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2011 की जनगणना के आधार पर एससी/एसटी का आरक्षण बढ़े

(आरक्षण की जगह जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व सभी सामाजिक श्रेणियों को मिले)  

आरक्षण की शुरुआत कैसे हुई
आजादी के पहले प्रेसिडेंसी रीजन और रियासतों के एक बड़े हिस्से में पिछड़े वर्गों (बीसी) के लिए आरक्षण की शुरुआत हुई थी। महाराष्ट्र में कोल्हापुर के महाराजा छत्रपति साहूजी महाराज ने 26 जुलाई 1901 में पिछड़े वर्ग (आज का एससी/एसटी/ओबीसी) से अशिक्षा दूर करने और राज्य प्रशासन में उन्हें उनकी हिस्सेदारी (नौकरी) देने के लिए आरक्षण शुरू किया था। यह भारत में दलित वर्गों के कल्याण के लिए आरक्षण उपलब्ध कराने वाला पहला सरकारी आदेश है। इसी आधार पर 1908 में अंग्रेजों ने प्रशासन में हिस्सेदारी के लिए आरक्षण शुरू किया। इसी सिद्धांत के आधार पर तीसरी जगह अगस्त 1921 में मद्रास प्रेसिडेंसी द्वारा एक सरकारी आदेश (जीओ सं 613) के जरिये पहला सांप्रदायिक अधिनियमन 1921 सरकारी नौकरियों में जाति-आधारित आरक्षण हेतु लागू किया। जिसमें गैर- ब्राह्मणों के लिए 44 फीसदी, ब्राह्मण, 16 फीसदी आरक्षण दिया गया। चौथी बार 1935 में भारत सरकार अधिनियम 1935 में सरकार और सरकारी नौकरियों में जाति-आधारित आरक्षण को सुनिश्चित किया गया। भारतीय अधिनियम 1935 के तहत 'दलित वर्ग' को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को “पिछड़ा वर्ग” नाम दिया गया। 1942 में “शैडूल्ड कास्टस फैडरेशन” के एजेंडे के माध्यम से बाबा साहब अम्बेडकर ने सरकारी सेवाओं और शिक्षा के क्षेत्र में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण की मांग उठाई।
 
क्या था आरक्षण का उद्देश्य और मॉडल
आरक्षण का उद्देश्य केंद्र और राज्य में सरकारी नौकरियों, कल्याणकारी योजनाओं, चुनाव और शिक्षा के क्षेत्र में हर वर्ग की हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के लिए की गई। जिससे समाज के हर वर्ग को आगे आने का मौका मिले। सवाल उठा कि आरक्षण किसे मिले, इसके लिए पिछड़े वर्गों को तीन कैटेगरी अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में बांटा गया।

2011 के आंकड़ों के आधार पर आरक्षण की समीक्षा और संशोधन की आवश्यकता
भारतीय जनगणना में 1931 के बाद, गैर अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जानजाति के लिए कोई जाति आंकड़े एकत्र नहीं किए गए हैं। मंडल आयोग ने 1931 की जनगणना के आधार पर 52.1 फीसदी ओबीसी आबादी का अनुमान लगाया था। ओबीसी आबादी की गणना के लिए मंडल आयोग द्वारा उपयोग किए गए तर्क पर आज भी विवाद है। अनेक जनसंख्या विशेषज्ञ और शोधकर्ता मानते हैं कि ओबीसी के जातीय आंकड़ों के लिए कोई अनुभवजन्य आधार होना चाहिए जिसके लिए जाति जनगणना होना आवश्यक है।

वर्तमान में केंद्र सरकार की नौकरियों में मिलने वाले आरक्षण का कोटा तीनों पिछड़े वर्गों को उनकी वर्गीय जनसँख्या के अनुपात से काफी कम मिल रहा है। वर्तमान में 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में अनुसूचित जातियों की कुल जनसंख्या 16.6 फीसदी है जबकि आरक्षण कोटा मात्र 15 फीसदी मिल रहा है, अनुसूचित जनजातियों की कुल जनसंख्या 8.6 फीसदी है जबकि आरक्षण कोटा मात्र 7.5 फीसदी मिल रहा है और अन्य पिछड़ा वर्ग की कुल जनसंख्या 52.1 फीसदी है जबकि आरक्षण कोटा मात्र 27 फीसदी मिल रहा है। अब चौथा वर्ग जो सामान्य अर्थात गैर आरक्षित श्रेणी के नाम से जाना जाता है, उसकी कुल आबादी मात्र 22.7 फीसदी बचती है जिसमें धार्मिक अल्पसंख्यक वर्ग की गैर आरक्षित आबादी भी शामिल है, उनको 50.5 फीसदी आरक्षण कोटा मिल रहा है, जो एक अन्यायपूर्ण वितरण है। इसलिए उपरोक्त आरक्षण की समीक्षा करके जनसंख्या के सामाजिक आधार पर प्रतिनिधित्व कोटा मिलना चाहिए। वर्तमान में तमिलनाडु में सबसे अधिक 69 फीसदी आरक्षण लागू किया गया है।
 
आजादी के बाद पहली बार 2021 में होगी जातिगत जनगणना
देश में सन 1931 की जनगणना में आखिरी बार एकत्रित किए गए थे जातिगत आंकड़े, इसी के आधार पर देश में ओबीसी की जनसँख्या 52 फीसदी है। परन्तु मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में आरक्षण विरोधियों ने केस दायर कर दिया था। इस केस को इंदिरा साहनी केस के नाम से जाना जाता है, जिसकी सुनवाई का फैसला सुप्रीमकोर्ट ने 1992 में दिया, जिसके तहत ओबीसी को 52 फीसदी की जगह मात्र 27 फीसदी आरक्षण दिया।
 
पिछड़े वर्गों की यह मांग जोर पकड़ने लगी है कि अब आरक्षण उनकी जनसँख्या के अनुपात में होना चाहिए। सरकार कहती है कि उनके पास जनसँख्या के जातिगत आंकड़े नहीं हैं। जबकि, इस विषय पर यूपीए की सरकार ने जतिगत गणना 2011 में कराये जाने का का फैसला लिया था, जिसके आंकड़े 2014 में आ चुके हैं। मोदी सरकार ने उक्त आंकड़े नीति आयोग को संवीक्षा हेतु दिए थे। यह जातिगत गणना के आंकड़े सरकार ने जनता से आजतक छुपा कर क्यों रखे हैं? वर्तमान सरकार ने साल 2021 की जनगणना में आजाद भारत में पहली बार अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) से संबंधित आंकड़े एकत्रित किए जाएंगे। गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने 2021 की जनगणना के लिए तैयारियों की समीक्षा की, जिसके बाद ओबीसी आंकड़े एकत्रित करने के फैसले का खुलासा किया गया।
 
गृह मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा, “पहली बार ओबीसी से संबंधित आंकड़े भी इकट्ठा करने का विचार किया गया है”। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन की एक शाखा राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) ने 2006 में देश की आबादी पर नमूना सर्वेक्षण रिपोर्ट की घोषणा की और कहा कि देश में ओबीसी आबादी कुल आबादी की करीब 41 फीसदी है। एनएसएसओ ने ग्रामीण इलाकों में 79,306 परिवारों और शहरी इलाकों में 45,374 परिवारों की गणना की। नमूना सर्वेक्षण के आंकड़ों के आधार पर कोई राष्ट्रीय नीति नहीं बनाई जा सकती सैपल सर्वे के आंकड़े पूर्णतः विश्वसनीय नहीं होते हैं।

आरक्षण से जुड़े कुछ अन्य तथ्य
15(4) और 16(4) के तहत अगर साबित हो जाता है कि किसी समाज या वर्ग का शैक्षणिक संस्थाओं और सरकारी सेवाओं में उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है तो आरक्षण दिया जा सकता है। 1930 में एच. वी. स्टोर कमेटी ने पिछड़े जातियों को 'दलित वर्ग', 'आदिवासी और पर्वतीय जनजाति' और 'अन्य पिछड़े वर्ग' (OBC) में बांटा था। भारत में 50 प्रतिशत से अधिक नौकरियों का हिस्सा अघोषित रूप से गैर आरक्षित वर्ग खासतौर से ब्राह्मण वर्ग के पास जा रहा है। परन्तु यही वर्ग नहीं चाहता है कि आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था जारी रहे। मंडल कमीशन के आंकलन के अनुसार अन्य पिछड़े वर्ग की आबादी 52.1 प्रतिशत है। इस समय मांग चल रही है कि पिछड़े वर्गों में जाट किसान, पाटीदार पटेल, मराठा कुनबी और आंध्र प्रदेश के कापू समाज को जोड़ना चाहिए क्योंकि उक्त सभी जातियां शूद्र वर्ण का हिस्सा रही हैं। अगर इन चारों जातियों को अन्य पिछड़े वर्ग में जोड़ दिया जाता है तो इनका जनसँख्या प्रतिशत 52 से बढ़ कर 60 फीसदी से ऊपर हो जायेगा। इसमें अनुसूचित जातियों और जन जातियों की 25.2 फीसदी वर्तमान आबादी को और जोड़ दिया जाये तो आरक्षित वर्ग की आबादी 85 फीसदी से ऊपर हो जाएगी। इस लिए आरक्षण की समीक्षा करके जनसँख्या के अनुपात में समाज के सभी सामाजिक वर्गों को शत-प्रतिशत प्रतिनिधित्व का प्रावधान कर देना चाहिए।

2011 की जनगणना के आधार पर एससी/एसटी का आरक्षण बढ़े
लोक सभा और राज्यों की विधान सभाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की आरक्षित सीटों को 2001 की जनगणना के आधार पर बढ़ाया जा चुका है। परिसीमन एक्ट 1972 के अनुसर 543 लोक सभा के सदस्यों में आरक्षित श्रेणी के सदस्यों की संख्या 1971 की जनगणना के आधार पर 120 थी। जिसमें 423 सदस्य सामान्य श्रेणी, 79 सदस्य अनुसूचित जातियों की श्रेणी से तथा 41 सदस्य अनुसूचित जनजातियों की श्रेणी से थे। दोनों को मिलाकर 22.1 प्रतिशत कोटा और 120 सीटें आरक्षित थीं।

परिसीमन एक्ट 2002 के अनुसार 2001 की जनगणना को आधार बनाया गया, जिसके तहत 543 लोक सभा के सदस्यों में 84 सदस्य अनुसूचित जातियों की श्रेणी के और 47 सदस्य अनुसूचित जनजातियों की श्रेणी के थे। दोनों को मिलाकर 24.1 प्रतिशत कोटा मिला है और 131 सीटें दौनों वर्गों को आरक्षित हैं। यदि राजनीतिक आरक्षण में 2011 की जनगणना को आधार बनाया जाय तो एससी और एसटी वर्गों को 131 आरक्षित सीटों के स्थान पर 137 सीटें आरक्षित हो जाएंगी।
 
संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को सामाजिक आधार पर नौकरियों में आरक्षण भी जनसंख्या के अनुपात में मिलता है। वर्तमान में केंद्र सरकार की नौकरियों में 15 प्रतिशत कोटा अनुसूचित जातियों को तथा 7.5 प्रतिशत कोटा अनुसूचित जनजातियों को मिल रहा है, जो 1971 की जनगणना के आधार पर है। अब चूँकि राजनीतिक प्रतिनिधयों की संख्या 2001 की जनगणना के आधार पर बढ़ाई जा चुकी है, तो नौकरियों में भी 2011 की जनगणना के आधार पर 16.6 प्रतिशत अनुसूचित जातियों को और 8.6 फीसदी अनुसूचित जनजातियों को आरक्षण कोटा मिलना चाहिए।

इन संशोधनों को क्रियान्वित कराने हेतु एससी और एसटी कमीशनों के चेयरमैनों को एक्शन लेना चाहिए। इन दौनों वर्गों के चुने हुए प्रतिनिधियों को इस विषय पर संज्ञान लेकर पार्लियामेंट में इस प्रश्न को उठाना चाहिए। तमाम सामाजिक संगठनों को इस विषय पर संज्ञान लेकर जन आंदोलन चलना चाहिए। तमाम पत्रकार बंधुओं को अपने पत्रों में इस विषय को स्थान देना चाहिए और सोशल मीडिया पर इस विषय पर चर्चा चलनी चाहिए।
 
के. सी. पिप्पल (IES Retd)
संस्थापक
राष्ट्रीय समग्र विकास संघ  


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