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सीआरपीएफ जवानों द्वारा आदिवासी नाबालिग छात्राओँ से छेड़छाड़ का मामला, एक जवान गिरफ्तार, एक फ़रार

9 अगस्त 2017-  छत्तीसगढ़, दंतेवाड़ा, आदिवासी स्कूली छात्राओं के साथ छेड़छाड़ के मामले में पुलिस ने सीआरपीएफ के दो सुरक्षाकर्मियों की पहचान कर ली है और उनमें से एक को गिरफ्तार कर लिया गया है। और दूसरे की तलाश कर रही है। कुआकोंडा थाना क्षेत्र में पालनार गांव के शासकीय छात्रावास में 31 जुलाई को रक्षा बंधन के कार्यक्रम के दौरान छात्राओं के साथ छेड़खानी के मामले में पुलिस ने सीआरपीएफ के आरक्षक शमीम अहमद  को गिरफ्तार कर लिया है, जबकि दूसरे आरोपी नीरज कंडवाल की गिरफ्तारी के लिए पुलिस दल को उत्तराखंड रवाना कर दिया गया है। मामले के सामने आने के बाद से देहरादून निवासी कंडवाल इस महीने की तीन तारीख को ही अपने गृह राज्य उत्तराखंड चला गया था।
गौरतलब है कि पालनार गांव में रक्षाबंधन के अवसर पर 31 जुलाई को सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था, जिसमें सीआरपीएफ के करीब 100 जवानों ने छात्राओं से राखी बंधवाई। इस कार्यक्रम को रक्षाबंधन के दिन यानी सात अगस्त को स्थानीय टीवी पर भी प्रसारित किया गया था। लेकिन कार्यक्रम के दूसरे दिन एक अगस्त को छात्रावास की अधीक्षिका द्वारा शिकायत की गई कि सुरक्षा बल के जवानों ने सुरक्षा के नाम पर छात्राओं की तलाशी लेने के बहाने उनके साथ छेड़खानी की है, जबकि पुरुष सुरक्षाकर्मियों को महिलाओं या छात्राओं की तलाशी लेने का अधिकार नहीं है। कार्यक्रम के दौरान जब कुछ छात्राएँ टॉयलेट के लिए गईँ, जहां सीआरपीएफ के जवान खड़े हुए थे जब इन नाबालिग छात्राओं ने उनसे वहां से हटने को कहा तो वे उन्हें धमकाने लगे कि अपनी तलाशी दो वरना कलेक्टर साहब से शिकायत कर देंगे। और तलाशी के नाम पर उनसे अश्लीलता करते रहे। टॉयलेट के अंदर गई दो छात्राओँ को जवानों ने करीब पंद्रह मिनट तक अंदर ही रोके रखा। शाम को जब आपस में छात्राओं की बात हुई तो पता चला कि जवानों ने और भी लड़कियों के साथ अश्लीलता की है, जिसकी शिकायत उन्होंने वार्डन द्रौपदी सिन्हा से की, जिसकी शिकायत एसपी और कलेक्टर से की। अगले दिन कलेक्टर और एसपी पालनार पहुंचे लेकिन लड़कियों से मिलने स्कूल नहीं गए बल्कि पीड़ित लड़कियों को सीआरपीएफ कैंप में ही बुलवाया गया और उन्हें धमकाया गया कि अगर इस घटना की चर्चा बाहर किसी से भी की तो उनके लिए अच्छा नहीं होगा। सीआरपीएफ के अलावा स्थानीय प्रशासन पर भी उंगलियां उठती रही हें, अब इसी मामले को देखें तो क्या एसपी और कलेक्टर को नाबालिग पीड़ित लड़कियों को कैंप में बुलाने का अधिकार था, और वो भी उस कैंप में जहां के जवानों ने उनके साथ अश्लीलता की हदें पार कर दी थीं। इसके अलावा ये घटना 31 जुलाई की है और एफआईआर घटना से आठ दिन बाद दर्ज हुई है क्या इससे पता नहीं चलता कि मामले को रफा-दफा करने में पुलिस-प्रशासन ने कितनी तन्मयता दिखाई होगी। 
दरअसल सीआरपीएफ त्यौहारों के मौकों पर इस तरह के आयोजनों में हिस्सा लेता रहा है और इस माध्यम से ये संदेश देने की कोशिश करता रहा है कि फोर्स के साथ लोगों के संबंध कितने अच्छे हैं लेकिन हकीकत किसी से भी छिपी नहीं है। आए दिन जवानों पर ऐसे घिनौने आरोप लगते रहे हैं और कटघरे में खड़े होते रहे हैं, और ऐसे में आदिवासी समुदाय के साथ खतरे और भी बढ़ जाते हैं जब पुलिस, प्रशासन भी अभियुक्तों को बचाने और उनकी सहायता में जुट जाता हो। ये मामला भी दब ही गया था अगर सामाजिक कार्यकर्ता सामने नहीं आए होते और खबर सोशल मीडिया के द्वारा फैली ना होती। हालांकि ताजा मामले में एफआईआर दर्ज हो गई है लेकिन जहां वर्चस्ववादी और ताकतवर लोग अपना कर्तव्य और संवेदनशीलता मारकर एक साथ खड़े दिख रहे हों ऐसे में आदिवासियों के लिए न्याय की क्या उम्मीद की जा सकती है।  

मुख्य संवाददाता
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