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राजनीतिक दलों की नीति और नीयत

(लोकतंत्र की वकालत का दंभ भरने वाली राजनीतिक पार्टियां कुछ गिने−चुने व्यक्तियों की ही  मिल्कियत हो कर रह गई हैं। जो जनप्रतिनिधि इन पार्टियों के बैनर तले चुनकर आते हैं, वे वास्तव में जनता के नहीं बल्कि अपनी पार्टी के आकाओं के एजेंट होते हैं। उन्हें अगर जनता और पार्टी में से किसी एक को चुनना पड़े तो वे निश्चित रूप से पार्टी को ही चुनेंगे। लगभग सभी दल साम दाम दंड और भेद से केवल सत्ता हासिल करने में जुटे हुये हैं। इस प्रकार राजनीतिक हित राष्ट्रीय हितों पर भारी पड़ते जा रहे हैं।)    

देश के मौजूदा राजनीतिक हालातों के चलते  लोगों में काफी निराशा और हताशा है। आजादी मिलने के बाद के शुरुआती वर्षों में राजनीतिक दलों से जो थोड़ी−बहुत आशा थी, समय के साथ वो धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। अधिकतर राजनीतिक दल आम जनता से जैसे कट चुके हैं। राजनीतिक दल अब सत्ता प्राप्ति के लिए जनबल की बजाय धनबल और बाहुबल पर अधिक यकीन करते हैं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि राजनीतिक दल जनसंगठन नहीं रह गए हैं बल्कि प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों की तरह काम कर रहे हैं। लोकतंत्र की वकालत का दंभ भरने वाली ये पार्टियां कुछ गिने−चुने व्यक्तियों की मिल्कियत हो कर रह गई हैं। जो जनप्रतिनिधि इन पार्टियों के बैनर तले चुनकर आते हैं, वे वास्तव में जनता के नहीं बल्कि अपनी पार्टी के आकाओं के एजेंट होते हैं। उन्हें अगर जनता और पार्टी में से किसी एक को चुनना पड़ा तो वे निश्चित रूप से पार्टी को ही चुनेंगे। लगभग सभी दल साम दाम दंड और भेद से केवल सत्ता हासिल करने में जुटे हुये हैं।    

व्यापक दृष्टिकोण से आज के राजनीतिक हालातों के मद्देनजर तो यही लगता है कि कोई भी दल, कोई भी सरकार अच्छे कार्यों में एक−दूसरे के साथ स्पर्धा करने के बजाय गलत कामों में होड़ बनाए हुए है। जब भाजपा वाले यूपी या बिहार में कानून व्यवस्था के बिगड़ने की दुहाई देते हैं तो वहां के सत्तारूढ़ नेता राजस्थान या महाराष्ट्र या मध्य प्रदेश के हालात दिखाने लगते हैं। कांग्रेस वाले ममता बनर्जी के शासन पर उंगली उठाते हैं तो ममता पलटकर कर्नाटक या उत्तराखंड या हिमाचल के नमूने पेश कर देती हैं। सच तो यह है कि कानून व्यवस्था से लेकर संवेदनशील प्रशासन या नेताओं, अफसरों की जवाबदेही आदि के मामले में सभी सत्तारूढ़ पार्टियां एक−दूसरे की तुलना में बहुत घटिया प्रदर्शन कर रही हैं। इसके बाद इस देश की जनता के लिए कुछ भी सुखद निकल सकेगा, इस बारे में संदेह है। कई प्रदेशों की कानून व्यवस्था, भ्रष्टाचार तथा सरकारी संवेदनहीनता का विश्लेषण किया जाए तो राजनीतिक दलों में एक−दूसरे को हराने की होड़ में लगी दिखाई देती है।  

जब से भारत अंग्रेजी शासन से मुक्त हुआ, तब से लेकर आज तक लगभग सभी प्रमुख दलों को सरकार चलाने का मौका मिल चुका है। न केवल राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि क्षेत्रीय स्तर पर सभी राजनीतिक दल सत्ता का स्वाद चख चुके हैं। लेकिन  मौलिक परिवर्तन कहीं भी देखने को नहीं मिल सका है। सभी राजनीतिक दल सत्ता में आने से पहले देश और जनता के विकास की बात करते हैं किंतु सत्तासीन होते केवल अपनी निजी और दल के विकास में जुट जाते हैं। फलत: राजनीतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार को अप्रत्याशित बढ़ावा मिलता है। बदमाश, गुंडे और माफियाओं के लिए नेता और पुलिस आदर्श शरणदाता के रूप में बदल जाती है। इसका एक ही अर्थ है कि सरकारी अमले और सत्तारूढ़ लोगों की मिलीभगत से ही समाज में अनेक प्रकार के अनाचार पनप रहे हैं।  

2014 का शांति का नोबेल पुरस्कार पाने वाले कैलाश सत्यार्थी का मानना है, “चुनाव या राजनीतिक दल समाज में बदलाव नहीं ला सकते।” यहाँ यह सवाल उठता है कि सत्यार्थी जी राजतंत्र के तरफदार हैं? यह सवाल इसलिए कि जब देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था है तो दलगत राजनीति तो होगी ही। लोकतांत्रिक व्यवस्था है तो सरकार चुनावों के जरिए जनतांत्रिक तरीके से ही चुनी जाएगी कि नहीं?

असल में सामाजिक बदलाव में जो परिस्थियां अलगाव पैदा करती हैं, वो कुछ और ही हैं। उनमें मुख्यत: राजनीतिक दलों में केवल और केवल सत्ता हथियाने का भाव है। देशहित या जनहित उनके लिए बाद की बात है। जाहिर है देश में जातिवाद का वर्चस्व है। फिर भी राजनेताओं द्वारा विरोधियों पर जात-पात की राजनीति किये जाने की तोहमत आये दिन मढ़ी जाती रहती है, जबकि जातिवादी मानसिकता लगभग सभी राजनीतिक दलों में हावी है। देश को जातिवाद के भंवरजाल से मुक्त कराने के दावे और वादे भी बढ़ चढक़र किये जाते हैं लेकिन विडंबना यह है कि राजनीतिक दल एवं इनके नेता जातिवाद की संकीर्णता से बाहर नहीं निकल पाये हैं। जातिवाद की संक्रामक महामारी देश की राजनीतिक तंत्र में इतनी गहराई तक समाहित हो गई है कि कोई भी राजनीतिक दल जातिवाद की राजनीति से मुक्त नहीं है। कहना अतिशयोक्ति नहीं कि सभी राजनीतिक दलों की संगठनात्मक,  सृजनात्मक व चुनावी गतिविधियां भी पूरी तरह जातिवाद के इर्द गिर्द ही केन्द्रित होकर रह गई हैं।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि देश की राजनीतिक व्यवस्था में अग्रणी भूमिका निभाने वाले राजनीतिक दल एवं उनके नेताओं द्वारा देश के सभी नागरिकों के सम्मानजनक जीवन जीने के सपने एवं देश के संविधान की अवधारणा को मूर्त रूप देने में अपना योगदान किस हद तक सुनिश्चित कर पायेंगे। आम धारणा है कि राजनीतिक दलों की संगठनात्मक गतिविधियों से लेकर चुनावों में टिकट वितरण तक में जातीय समीकरणों का विशेष ध्यान रखा जाता है, फिर चाहे संबंधित राजनीतिक दल पर जाति विशेष के तुष्टिकरण या उपेक्षा का ही आरोप क्यों न लगे तथा राजनीतिक दल के संगठनात्मक स्वरूप या टिकट वितरण को लेकर व्यापक जन असंतोष की स्थिति भी क्यों न निर्मित हो जाये। राजनीतिक दलों को ऐसे लोक सरोकारों से कोई विशेष वास्ता नहीं रहता तथा वह केवल राजनीतिक सफलता को ही अपना एकसूत्रीय उद्देश्य मानते हैं। इस प्रकार राजनीतिक हित राष्ट्रीय हितों पर भारी पड़ते जा रहे हैं।  


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