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दलितों की स्वतंत्रता के मायने- डॉ. जय प्रकाश कर्दम

देश स्वतंत्रता की सत्तरवीं जयंती मना रहा है। 15 अगस्त, 2017 के दिन देशभर में अनेक कार्यक्रमों का आयोजन होगा, जिनमें स्वतंत्रता सेनानियों और शहीदों को याद किया जाएगा, उनका गौरव गान किया जाएगा। दिन भर देशभक्ति के गीत गाए और बजाये जाएंगे। इस सब का उद्देश्य है देश की जनता को स्वतंत्रता के अर्थ और मूल्यों के प्रति जागरूक बनाना, उसमें देश के प्रति प्रेम और त्याग की भावना पैदा करना। बाजारों से लेकर सड़कों, चौराहों तक सब ओर भिन्न-भिन्न आकार-प्रकार के तिरंगे झण्डे दिखायी दे रहे हैं। देशभक्ति के गीतों के साथ चारों ओर तिरंगे झण्डों का लहराना एक विशिष्ट प्रकार का वातावरण का निर्माण करता है।यह सब प्रत्येक वर्ष दोहरायी जाने वाली कहानी है।
इस वर्ष कुछ विशेष सोचा और क्रियांवित किया जा रहा है।युवावर्ग में देशभक्ति की भावना विकसित करने के लिए विश्वविद्यालय परिसर में टैंक रखवाना तो बच्चों को इस दिन स्वतंत्रता के स्मारकों तथा देश की रक्षा के लिए शहीद होने वाले किसी सेनानी के घर ले जाकर उसके जीवन और देश के प्रति जज्बे के बारे में जानने के लिए प्रेरित करना ताकि उनके अंदर भी देश के प्रति उसी तरह का जज्बा पैदा हो, ये सब नयी सोच के अंश हैं। विचार का विषय यह है कि क्या सिर्फ दूसरे देशों के आक्रमण या अतिक्रमण से देश की सीमाओं की रक्षा करना ही स्वतंत्रता है? 
स्वतंत्रता दो प्रकार की होती है। एक देश की स्वतंत्रता, और दूसरी व्यक्ति की स्वतंत्रता। स्वतंत्रता दिवस के ये समस्त आयोजन और उपक्रम देश की स्वतंत्रता का यही अर्थ समझाते हैं कि हमारा देश, विदेशी शक्ति के अधिपत्य से मुक्त रहे। व्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ है कि देश की समस्त जनता परस्पर समान है तथा कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के अधीन नहीं है। 15 अगस्त,1947 को अंग्रेजी शासन से मुक्त होने के बाद भारत एक स्वतंत्र देश है, जो किसी के अधीन नहीं है। दूसरे देशों के आक्रमण या अतिक्रमण से देश की सीमाओं की रक्षा करने को ही स्वतंत्रता मानने वालों के लिए यह गर्व की बात हो सकती है। वे बहुत खुशी से स्वतंत्रता का अनुभव कर सकते हैं, और उसका उत्सव मना सकते हैं। वस्तुत: स्वतंत्रता एक अनुभव है, जो उसे हो सकता है जिसको विचार अभिव्यक्ति से लेकर धर्म, उपासना और इच्छा एवं रूचि के अनुसार आजीविका का अधिकार हो। दलित इन अधिकारों से वंचित हैं, इसलिए स्वतंत्रता के अनुभव से भी वंचित हैं। सामाजिक असमानता, भेदभाव, उपेक्षा, अस्पृश्यता, और इसके चलते आर्थिक रूप से अभावग्रस्त, विपन्न और पर-निर्भर व्यक्ति स्वतंत्रता का अनुभव कैसे करे?  उनको भी समानता और सम्मान मिले, ताकि वे भी स्वतंत्रता का अनुभव कर सकें, समाज को उसके प्रति जागरूक बनाने के प्रति कोई सक्रियता क्यों नहीं है?    2 यह स्वच्छता वर्ष है। देश भर में स्वच्छता अभियान चलाया जा रहा है। किंतु, हाथ में झाड़ू पकड़कर फोटो कोई भी खिंचवा ले, स्वच्छता की सारी जिम्मेदारी केवल सफाई कर्मियों पर है। यह अत्यंत शर्मनाक और दुखद है कि देश भर में सीवरों की सफाई करते हुए प्रति वर्ष हजारों दलितों की मृत्यु हो जाती है। क्यों आज भी दलितों को ही सफाई-कर्म करना पड़ता है?  
देश के अनेक गांवों में आज भी दलित समाज का दूल्हा सवर्णों के समक्ष घोड़ी पर बैठकर नहीं निकल सकता। देश में कई ऐसे मंदिर हैं, जिनमें शूद्रों-अंत्यजों का प्रवेश वर्जित है। वे परतंत्रता का सा जीवन जी रहे हैं। एक स्वतंत्र देश में यह परतंत्रता क्यों है? मानव-धर्म और  मानव-सेवा का उपदेश देने वाले भद्रजन इस प्रश्न पर निरंतर मौन हैं। क्यों आज भी उनके मन-मस्तिष्क वर्ण-व्यवस्था और जातिवाद की दुर्गंध से युक्त हैं? जब तक दिमागों में असमानता और भेदभाव का कूड़ा भरा रहेगा तब तक बाहरी गंदगी को साफ करने का कोई अर्थ नहीं है। सड़कों,गलियों की स्वच्छता का अभियान चलाने से अधिक जरूरी है दिमागों की स्वच्छता का अभियान। दिमागों में भरा वर्ण-व्यवस्था और जातिवाद का कूड़ा साफ होने पर सड़कों, गलियों की सफाई स्वत: हो जाएगी, उसके लिए किसी अभियान की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। दिमागी स्वच्छता से स्वतंत्रता को अर्थवान और मूल्यवान बनाया जा सकता है। स्वतंत्रता शांति, सह-अस्तित्व और नैतिकता की मांग करती है। ये मानवीय मूल्य हैं। देश से प्यार करने वाले और उसकी स्वतंत्रता की अक्षुण्णता के लिए त्याग की भावना रखने वाले देशवासियों को चाहिए कि देश को वर्ण-व्यवस्था और जातिगत भेदभाव की गंदगी से मुक्त कराने का संकल्प लें और इसके लिए सच्चे मन से अभियान चलाकर स्वतंत्रता के मूल्यों को मूल्यवान बनाएं। डॉ. जय प्रकाश कर्दम, वरिष्ठ  साहित्यकार


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