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साल 2017 की सियासी यादें....

राजनीतिक दृष्टि से साल 2017 बड़ा ही उठा-पटक वाला रहा, जहां बड़े-बड़े दिग्गजों की ज़मीन खिसकती दिखी तो कुछ ऐसे नए चेहरे सामने आए जिनमें भविष्य राजनीतिक संभावनाएं दिखीं। ऐसे में इस पूरे साल पर एक नजर डाली जाए तो कई ऐसी राजनीतिक घटनाएं हुई हैं जो भविष्य की राजनीति को प्रभावित करती रहेंगी। कई राजनीतिक हलचलों के मामले में साल 2017 पूरे देश के लिए अहम रहा... आइये एक नज़र डालते हैं कुछ ख़ास घटनाओं पर....



साल 2017 में कुल सात राज्यों जिनमें उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर, यूपी, पंजाब, हिमाचल प्रदेश और गुजरात में विधानसभा चुनाव हुए। इनमें से पंजाब को छोड़कर सभी छह राज्यों में बीजेपी ने सरकार बनाई। यूपी में भाजपा और उसके साथ गठबंधन करने वाली पार्टियों को कुल 325 सीटें हासिल हुई हैं। पंजाब की बात करें तो यहां कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस को दो तिहाई बहुमत हासिल हुआ है। उत्तराखंड में भी जनता ने बीजेपी के सिर पर सेहरा बांधा। गोवा में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, लेकिन बीजेपी ने सरकार बनाने में कामयाबी हासिल की। मणिपुर में भी स्थिति गोवा जैसी ही बनी लेकिन भाजपा ने यहां भी सरकार बनाई। हालांकि बीजेपी की जीत के बाद ईवीएम मशीन की विश्वसनीयता पर भी लगातार सवाल खड़े होते रहे। विपक्षी पार्टियों ने मौजूदा केंद्र सरकार पर ईवीएम से छेड़छाड़ के आरोप भी लागए। 



राहुल युग की शुरूआत
1971 में इंदिरा के नेतृत्व में कांग्रेस (आई) बनने के बाद से पार्टी के अध्यक्ष पद पर गांधी परिवार का कब्जा रहा है, चाहे कुर्सी पर कोई भी बैठा हो. शुरुआत के दौर में जगजीवन राम, शंकर दयाल शर्मा और देवकांत बरुवा अध्यक्ष पद पर रहे। 1977 में आपातकाल के बाद हुए चुनाव में हुई हार के बाद इंदिरा गांधी कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर आ गईं। 1985 में इंदिरा की हत्या के बाद राजीव गांधी को कांग्रेस का नया अध्यक्ष बनाया गया। 1992 में राजीव गांधी की हत्या के बाद 6 साल के लिए कांग्रेस अध्यक्ष का पद गांधी परिवार से दूर रहा। और 1998 से 2017 तक सोनिया गांधी इस पद पर बिना किसी विरोध के बनी रहीं। इस दौरान दस साल तक कांग्रेस सत्ता में रही। और साल 2017 के अंत में कांग्रेस पार्टी की कमान राहुल गांधी के हाथों में सौंप दी गई। राहुल के पार्टी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के साथ ही कांग्रेस में राहुल राज युग की शुरूआत हो गई है।





भविष्य की राजनीति के चहेरे
जहां कांग्रेस ने राहुल गांधी को कांग्रेस पार्टी की कमान सौंपी, वहीं समाजवादी पार्टी की साइकिल पर अखिलेश यादव सवार हो गए। साल 2017 के अक्टूबर महीने में आगरा सपा के राष्ट्रीय सम्मेलन में अखिलेश यादव को पांच साल के लिए राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया गया। हालांकि अखिलेश यादव के लिए 2017 बेहतर साबित नहीं हुआ हो उन्हें बेशक प्रदेश की सत्ता गवांनी पड़ी हो लेकिन साल के आखिरी में जिस तरह से पार्टी की कमान उन्हें मिली और दूसरे दलों के नेताओं के शामिल होने का सिलसिला जिस तरह से चल रहा है, वो सपा के आने वाले समय के लिए शुभ संकेत है। और वो अब पार्टी का मजबूत चेहरा बनकर उभरे हैं।बिहार  में तेजस्वी यादव लालू प्रसाद यादव के सियासी वारिस के तौर पर उभरे हैं, तेजस्वी यादव अपने आपको स्थापित करने में काफी हद तक सफल रहे हैं। 2015 के चुनाव में महागठबंधन की सरकार बनी, नीतीश कुमार सीएम बने तो तेजस्वी यादव डिप्टी सीएम बने। लेकिन तेजस्वी को पहचान साल 2017 में महागठबंधन के टूटने के बाद मिली। सत्ता चली जाने के बाद तेजस्वी ने विधानसभा में जब भाषण दिया तो उसकी जमकर चर्चा हुई। कई नेताओं ने कहा- नीतीश की अवसरवादिता से भले ही लालू के बेटे सत्ता से दूर हो गए पर तेजस्वी नेता बन गए। गुजरात में पाटीदार आरक्षण आंदोलन के जरिए हार्दिक पटेल ने राज्य ही नहीं देश में एक अपनी अलग पहचान बनाई है। हार्दिक कम उम्र के चलते चुनावी रणभूमि में नहीं उतरे, लेकिन नेता बनने में जरूर कामयाब रहे। और इस युवा और नए चेहरे ने गुजरात में सालों से जमी हुई नरेंद्र मोदी की जड़ों को हिला दिया। गुजरात के ऊना में दलितों की पिटाई के विरोध में आंदोलन के बाद उभरे जिग्नेश मेवाणी, जो निर्दलीय लड़े और विधायक बनने में कामयाब रहे। जिग्नेश ने प्रदेश में ही नहीं यवा दलित चेहरे के तौर पर देश भर में अपनी पहचान बनाई हैं। युवा चेहरे अल्पेश ठाकोर ने कांग्रेस का दामन पकड़ा और विधायक बने। अल्पेश ने गुजरात में अपनी पहचान अवैध शराब के बिक्री के खिलाफ उठाई और धीरे-धीरे ओबीसी का चेहरा बनने में कामयाब रहे। यूपी के शब्बीरपुर में दलितों के खिलाफ हुई हिंसा के बाद भीम आर्मी का युवा चेहरा सामने आया चंद्रशेखर आजाद उर्फ रावण, जिन्होंने बहुत कम समय में अपनी बड़ी पहचान बनाई और ताकत दिखाई। चंद्रशेखर यूपी ही नहीं पूरी दलित राजनीति के निर्णायक चेहरे के रूप में सामने आए। 



 संकट में तीसरा मोर्चा
2017 का साल तीसरे मोर्चे के लिए बुरे सपने जैसा रहा है। 2015 के बिहार विधानसभा में जनता दल (यूनाइटेड) और राष्ट्रीय जनता दल के गठबंधन ने तीसरे मोर्चे को एक उम्मीद दी थी. इस बीच तीसरे मोर्चे ने खुद को नीतीश कुमार के इर्द-गिर्द बुनना शुरू किया। 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा के नतीजे आने के बाद बिहार के राजनीतिक समीकरण बदलने लगे। 26 जुलाई 2017 को नितीश कुमार ने मुख्यमंत्री की कुर्सी से इस्तीफ़ा दे दिया और बिहार में ‘सामाजिक न्याय’ वाला महागठबंधन एक दुखांतक मोड़ पर खत्म हुआ। तीसरे मोर्चे के सभी पुराने खिलाड़ी अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं. उत्तर प्रदेश चुनाव ने उत्तर भारत में तीसरे मोर्चे के दो बड़े खिलाड़ियों अखिलेश यादव और मायावती को हाशिए पर ला दिया। बिहार में नितीश कुमार के टूट जाने के बाद उत्तर भारत में तीसरे मोर्चे की सारी संभावनाएं ठंडे बस्ते में चली गई हैं।
 


शरद यादव से छिनी राज्यसभा की सदस्यता 
जदयू के बागी नेता शरद यादव और अली अनवर की राज्यसभा सदस्यता रद्द कर दी गई। नीतीश कुमार के गुट ने उपराष्ट्रपति से इन दोनों नेताओं की सदस्यता खत्म करने की अपील की थी। उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू के इस फैसले से शरद यादव को तगड़ा झटका लगा है। शरद और अली अनवर ने बिहार में भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने के नीतीश के फैसले का विरोध किया था और पार्टी से बगावत कर दी थी। इसके बाद जदयू ने अगस्त में शरद को राज्यसभा में पार्टी नेता के पद से हटा दिया था। नीतीश गुट ने राज्यसभा सचिवालय से शरद और अली अनवर की सदस्यता खत्म करने की अपील की थी।



लालू यादव के लिए सबसे खराब रहा साल
बिहार में वर्ष 2017 बदलते राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से बेहद नाटकीय रहा। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जदयू, लालू प्रसाद यादव की राजद और कांग्रेस को मिलाकर बने महागठबंधन का साथ छोड़ भाजपा नीत राजग का दामन फिर से थाम लिया। लालू प्रसाद के लिए जाता हुआ साल बहुत खराब साबित हुआ जहां राज्य सरकार से उनकी पार्टी को हटना पड़ा और चारा घोटाले में जेल जाना पड़ा। रांची की एक विशेष अदालत ने 23 दिसंबर को लालू और 15 अन्य को 21 साल पुराने चारा घोटाले में दोषी ठहराया था। इस मामले में सजा तीन जनवरी को सुनाई जायेगी। 69 साल के राजद नेता फिलहाल रांची की बिरसा मुंडा जेल में बंद हैं।



खराब दौर से गुजरती दलित राजनीति
दलित अस्मिता की राजनीति करने वाली बहुजन समाज पार्टी इस समय अपने सबसे खराब दौर से गुजर रही है, 2014 में बसपा अपना खाता तक नहीं खोल पाई थी, लेकिन 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उम्मीद की जा रही थी कि बसपा की स्थिति कुछ बेहतर होगी, लेकिन नतीजे इसके बिल्कुल उलट रहे, 2012 के विधानसभा चुनाव में 80 सीट जीतने वाली बसपा 2017 में 19 सीट पर सिमट कर रही गई। राज्यसभा में खुद मायावती अपनी पार्टी की नुमाइंदगी करती थीं लेकिन उन्होंने शब्बीरपुर में दलित हिंसा के खिलाफ उन्होंने राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया।

महाराष्ट्र दलित राजनीतिक और सांस्कृतिक आंदोलन की शुरूआती जमीन है। यहां दलित आंदोलन को पहला राजनीतिक स्वर देने का काम किया रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया ने किया इसकी स्थापना बीआर अम्बेडकर ने 1956 में की थी। फिलहाल महाराष्ट्र में इसके 50 अलग-अलग टुकड़े सियासी मैदान में सक्रिय हैं। इसमें से सबसे बड़ा टुकडा है आरपीआई (अठावले) इसके प्रमुख है रामदास अठावले ही इस पार्टी के एकमात्र सांसद हैं। आरपीआई (अठावले) बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए का हिस्सा है। 
रामविलास पासवान बिहार में दलित आंदोलन का चेहरा माने जाते हैं। लेकिन लोक जनशक्ति पार्टी के पासवान के बारे में कहा जाता है कि लगतार सत्ता में बने रहने वाले नेता हैं। वो 1996 से लगतार केंद्र सरकार में मंत्री रहे हैं। सिवाए 2002 से 2004 के बीच, जब उन्होंने गुजरात दंगों के विरोध में अपना इस्तीफ़ा दे दिया था। इस कालखंड में यूपीए,एनडीए और संयुक्त मोर्चे की सरकारें आई और गईं। देश में दलित राजनीति के स्थापित चेहरे या तो किनारे लगा दिए गए हैं या फिर बीजेपी के पाले में खड़े दिख रहे हैं। 



राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति
17 जुलाई 2017 के दिन देश के राष्ट्रपति पद के लिए वोट डाले गए। इस चुनावी प्रक्रिया में भाजपा की ओर से रामनाथ कोविंद विजयी रहे। जबकि 5 अगस्त 2017 को हुए उपराष्ट्रपति चुनाव में भाजपा प्रत्याशी वैंकेया नायडू को जीत हासिल हुई। यह चुनाव देश ही दुनिया में भी छाए रहे, कांग्रेस ने भी इस चुनाव में अपने प्रत्याशी उतारे लेकिन वो जीत हांसिल नहीं कर पाए।


जीएसटी का निर्णय
साल 2017 में मोदी सरकार ने 1 जुलाई से पूरे देश में गुड्स एंड सर्विसिज टैक्स लागू करने का फैसला किया। सरकार व कई अर्थशास्त्रियों द्वारा इसे स्वतंत्रता के पश्चात् सबसे बड़ा आर्थिक सुधार बताया गया। जीएसटी के तहत केन्द्र एवम् विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा भिन्न भिन्न दरों पर लगाए जा रहे विभिन्न करों को हटाकर पूरे देश के लिए एक ही अप्रत्‍यक्ष कर प्रणाली लागू कर दी गई। इस फैसले के बाद अलग-अलग स्तर पर लगने वाले एक्साइज ड्यूटी, एडिशनल एक्साइज ड्यूटी,सेंट्रल सेल्स टैक्स, वैट, लक्जरी टैक्स, सर्विस कर, इत्यादि की जगह केवल जीएसटी के रूप में कर लगना शुरू हुआ। जीएसटी परिषद ने 66 तरह के प्रोडक्ट्स पर टैक्स की दरें घटाई। सरकार के इस कदम की विपक्ष ने जमकर आलोचना की, राहुल गांधी ने इसे गब्बर सिंह टैक्स तक कह डाला, लेकिन मोदी सरकार ने इसको बेहतर तरीके से प्रस्तुत किया जिसका लाभ गुजरात चुनाव में भी देखने को मिला।



2 जी फैसले से कांग्रेस को मिली संजीवनी
1.76 लाख करोड़ रुपये के 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के छह साल बाद सीबीआई की विशेष कोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सरकारी वकील आरोप साबित करने में नाकाम रहे। कोर्ट ने यह भी कहा कि सीबीआई आरोप साबित करने में नाकाम रही। इस मामले में डीएमके नेता ए राजा, डीएमके सांसद कनिमोझी समेत 17 आरोपी बरी कर दिए गए। ऐसे में कांग्रेस ने बीजेपी पर जमकर हमला बोला और यह तक कह दिया की यह सब यूपीए सरकार को बदनाम करने के लिए किया गया।



अमित शाह के बेटे जय शाह पर लगे आरोप
बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के बेटे जय शाह की कंपनी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। आपको बता दें कि न्यूज वेबसाइट द वायर की ओर से दावा किया गया था कि जय शाह की कंपनी का टर्नओवर अचनाक से कई गुना बढ़ गया है और खबर में इस पर संदेह जाहिर किया गया। इस मामले के सामने आने के बाद कांग्रेस ने मोदी और अमित शाह पर जमकर निशाना साधा और दोनों से इस्तीफे की मांग तक कर डाली। कांग्रेस ने तो गुजरात चुनाव में इस मुद्दे को जोर शोर से उठाया और इसे भुनाने की कोशिश की।



पीएम मोदी और ट्रंप की मुलाकात
राजनीतिक और कूटनीतिक मामलों में वर्ष 2017 भारत के लिए बहुत ही अच्छा रहा। इस साल भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात की। अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस के भीतर भारत का सबसे अच्छा दोस्त होने का चुनावी वादा पूरा किया। इसके साथ ही अमरीका ने पहली बार स्पष्ट शब्दों में कहा कि अफगानिस्तान में भारत एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी है। इस वर्ष द्विपक्षीय संबंधों में नया और ऐतिहासिक मोड़ 26 जून को आया जब प्रधानमंत्री मोदी ने व्हाइट हाउस में ट्रंप से मुलाकात की।



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