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प्रकृति के बीच की सड़के मौसमी, और अप्राकृतिक आॅलवेदर ? पार्ट-1

वैज्ञानिको के मतानुसार उत्तराखण्ड के पहाड़ो की उम्र कोई पांच हजार करोड़ साल की बताई जाती है, जिसे वे आज भी कच्चे पहाड़ के श्रेणी में मानते है। इन पहाड़ो के सीने पर यदि 24मीटर चैड़ी सड़क बनाई जायेगी तो क्या ये पहाड़ इतनी बड़ी सड़क को सहन कर सकते हैं? या इन कच्चे पहाड़ो की आद्रता जिस जैवविविधता से बनी है, उसे नष्ट करके आॅलवेदर रोड़ की सफलता कही जा सकती है? जी हां आॅलवेदर रोड़ की सफलता है पर जिस सामरिक दृष्टी को देखते हुए हमारे हुक्मरान इस विशालकाय सड़क को बनाने जा रहे हैं जब वहां जन जीवन ही नहीं रहेगा तो सीमाओं पर और चैकसी की आवश्यकता पड़ेगी। तात्पर्य यह है कि बिना लोगो के सामरिक पारिस्थिति को सुरक्षा देना शायद संम्भव हो पायेगा? यह सोचनीय पहलू है। अर्थात प्राकृतिक संसाधनो की बली भी चढाई गयी, पहाड़ में आपदा का घर बनाया गया और सीमायें और असुरक्षित हो जायेगी तो ऐसे में आॅलवेदर रोड़ की आवश्यकता संदेह के घेरे में है। पर इतना जरूर है कि यदि आॅलवेदर रोड़ बनकर तैयार हो जायेगी तो चारधाम यात्रा निश्चिित रूप से अबाध गति से बारहमास चलेगी। मगर जानकारो का यह भी कहना है कि मौजूदा सड़को को ही व्यवस्थित और पूर्ण किया जाये, और सड़क से संबधित विभागो में विधिवत रूप से पूर्णकालिक कर्मीयो की पूर्ती तथा आश्यक संसाधनो की पूर्ती की जाये तो पूर्व की सड़के भी किसी आॅलवेदर रोड़ से कम नहीं है।

इसे विडम्बना कहे या विकास की नई सोच। पर यहां एकदम सत्ता परिवर्तन की दिशा से विकास के मायने भी परिवर्तीत नजर आ रहे है। जैसे आॅलवेदर रोड़ की कल्पना को अमलीजामा पहनाया जा रहा है। उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध धार्मिक पर्यटक स्थलो गंगोत्री, यमनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ को आॅलवेदर रोड़ से जोड़ा जा रहा है। इस प्रकार सड़क 10 से 24 मीटर तक चैड़ी होगी, और मोटर वाहन तब फर्राटे भरेंगे तथा कभी भी उत्तराखण्ड जैसे पहाड़ी राज्य में ये सड़कें भूस्खलन के कारण बन्द नहीं होगी। ना ही वाहन दुर्घटना होगी। ऐसा इस महापरियोजना का सीधा सा जवाब है। दूसरा जवाब राजनीतिक है। की आॅवेदर रोड़ बनने के कारण राज्य में पर्यटको की संख्या में भारी इजाफा होगा, और राज्य में रोजगार के साधन बढेंगे बगैरह। इन स्थानो पर बारहमास तीर्थ-यात्रीयों के लिए आवागमन की सुगमता बनी रहेगी। पर इस अन्तराल में जो हरे पेड़ कटेंगे उनकी भरपाई कैसी होगी। ऐसा स्पष्ट नहीं बताया जा रहा है। जी हां! ऐसी इस परियोजना का सपना है।

ज्ञात हो कि आॅलवेदर रोड़ के योजनाकारो ने कभी भी ऐसा बताने का कष्ट नहीं किया कि योजना के निर्माण से प्राकृतिक संसाधनो का कितना नुकसान होगा? स्थानीय लोगो की छोटी जोत की खेती का जो अतिक्रमण आॅलवेदर रोड़ के लिए किया जायेगा, उसके बदले अमुक काश्तकार को आजीवन क्या सुरक्षा मिलने वाली है? इस निर्माण के दौरान कितने प्राकृतिक जलस्रोत नष्ट होंगे? उसका लेखा-जोखा भी इस महापरियोजना में कहीं नही मिलता है। जबकि यह महापरियोजना काश्तकारो को मुआवजा की धनराशी का हवाला देकर जन संस्तुति की बात कह रही है। यहां आॅलवेदर रोड़ से जुड़े योजनाकार बताते हैं कि पेड़ कटेंगे तो इसके बदले वृक्षारोपण दूसरे राज्यों में भारी मात्रा में किया जायेगा। पर ऐसा नहीं बताते कि जहां इस तरह का पर्यावरणीय नुकसान विकास के नाम पर हो रहा हो वहां के पर्यावरण की भरपाई कैसे होगी? ऐसे सवालो का जबाव भी नहीं आ रहा है।

जबकि ऐसा नहीं है। इसके लिए इन चार प्रमुख स्थानो को जाने वाले मौजूदा मोटर मार्गो को 10 से 24 मीटर तक चैड़ा किया जा रहा है। इस हालात में पूर्व की सड़कों के सिराहने पर बसे गांव नीचे की ओर धंसने लग गये हैं। अब ये गांव विस्थापन की कगार पर आ रहे हैं। मुआवजा की समस्याऐं विभिन्न रूपों में खड़ी हो रही है। राज्य के पर्यावरण कार्यकर्ता इस बात के लिए चिन्तित हैं कि इस चैड़ीकरण में कितने हरे पेड़ो को काटा जायेगा, और इन पेड़ो की भरपाई राज्य में कैसी होगी। यदि ऐसा भी नहीं है तो इसके पर्यावरणीय नुकसान का खमियाजा जनता क्यों भुगते और क्या इस तरह के अवैज्ञानिक विकास के माॅडल से राज्य और सरकार को भारी-भरकम फायदा दिखाई दे रहा है? ऐसे तमाम सवाल आॅलवेदर रोड़ को लेकर कसमकस बने हुए है। इधर लोग आॅलवेदर रोड़ पर उठाये जा रहे सवालों के जबाव की इन्तजारी सरकार की तरफ से कर रहे हैं। गंगोत्री घाटी के गंगोरी, भटवाड़ी, जसपुर, हर्षिल और गंगोत्री के लोग बता रहे हैं कि आॅलवेदर रोड़ के निर्माण के कारण उनके गांव का पानी और पेड़ गायब हो रहे हैं।

आॅल वेदर रोड़ का निर्माण कार्य ऋषिकेश से आरम्भ हो चुका है। मार्गों के दोनों तरफ पेड़ों का अंधाधुंध कटान चल रहा है। गंगोत्री में देवदार के हजारों हरे पेड़ों पर छपान किया गया है। सड़क चैड़ीकरण के नाम पर देवदार के अतिरिक्त बाँझ, बुराँस, तुन, सीरस, उत्तीस, चीड़, पीपल आदि के पेड़ भी वन निगम काट रहा है। निर्माण कार्य में लगी हुई भीमकाय मशीनों को देखते हुए यहां स्थिति भयावह बनी हुई है, और ऐसा महसूस हो रहा है कि इस भू-भाग मे विकास का यह नया प्रारूप स्थानीय पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जनजीवन पर भविष्य में भारी पड़ सकता है। गंगोत्री जाने वाले रास्ते मेें भटवाड़ी स्थित पूर्व में हुई सड़क चैड़ीकरण के कारण सभी आवासीय मकानो में दरारें आज भी मौजूद है। भटवाड़ी के 43 परिवार 2013 के बाद ही ऊर्जा निगम की खाली पड़ी काॅलोनी में शरणार्थी जीवन बिता रहे हैं। अब उन्हे यहाँ से इसलिए हटना पड़ेगा कि यहीं से आॅलवेदर रोड़ बननी है। वैसे भी इस क्षेत्र में आए दिन भूकंप आ रहे हैं। घरों में इतनी मोटी दरारें है जो पारदर्शी बनी है। यहाँ बारिश होने पर लोग रात भर जागते हैं। क्योंकि वे डेंजर जोन में हैं। विकास के नाम पर सड़क निर्माण के लिए कुर्बान कर दिए गए जो 43 परिवार 4 वर्षाें से जल विद्युत निगम की पुरानी काॅलोनी में रह रहे हैं उन्हें बिजली, पानी की सुविधा भी नहीं दी गई है। आॅलवेदर रोड बनने से उनकी धड़कन तेज होने लग गयी है। भटवाड़ी बाजार में वस्त्र विक्रेता मथुरा दत्त रतूड़ी को आशंका है कि इस बार आॅल वेदर रोड के रूप में जो सड़क का चैड़ीकरण होगा उसमें उनकी दुकान भी नहीं बचेगी। भटवाड़ी के ही अनुराग रतूड़ी ने कहा कि सड़क पहले से छः मीटर चैड़ी थी जो अब 18 मीटर चैड़ी होेगी। इसका मलवा और इस अन्तराल में कटने वाले पेड़ो की भरपाई कौन करेगा? भटवाड़ी के ग्राम प्रधान संजीव नौटियाल ने कहा कि तिहार और भंगेली जैसे गांवों के लोग लोहारीनाग पाला जल विद्युत परियोजना से प्रभावित है। उन्हें अभी तक न्याय नही मिला है। गंगोत्री घाटी में लोग केवल सड़क चैड़ीकरण से उत्पन्न होने वाले संभावित खतरों से ही आशंकित नहीं हैं बल्कि जसपुर, पुराली जैसे आधा दर्जन गांवों के लोगों को एक नए खतरे में डाल दिया है। हर्षिल और भटवाड़ी के बीच के इस क्षेत्र में वर्तमान में हाइवे सुक्खी बैंड से होकर ऊंचाई की ओर चढ़ता हुआ जसपुर पुरोली गांवों को छूता हुआ नीचे झाला गांव में उतर जाता है, लेकिन अब सरकार द्वारा कराए गए नए सर्वे के मुताबिक सुक्खी बैंड से झाला तक सीधे भागीरथी के किनारे-किनारे सड़क बनाई जाएगी। लगभग 20 वर्षाें से प्रस्तावित इस सड़क का ग्रामीण लगातार विरोध कर रहे हैं। इधर उत्तरकाशी के वन प्रभागीय अधिकारी संदीप कुमार ने भी सीधे सुक्खी बंैंड से झाला पुल के लिए सड़क निर्माण होने और पेड़ों की गिनती और छपान की पुष्टि की है।

दिलचस्प यह है कि सुक्खी बैंड से झाला तक सड़क बनने पर हांलाकि 5-6 किमी हाइवे की दूरी घट जाएगी लेकिन ग्रामीणों को संदेह है कि भागीरथी के किनारे-किनारे गांवों की तलहटी में सड़क काटने से भूस्खलन और भंूकंप की समस्या बढ़ेगी। भागीरथी के किनारे शताब्दियों से पल रहे हजारों देवदार आदि प्रजाति के हरे पेड़ इस नई सड़क को बनाने के लिए काट दिए जाएंगे। गंगोत्री जाने वाले यात्रियों के कारण जसपुर में जो छोटा सा कस्बा आबाद हुआ था सो आॅलवेदर रोड के बनने से समाप्त हो जाएगा। जसपुर गांव के विनोद का कहना है कि जहां सरकार लोगों को सड़कों से जोड़ने की बात कर रही हैं वहीं उन्हें सड़क से अलग-थलग कर रही हैं। यहाँ दुकान चला रहे जोत सिंह का कहना है, इस सड़क को बनाने के लिए लोगों ने पहले भी बिना मुआवजा के वार्डर सुरक्षा के नाम पर जमीनें दी थी। जोत सिंह याद करते हैं, जब गंगोत्री हाइवे के लिए जमीन चाहिए थी तब तत्कालीन एसडीएम श्री मर्तोलिया ने गांव में ही पांच दिन तक जमीन अधिग्रहण के लिये डेरा डाल दिया था। इस प्रकार गांव के लोग दो बार चैडी़करण के लिए जमीनें दे चुके हैं। एक ओर तो सरकार ने गांव के लोगों की जमीनें सड़क चैड़ीकरण के लिए अधिगृहित की हुई है और दूसरी ओर एक नई सड़क बनाने की तैयारी भी चल रही है। सुक्खी के ग्राम प्रधान मुरारी सिंह का कहना है, सड़क पूर्व की भान्ति रहनी चाहिए, जहां पेड़ भी अधिक नहीं कटेगें। जबकि इसके लिए वे चार बार दिल्ली की चैखट पर फरियाद कर चुके हैं। सुक्खी बैण्ड से झाला तक नए मोटर मार्ग में लगभग 5000 देवदार के पेड़ कट सकते हैं। सुक्खी टाॅप से गंगोत्री के बीच का 30 किमी का भाग देवदार का घना जंगल है। यह भाग हर्षिल का सर्वोत्तम हरियाली वाला क्षेत्र भी है। हर्षिल के इसी भाग में आसपास केवल 5-7 किमी के दायरे में ही उत्तरकाशी-गंगोत्री हाइवे के चैड़ीकरण के लिए पहले ही 6000 से अधिक देवदार के पेड़ों को काटने के लिए छापा गया है।

हर्षिल की ग्राम प्रधान बसंती नेगी कहती हैं कि इस क्षेत्र में लगातार जंगलों के काटने से अब हर्षिल और गंगोत्री में भी तेज गर्मी पड़नी शुरू हो गई है। समय पर बर्फ का गिरना बन्द हो गया है। बुरांश का फूल समय से पहले फूल देने लग गया है। अधाधुन्ध पेड़ कटान के कारण जलवायु में काफी परिवर्तन दिखाई दे रहा है। और जब आॅलवेदर रोड़ के लिए यहां पेड़ कटने आरम्भ होंगे तो इस क्षेत्र में हो रहे जलवायु परिवर्तन के खतरे गंगा के आबाद क्षेत्र में दिखाई ही नहीं देंगे बल्कि उसके दुष्परिणाम भी आयेंगे। जैसा कि महसूस हो रहा है। सुक्खी के पूर्व प्रधान गोविन्द सिंह का कहना है कि सड़क चैड़ीकरण के नाम पर जो पेड़ काटे जा रहे हैं उनकी जगह नए पेड़ों को पनपने में, पीढ़ियां लग जाएंगी। प्रहसन है कि एक तरफ तो केन्द्र सरकार ‘‘नमामि गंगे जैसी परियोजना’’ चला रही है वहीं दूसरी ओर गंगा के किनारे को हरा-भरा करने के बजाय उसे उजाड़ा जा रहा है। वरिष्ठ अधिवक्ता डाॅ. नागेन्द्र जगूड़ी ने कहा कि गंगोत्री क्षेत्र में केवल सड़क चैड़ीकरण के लिए पेड़ काटे जाने की समस्या नहीं है बल्कि सड़क निर्माण का मलवा और बोल्डर जिस तरह से सीधे नदियों व जंगलो के ढलान में डाले जाते हैं उससे सड़क के किनारे का जितना भी जंगल और जीवन होता है, सारा ही नष्ट हो जाता है। मतलब साफ है कि सड़क निर्माण के लिए जितने पेड़ों का छपान कर बताया जा रहा है उससे कहीं अधिक पेड़ मलवा, पत्थर और बोल्डर गिरने से दब और टूट जायेंगे। ऐसे में प्राकृतिक संसाधनो का दुगुना नुकसान होगा। यहां पूर्व के उदाहरण है कि मलवे से दबने के कारण ही जड़ीढ़ूंग और धरासू के आसपास का पूरा जंगल ही समाप्त हो गया है। मुखबा की ग्राम प्रधान अनिता राणा का कहना था कि मैदान के मानकों के हिसाब से पहाड़ों में सड़क निर्माण की सोच को बदलना होगा। गंगोत्री क्षेत्र जो पर्यावरण के हिसाब से अति संवेदनशील है वहाँ 18-24 मीटर चैड़ी सड़क बनाने पर सवाल खड़ा होना लाजमी है।

बता दें कि भटवाड़ी के आसपास अनेक स्थानों पर उत्तरकाशी-गंगोत्री सड़क की चैड़ाई चार से 5-6 मीटर तक पायी गई। वहीं हर्षिल के आस-पास यही सड़क 6-6.5 मीटर चैड़ी है। लेकिन गंगोत्री से हर्षिल की ओर 10 किमी के क्षेत्र में बीआरओ द्वारा आॅलवेदर रोड के लिए घोषित 18-24 मीटर चैड़ी सड़क तैयार कर डाली है। गंगोत्री में मौजूद संत समाज आॅलवेदर रोड के नाम पर हो रहे पहाड़ के इस विनाश के लिए चिन्तित है। गंगोत्री में दो दशक से अधिक समय से रह रहे स्वामी कृष्णा प्रपन्नाचार्या का कहना है कि गंगोत्री में बर्फबारी लगातार कम हो रही है। अब तो यहां दोपहर में मैदानों के जैसी ही तेज धूप लगती है। उन्होंने कहा कि गंगोत्री के तापमान पर घाटी में हो रहे वृक्षों के कटान का असर दिखने लगा है। जबकि दूसरी ओर डीएफओ उत्तरकाशी ने बताया कि केन्द्र सरकार ने नमामि गंगे परियोजना के अंतर्गत 30,000 हैक्टेयर जमीन पर वृक्षो के रोपण का लक्ष्य रखा है। यह कैसा विरोधाभास है कि गंगा के उद्गम स्थल में गंगोत्री से हर्षिल गांव के बीच हजारों जिंदा पेड़ों को काटने के लिए चिन्हित किया गया है। चट्टानों की ब्लास्टिंग के लिये जोरदार विस्फोटों का प्रयोग भी धड़ल्ले से हो रहा है। बीआरओ भी सड़क निर्माण के दौरान मलबा को भारी मशीनों से खिसकाकर भागीरथी में डाल रहे हैं। इस तरह के हालात पूरी भागीरथी घाटी में सड़क चैड़ीकरण के कारण पूर्व से बने है।

नदी बचाओ अभियान के संयोजक, रक्षासूत्र आन्दोलन के प्रणेता सुरेश भाई, जमनालाल बजाज पुरूस्कार से सम्मानित व वरिष्ठ सर्वोदय कार्यकर्ती राधा भट्ट ने केन्द्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गडकरी से आॅलवेदर रोड को लेकर मुलाकात की है। उन्होंने प्रस्तावित और निर्माणाधीन आॅलवेदर रोड की मौजूदा पारिस्थितिकी को एक अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी के सामने रखी। केन्द्रीय मंत्री श्री गडकरी ने उन्हे आश्वासन दिया कि पर्यावरण की मूल भावना को इस परियोजना में मुख्य स्थान है। कहा कि नुकसान होगा भी तो भरपाई की जायेगी। आश्यकता पड़ी तो योजना में फेरबदल भी किया जायेगा।


प्रेम पंचोली
प्रेम पंचोली
ब्यूरो चीफ
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