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काला ही सत्य है ।

फिल्म ‘काला’ करियन पी. रंजीत द्वारा निर्देशित है । जिसमें रजनीकांत ने मुख्य भूमिका निभाई है। रजनीकांत की इससे पहले मैंने कई फिल्में रोबोट, कबाली आदि देखी है। वैसे तो दक्षिण की फिल्में खास स्टाईल और मारधाड की होती है। जो यह भी है। परंतु रजनीकांत की खास बात उनका स्टेंट और सिगरेट को उंगली पर नचाना और नचाकर होठों से लगाना विशेष है । मुझे उनकी फिल्में अच्छी लगती है।

कई वर्ष पहले मैं और मेरे तीन साथी एल. टी. सी. लेकर तमिलनाडु घुमने गये थे। मेरी जिज्ञासा रजनीकांत के बारे में लोगों के विचार को जानने की भी थी। हमें जो अपने वाहन से घुमा रहा था वह ड्राईवर और दूसरे लोगों के बताने पर पता चला कि रजनीकांत को यहां की जनता सर आखों पर रखती हैं। कई लोगों ने तो यह भी बताया कि उनके नाम पर मंदिर भी बनाये गये हैं। खैर ! मंदिर वाली बात मुझे ठीक नही लगी। इंसान को इंसान ही बना रहने दिया जाना चाहिए; देवता नही बनाना चाहिए। नही तो देवता पगला जाता है । अब बात फिल्म पर हो तो ज्यादा ठीक है । 

फिल्म की शुरूआत मानव सभ्यता के आदिकाल से शुरू होती है। जहां मनुष्य अपनी जरूरत के हिसाब से जमीन का उपयोग करता है परंतु समय के साथ मनुष्य में ज्यादा की चाहत  के कारण जमीन को कुछ खास वर्ग और समाज ने अपने अधीन कर लिया। आगे चलकर यही खास वर्ग और समाज ने अपनी सहुलियतों के लिए जाति और जातिवाद को बढावा दिया। जिसके कारण देश की बहुत बड़ी आबादी जिसे हम दलित कहते हैं सामने आयी। उसी समाज का प्रतिनिधित्व करता है ‘काला’ अर्थात् फिल्म का नायक रजनीकांत। 

नायक का परिवार दक्षिण भारत से मुंबई आता है अपने लालन-पालन के लिए। जहां नायक के पूर्वज और दूसरे लोग एक दलदल जमीन को रहने लायक बनाते है जिसका नाम -धारावी है। यह मुंबई का स्लम एरिया है। जिस पर क्षेत्र के राजनेता नाना पाटेकर अर्थातृ हरि मल्टीस्टोरी बनाना चाहता है और क्षेत्र के दलितों, पिछड़ों को जमीन से बेदखल करना चाहता है । नायक काला राजनेता के मंसूबों को पूरा नही होने देता और विरोध की आवाज बनकर सामने आता है । काला के पास केवल धारावी की जनता के साहस और सहयोग के अलावा और कुछ नहीं है जबकि राजनेता हरि के पास राज्य का शासन-प्रशासन, धन दौलत, और मसलपावर सब कुछ है। अर्थात् भारतीय राजनीति का यथार्थ चित्रात्मक शैली में चित्रित होता है। एक तरफ काला है तो दूसरी तरफ हरि।

काला नायक आंबेडकरवादी संस्कृति का संवाहक बना है तो हरि हिन्दुवादी संस्कृति का। निर्देशक ने फिल्म की शुरूआत में ही दोनों के ‘कल्चर’ को बेबाकी से प्रस्तुत कर दिया। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि भारतीय सिनेमा के पूरे इतिहास में यह पहली फिल्म होगी जिसमें दलितों को आंबेडकरवादी विचारधारा के धरातल पर दिखाया गया है नही तो दलितों को गांधीवादी विचारधारा से दिखाने का प्रचलन था। जहां दलित पात्र या तो गिड़गिड़ाता था, रोता था। वह अपनी वर्तमान स्थिति को ईश्वरीय विधान मानकर चुप लगा जाता था। दलित पात्र की अनेक पीढ़ियां मानसिक और शारीरिक गुलामी को जीने के लिए पैदा होती थी जबकि उनकी महिलाओं के साथ गांव का दबंग ठाकुर और मंदिर का धूर्त पूजारी बलात्कारी की भूमिका में होता था। मानो कि भारत के सम्पूर्ण दलित समाज का यही सच हो ? जबकि दूसरी तरफ दलितों का दूसरा सच उनका संघर्षमय और श्रमणशील इतिहास भी रहा है। लोकायत के समय से ही देश के बहुजनों का गौरवमय इतिहास रहा जिसको भारतीय सिनेमा ने नहीं दिखाया हैं। 

भारतीय सिनेमा के वर्णवादी और जातिवादी मानसिकता ने हिन्दूवादी पत्रकारिता की तरह डॉ. आंबेडकर के शब्दों में कहूं -‘पत्र के क्लर्कों द्वारा लिखा गया लेखन पत्र के क्लर्कों के लिए’ की तर्ज पर केवल अपने ‘वर्चस्व’ और मनोरंजन का माध्यम बना लिया। इन जातिवादियों ने पत्रकारिता और सिनेमा को लोकतांत्रिक, स्वतंत्र और निष्पक्ष बनने ही नहीं दिया । वह भलीभांति जानते है कि दर्शकों की मानसिकता को बदलने में यह दोनों माध्यम ही सबसे ज्यादा कारगर है। इसीलिए आप देखते होंगे कि भारत का मीडिया भूत-प्रेत, देवी-देवता, नागिन, भाग्यफल, सास-बहू, बाबाओं आदि कार्यक्रमों को ही ज्यादा परोसता है। अगर भारतीय सिनेमा के सिपहसालार सच दिखाते तो दो संस्कृतियों की टकराहट सामान्य जनता को जानने को मिलती? फिल्म में क्रांति का विचार केन्द्र बौद्ध विहार प्रतीक के रूप में सामने आता है। जहां पर नायक अपने आंदोलन की घोषणा करता है। एक तरह से बौद्ध संस्कृति इस देश की पहली वह संस्कृति है जहां पर दलितों, महिलाओं, आदिवासियों, पिछड़ों को एक मंच मिलता है। जो वर्तमान में बहुजन संस्कृति के रूप में नजर आती है । अतः देर ही सही दलितों की साहस की गाथा को पहली बार ‘काला’ प्रस्तुत करती है। 

भारतीय संस्कृति में रंगों को लेकर अपना सौन्दर्यबोध है। जहां एक तरफ काला रंग अंधकार का प्रतीक है जबकि दूसरी तरफ सफेद रंग सात्विक प्रवृति का। काला इस सौन्दर्यबोध को तोड़ता है। नायक रजनीकांत काला है । वह दक्षिण भारत का रहने वाला है। वहा के लोग भोगोलिक दृष्टि से श्याम रंग के होते हैं। जिनको लेकर उतर भारत के लोग उनको मजाक की दृष्टि से देखते है। मुझे शरद यादव की वह बहस याद आती है; जहां उन्होंने बाजार में बिकने वाली क्रीम जो गोरा बनाती है। जो दावे तो बहुत करती है परंतु उसके पीछे बहुत बड़ा बाजार केन्द्र में होता है। जिसको लेकर भारतीय राजनीति में बड़ा बवाल मचा था। तब शरद यादव ने श्याम रंग को लेकर अपनी अवधारणाएं प्रस्तुत की थी। एक जगह दिवंगत वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर ने कहा था कि मुझे तो काला रंग ही सत्य प्रतीत होता है। सफेद तो कुछ समय का सहायक होता है अंत में तो काला ही सार्वभौमिक बन जाता है। तभी तो फिल्म में विशेष रूप से काला और हरि के संवाद रखे गये है कि काला रंग श्रमणशील के प्रतीक है। जहां देश की सबसे बड़ी आबादी सर्दी, गर्मी की चिलचिलाती धूप में हाड़तोड़ मेहनत करके अपना जीवन-यापन करती है। जबकि दूसरी तरफ गोरे रंग का परजीवी संस्कृति के प्रतीक का द्योतक होता है। आप देखें कि पूरी फिल्म में काला केवल काली रंग की लुंगी और कमीज पहनता है। जबकि बनियान नीले रंग की। नीला रंग डॉ. आंबेडकर और उनकी विचारधारा का प्रतीक है। जो आज बहुजन राजनीति का पर्याय बन चुका है। फिल्म के अंत में लाल रंग के महत्व को बताया गया है। जो क्रांति का प्रतीक है। काला-नीला-लाल-सफेद आदि रंग अनेक विचारधाओं के द्योतक बन जाते हैं। कह सकते है कि पहली बार किसी फिल्म में रंगों के माध्यम से विचारों को प्रस्तुत किया गया है। रंगों के यह प्रतीक और बिंब चित्रात्मक शैली में सामने आते हैं जो फिल्म को महत्वपूर्ण बना देते है। 

लुंगी दक्षिण भारत की प्रतीक है। शाहरूख खान तो लुंगी डांस पर सबको नचा ही चुके हैं। परंतु यहा लुंगी बताती है कि भारत किसी एक संस्कृति का देश नही है बल्कि यहां अनेक संस्कृति हैं। जिसमें लुंगी भी है। एक समय तो मुंबई पर लुंगी वालों का शासन रहा है। कहीं न कहीं उस लुंगी वर्चस्व को भी काला दिखाने का प्रयास करता है। जब भी कभी मारधाड वाले दृश्य आते हैं तब नायक अपनी लुंगी को हल्का से झटका देकर फाइट करता नजर आता है। 

फिल्म एन.जी.ओ. की राजनीति की सच्चाई को प्रस्तुत करती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जो काम सरकार को करना था उनकी जगह एनजीओं ने ले ली है। यह एनजीओं एक तरह से ब्रोकर का काम करते हैं। जब से देश में नव-उदारवादी, पूंजीवादी व्यवस्था लागू हुई है तब से सरकारों ने जनता की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़कर यह काम एनजीओं को सौप दिया हैं। यह एनजीओं जनता को प्रलोभन देकर देशी-विदेशी पूंजी को डकार जाते हैं। जरीना और उनके दूसरे सहयोगी इन्हीं एनजीओं के प्रतीक हैं। जो जमीन सीधे-सीधे सरकार नहीं ले पा रही है उस काम को एनजीओ से करवाने का रास्ता निकाला जाता है। धारावी की जनता को प्रलोभन दिया जाता है कि धोबीधाट खत्म करके यहां मल्टीस्टोरी बनाई जाएगी। जिसमें सभी को एक फ्लैट दिया जाएगा। नायक काला के पास अनुभव संचित ज्ञान है, जो बताता है कि अगर धारावी की जनता ने यह जमीन बिल्डर को दे दी तो वह अपनी जड़ों से बेदखल हो जाएगा। तब उसके पास कुछ नहीं बचेगा न अपनी संस्कृति और न अपने रोजगार।

नवें दशक के बाद के भारतीय समाज के विस्थापन को हम सभी जानते हैं। काला तभी तो अपने बेटे लेनिन को समझाता है कि श्रमिकों और दलितों को समूह बनाकर एकता बद्ध होकर रहना चाहिए। जो जातिवादी समाज हमारे घर का पानी नही पी सकता वह हमें कोई सहूलियत नही दे सकता। यह तो संविधान का तकाजा है कि दलित यहां हैं, नहीं तो उन्हें कहीं ओर फेंक दिया जाता। ‘जड़ों को पहचानों और उन्हें मजबूत करो, तभी दलित समाज जिंदा रह सकता हैं।

काला नायक दलित समाज के नेतृत्व का प्रतीक बन गया है। दलित राजनीति में डॉ. आंबेडकर मील का पत्थर बनकर सामने आते है। जिसका नेतृत्व कुछ हद तक कांशीराम ने पूरा किया था। जिस प्रकार काला की पत्नी और बेटा दलितों के अधिकारों के लिये शहीद होते हैं उसी प्रकार के नेतृत्व की जरूरत आज दलितों को हैं। जो उनको जड़ों से उखड़ने से बचाये और संविधान सम्मत उनके अधिकारों को दिलवायें। एक बात जो मैं यहां कहना चाहता हूं कि रजनीकांत ने भारतीय सिनेमा में अपना नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज करा दिया है। जो काम सदी के मिलनियम स्टार नहीं कर पाये वह काम दक्षिण भारत के नायक ने कर दिया। अखिल भारतीय स्तर पर जब तक सिनेमा रहेगा तब तक यह पात्र जिंदा रहेगा। 

अंत में काला करियन सभी रंगों के माध्यम से भारत की सांस्कृतिक विविधताओं को अपने अंदर समेट लेता है। काला अनपढ़ होने के बावजूद बहुजनों को अपने बच्चों को पढ़ाने पर जोर देता है। शिक्षा ही वह शक्ति है जो सही और गलत की परख कराती है। इसीलिए बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर ने शिक्षा को शेरनी का दूध कहा था। बहुजन अपने अस्तित्व को बचाने के लिए आंदोलन करता हैं। अर्थात् बहुजन की संस्कृति कभी भी हिंसा की नही रही है। यह आंदोलन काला के खत्म होने के बावजूद भी धारावी की जनता जारी रखती है। जो भविष्य की राजनीति को भी तय करती है। जय भीम के नारे को जनमानस में काला संचारित कर देता है। 

लेखक अश्वनी कुमार दिल्ली विश्वविद्यायल में हिन्दी प्राध्यपक है ।


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2 Comments

  •  
    Ajmer singh Kajal
    2018-06-22

    'काला' नामक फ़िल्म ने सामाजिक सांस्कृतिक बदलाव के नए प्रतीक उठाकर सदियों से प्रताड़ना झेल रहे राष्ट्रीय उपस्थिति वाले व्यापक जन-समुदाय (बहुजन) में उभर चुकी संघर्षी चेतना को बेहतरीन ढंग से दिखाया है। सदियों की पीड़ा पर निकले आंदोलन को चित्रित करने वाली यह पहली सशक्त फ़िल्म है जिसमे जय भीम का उदघोष और संघर्ष सम्पूर्ण समाज के सामने आया है। जनता फ़िल्म देखना चाहती है लेकिन एनसीआर सहित हिंदी पट्टी के सभी सिनेमाघर में यह कहीं नहीं है। एक सप्ताह में ही इसे हटा दिया गया। डॉ.अश्वनी कुमार को विचारोतेजक आलेख के लिए बधाई। जय भीम।

  •  
    Dr. Sangh Mittra
    2018-06-20

    Very well written. You may write something for Dr. B. R. Ambedkar International Centre Delhi under MI sorry of Social Justice. Sangh Mittra

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