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आखिर कैसै न्याय मिलेगा भगाना के दलितों को ?

हरियाणा, 21 मई 2017 को भगाना कांड को पांच साल पूरे हो रहे हैं लेकिन भगाना के पीड़ितों को अभी तक कोई न्याय नही मिल पाया है, उल्टा उन्हें अलग-अलग तरीकों से प्रताड़ित किया जा रहा है, जिसके चलते आज भगाना कांड संघर्ष समिति ने आऩे वाली 21 मई को होने वाले कार्यक्रम को सफल बनाने और आंदोलन को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाने के लिए सभा का आयोजन किया जिसमें कई विचारकों, अधिकारियों, पत्रकारों और समाजसेवियों ने अपने विचार रखे और सुझाव दिए कि किस तरह आंदोलन को आगे बढ़ाया जाए, जिससे आंदोलन को नई दिशा मिले और पीड़ितों को न्याय मिल सके। इसमें मशहूर पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट विधा भूषण रावत, अशोक अज्ञानी जी, यूथ फॉर सोशल जस्टिस के सुरेंद्र सिंह और कई अन्य शामिल हुए। भगाना कांड संघर्ष समिति के सतीश कलाम अंबेडकर ने जानकारी दी कि पिछले पांच सालों में उन्हें तरह-तरह से प्रताड़ित किया जा रहा है, हिसार से उनका धरना उखाड़ दिया गया, अब दिल्ली के जंतर-मंतर से भी उनका टेंट उखाड़ दिया गया है, दिल्ली पुलिस ने उन्हें यहां से हटने की धमकी दी और एनडीएमसी उनका सारा सामान और टेंट वहां से उखाड़ कर ले गई, जिसकी कहीं पर कोई सुनवाई नही हुई। न्याय दिलाना तो दूर अब सरकारें हमें विरोध तक नहीं करने देना चाहती हैं और हमें और हमारे साथियों को लगातार प्रताड़ित कर रही हैं।  
गौरतलब है कि 2012 में भगाना गांव में जाटों ने करीब 280 एकड़ शामलात की जमीन पर कब्जे के साथ ही खेल के मैदान पर भी कब्जे की कोशिश की तो दलित युवकों ने इसका विरोध किया और प्रशासन को शिकायत भेज दी। जाटों ने पंचायत कर दलित युवकों के अभिभावकों को सख्त चेतावनी दी,  जिसे युवाओं ने मानने से इंकार कर दिया। जिसके बाद  दलितों के घरों में तोडफ़ोड़ की गई, उनके सामाजिक बहिष्कार का ऐलान कर उन्हें गांव से खदेड़ दिया गया। कुछ दलितों के घरों के दरवाजों के बाहर दीवारें चुनवा दी गईं। जब दलित गांव से पलायन कर मिनी सेक्रेट्रिएट पहुंचे तो उनके पशुओं को जब्त कर गौशाला भिजवा दिया गया और छह दलितों के खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा लगा दिया गया। जिसके बाद से दलित लगातार कभी हिसार तो कभी दिल्ली में न्याय की गुहार लगाते भटक रहे हैं लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है, राज्य की पिछली सरकार हों या वर्तमान सरकार केंद्र की पिछली सरकार हो या वर्तमान सरकार किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही है जिससे साफ ज़ाहिर है कि दलितों के खिलाफ इन सबका का चरित्र एक ही है। ऐसे में चिंता और भी बढ़ जाती है आखिर कैसे और कब तक पीड़ितों को न्याय मिल पाएगा।    

मुख्य संवाददाता
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