के खिलाफ चर्च?, देशद्रोहियों के खिलाफ इंडिया की बैटिंग, ट्रिपल तलाक को आखिरी ‘तलाक’, ‘मुजरे’ कराकर कश्‍मीर को पालेगा पाकिस्‍तान?, ‘मुगल’ भारत के लिए बोझ या विरासत?

रोहित सरदाना के शो के इन विषयों को ध्यान से देखा जाये और पत्रकारिता के आईने में परखने की भूल की जाये तो समाज को विभाजित करने, दो समुदायों को लड़ाने, सामाजिक एका को तहस-नहस करने के साथ ही दूसरे देश से संबंध खराब करने आदि अनेक तमगे उनके नाम पर जायेंगे.

शायद इसी तरह की टीवी पत्रकारिता को ध्यान में रखकर पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने एक मामले को सुनते हुए टिप्पणी की थी कि ‘हम चैनलों का नाम नहीं लेना चाहते लेकिन कुछ लोगों को लगता है कि वे सिंहासन पर बैठे पोप हैं जो कोई उपदेश दे सकते हैं या फैसला सुना स‍कते हैं.’ फिलहाल तो रोहित सरदाना और उनके जैसे पत्रकार तो अपने को यही समझ रहे हैं.

इस तरह के शो देखकर लोग कितना अपने ज्ञान में इजाफा करते हैं अथवा कितना एक समाज के प्रति नफरत और घृणा से भर जाते हैं, इसकी बानगी आए दिन उस समाज के प्रति हो रही हिंसक घटनाएं दे रही हैं. इसका मतलब यह कि इस तरह के शो देखकर लोगों को कहीं से भी सूचनाएं नहीं मिलतीं.

उनके ज्ञान में इजाफा भी नहीं हो रहा. हां, इतना जरूर है कि वह खासकर युवा उकसावे में जरूर आ रहे हैं. उनका धर्म उछाल मार रहा है. पत्रकार महोदय की ऐसी पत्रकारिता पूरी तरह हेट स्पीच के ताने-बाने में बुनी होती है. वह देश और समाज के तमाम मसलों को नजरअंदाज करके हिंदू बनाम मुस्लिम की रगड़ायी करते हैं.

इससे जहां वह एक खास राजनीतिक दल और संगठन का मकसद पूरा कर रहे हैं तो वहीं व्यवसाय के स्तर पर अपने मालिकान के प्यारे बबुआ बने हुए हैं. ऐसे बबुआ वह अकेले नहीं हैं. उनके जैसे बबुआ पत्रकारों की एक पूरी जमात है. ऐसी ही जमात का एक व्हाट्सअप पोस्टर कुछ दिनों पहले शेयर हुआ था जिसमें छह पत्रकारों के फोटो इस्तेमाल किए गए हैं.

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उसकी कैचलाइन है, ‘भारत का सबसे बड़ा आतंकी संगठन लश्कर-ए-मीडिया.’ फिर पोस्टर में नीचे लिखा गया है कि ‘देश में नफरत फैलाने वाली मीडिया पर प्रतिबंध लगे.’ पोस्टर के साथ एक मैसज भी है कि ‘यह मीडिया पर सटीक सटायर है. देश को हिंसा के उन्माद में डुबो रहा है यह लश्कर-ए-मीडिया.

’खैर, इस पोस्टर का भले हम यहां उल्लेख कर रहे हैं लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर हम किसी भी मीडिया पर प्रतिबंध के हिमायती नहीं हैं, लेकिन पत्रकारिता में तटस्थता के अवश्य हिमायती हैं. उक्त पोस्टर में शामिल छह पत्रकारों के साथ रोहित सरदाना की भी मुस्कुराते हुए फोटो है, लेकिन हम यहां उनके अतिरिक्त पांच लोगों का जिक्र इसलिए नहीं कर रहे हैं, क्योंकि उनका इस मूल टिप्पणी से सरोकार नहीं है.

अगर रोहित की तरह उन्हें भी गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार के लिए चुना जाता तो वह भी टिप्पणी का मुख्य हिस्सा होते. वैसे, पत्रकारिता में यह पूरी जमात किसके इशारे पर और किसके लिए काम कर रही है वह अब छिपा नहीं है.

ऐसे में केंद्रीय हिंदी संस्थान के निदेशक प्रो. नंद किशोर पाण्डेय ने भले ही पत्रकारों को बुलाकर पुरस्कार के लिए चुने गए विद्वानों के बारे में बताया हो. चुने गए नामों पर कमेटी के सदस्यों ने भले ही मुहर लगायी हो, लेकिन रोहित सरदाना जैसे पत्रकार को गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार देने का इशारा किधर से किया गया होगा, इस पर ज्यादा दिमाग खपाने की आवश्यकता नहीं है.

गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपने ‘प्रताप’ नामक अखबार के प्रथम अंक में उसकी नीति स्पष्ट करते हुए अंतिम पैराग्राफ में लिखा था कि ‘जिस दिन हमारी आत्मा ऐसी हो जाये कि हम अपने प्यारे आदर्श से डिग जायें, जान-बूझकर असत्य के पक्षपाती बनने की बेशर्मी करें और उदारता, स्वतंत्रता और निष्पक्षता को छोड़ देने की भीरुता दिखायें, वह दिन हमारे जीवन का सबसे अभागा दिन होगा, और हम चाहते हैं कि हमारी उस नैतिक मृत्यु के साथ ही साथ हमारे जीवन का भी अंत हो जाये.

’इसी ध्येय के तहत गणेश शंकर विद्यार्थी शहीद होने तक पत्रकारिता करते रहे. अपने जीवन काल में उन्हें ऐसा अभागा दिन देखने को नहीं मिला होगा, लेकिन आजादी के सत्तर साल बाद सबका साथ-सबका विकास वाले भारत में उनकी आत्मा को या उन्हें पढ़ने-गुनने वालों को यह अभागा दिन देखने को मिल रहा है कि जिस हिंदू-मुस्लिम एका के लिए उन्होंने अपनी जान तक की परवाह नहीं की उसी ‘समरसता’ वाले हिंदुस्तान में हिंदू और मुस्लिम सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने वाली पत्रकारिता करने वाले एक शख्स को उनके नाम पर पुरस्कृत करने का फैसला किया गया है.

बेहतर यह होगा कि जिन पत्रकार महाशय को यह पुरस्कार देने का ऐलान हुआ है वह यह कहकर पुरस्कार लेने से मना कर दें कि जिस नेक उद्देश्य वाली पत्रकारिता गणेश शंकर विद्यार्थी ने की है, मैंने ठीक उसके उलट काम किया है, ऐसे में उनके नाम पर स्थापित पुरस्कार के लिए मैं खुद को योग्य नहीं पाता हूं. ऐसा करके वह शहीद स्वतंत्रता सेनानी की आत्मा के साथ न्याय कर सकेंगे. साथ ही थोड़ा अपना जमीर भी बचा सकेंगे.

साभार- द वायर(लेखक अटल तिवारी स्वतंत्र पत्रकार हैं.)

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