img

दिल्ली- हिन्दी अकादमी ने 15 विभूतियों का किया सम्मान।

20 जुलाई 2017, हिन्दी अकादमी दिल्ली ने हिन्दी भवन में सम्मान अर्पण समारोह का आयोजन किया। जिसमें हिन्दी अकादमी सम्मान 2016-17 से 15 विभूतियों को नवाज़ा गया, इनमें साहित्यकार, पत्रकार, और समाजसेवी शामिल थे। डॉ मैनेजर पाण्डेय को शलाका सम्मान से सम्मानित किया गया, सुश्री नूर ज़हीर को शिखर सम्मान, डॉ जगमति सांगवान को संतोष कोली स्मृति सम्मान, प्रो राम गोपाल बजाज को नाटक सम्मान, डॉ रमेश उपाध्याय को गद्य विधा सम्मान, डॉ जयप्रकाश कर्दम को विशिष्ट योगदान सम्मान, श्री मदुसूदन आनन्द को प्रिन्ट पत्रकारिता के लिए सम्मान, श्री नवीन कुमार को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पत्रकारिता सम्मान, डॉ जानकीप्रसाद शर्मा को हिन्दी सेवा सम्मान, डॉ राजेंद्र प्रसाद मिश्र को अनुवाद सम्मान, श्री राजेश जैन को ज्ञान-प्रोद्यौगिकी सम्मान, डॉ सविता सिंह को काव्य सम्मान, श्री सहीराम को हास्य-व्यंग्य सम्मान, डॉ प्रभाकिरण जैन को बाल-साहित्य सम्मान और श्री महेश कटारे ‘सुगम’ को सहभाषा सम्मान (बुंदेलखंडी) से नवाज़ा गया।
इस मौके पर हिंदी अकादमी के सचिव डॉ जीत राम भट्ट ने समारोह में आए अतिथियों का स्वागत किया और जानकारी दी कि हिंदी अकादमी का लक्ष्य है कि दिल्ली की हर विधानसभा में एक लाइब्रेरी हो। वहीं दिल्ली सरकार में भाषा, कला एवं संस्कृति मंत्री राजेंद्रपाल गौतम ने कहा कि विधानसभा का क्षेत्र इतना बड़ा होता है कि एक लाइब्रेरी से कुछ नही होगा, एक विधानसभा क्षेत्र में कम से कम चार लाइब्रेरी होनी चाहिएं बल्कि जो बड़ी विधानसभाएँ हैं उनमें तो 8-10 लाइब्रेरी होनी चाहिएं, हमें कोशिश करनी चाहिए कि ऐसे छात्रों को जिनके घरों में पढ़ने की जगह नहीं होती हैं उनके घरों के आसपास ही लाइब्रेरी मुहैया कराई जाएं, जिससे उन्हें पढ़ने का माहौल मिल सके। हिंदी अकादमी, दिल्ली की उपाध्यक्ष श्रीमती मैत्रेयी पुष्पा जी ने कहा कि सब जानते हैं कि सम्मान और पुरस्कारों में किस तरह की राजनीति चलती है लेकिन मैं सौभाग्यशाली हूं कि मेरे ऊपर किसी तरह का कोई दबाव नही है और सरकार का कोई हस्तक्षेप मेरे काम में नही है। और मैं आप सबको विश्वास दिलाती हूं कि जब तक मैं हूं, साहित्यकारों और पत्रकारों के साथ किसी तरह की नाइंसाफी नहीं होने दूंगी। डॉ मैनेजर पाण्डेय समारोह में भी गंभीर मुद्दा उठाने से नहीं चूके, उन्होंनें कहा कि साहित्य और सत्ता के बीच संवाद कम विवाद ज्यादा होता रहा है, उन्होंने बाबा नागार्जुन की पंक्तियां पढ़ीं-  सत्ता का कुछ और सत्य है, जनता का कुछ और। सत्य भी एक तरह का नही होता, लेकिन लेखक सिर्फ जनता का सत्य ही सत्ता के सामने रखते हैं और जनता का सत्य, सत्ता को हमेशा संकट और असमंजस में डालता है इसलिए सत्ताएं साहित्य को भूलना पसंद करती हैं। अगर सत्ताएँ साहित्य के माध्यम से आने वाले जनता के सत्य पर थोड़ा ध्यान देने लगें तो जनता का भी भला होगा और सत्ता का भी भला होगा।
विशिष्ट योगदान सम्मान से नवाज़े गए डॉ जयप्रकाश कर्दम जी का मानना है कि साहित्य समाज को मानवीय बनाने का एक उद्यम है। हम जो देखते, सुनते हैं या अनुभव करते हैं, साहित्य का काम उसे ज्यों का त्यों अभिव्यक्त कर देना भर नहीं है, अपितु उसके साथ जुड़ी या उसके अंदर व्याप्त विषमता, विसंगति एवं वीभत्सताओं को अभिव्यक्त करना भी है। भारतीय समाज का अभिजात्य वर्ग बाहर से जितना उदार, सहिष्णु और मानवीय दिखाई देता है, दलितों के लिए प्रति उतना ही अनुदार, असहिष्णु और अमानवीय है। साहित्य में इस समझ का होना आवश्यक है कि अभिजात्यता के मूल्य ही जीवन मूल्य नहीं होते हैं, लोक और लोक से भी निम्न स्थिति में जीने वाले लोगों के जीवन के भी मूल्य होते हैं। साहित्य की सार्थकता रंजन से अधिक मंगल में है, इसलिए वंचितों की पक्षधरता साहित्य का सबसे बड़ा धर्म और मूल्य है। मैनें अपनी रचनाओं के माध्यम से निरंतर दलित, वंचित वर्ग की वेदना, संवेदना और चेतना को स्वर देने की कोशिश की है। यह साहित्य की चली आ रही धारा के विरूद्ध चलना नहीं है, अपितु उस धारा को एक दिशा देना है।
पत्रकारिता सम्मान (इलेक्ट्रॉनिक मीडिया) से नवाज़े गए नवीन कुमार जी के अनुसार निरपेक्ष पत्रकारिता जैसी कोई विद्या नहीं होती। यह गरीबों, शोषितों, वंचितो और आम आदमी की हसरतों के पक्ष में खड़े होने का सबसे महीन कर्म है। कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस कोशिश में सत्ता असहज होती हो, सियासत मुश्किल में पड़ती हो या राजनेता विचलित होते हों। इस जोखिम के बिना जनता की तरफदारी एक फरेब हैं। एक श्रमजीवी पत्रकार के तौर पर मेरी निष्ठाएं उस पक्ष के साथ रही हैं जिनकी आवाज़ें अनसुनी रह जाती हैं। अक्षरों के गुलदान से पराजित लोगों के भीतर विश्वास भरने की परंपरा ही मेरे लिए पत्रकारिता है। राजनीति के संक्रमण, रोजी के संकट और रास्तों के बंद होने के भय से विचलित हुए बगैर इस यात्रा को निभा ले जाने की ज़िद कोई त्याग नहीं, मेरे जीने की अनिवार्य शर्त है।
महिलाओं के लिए लगातार आवाज़ उठाती रहीं श्रीमती रजनी तिलक जी भी सम्मान समारोह में शामिल हुईं, जिन्होनें बातचीत के दौरान सम्मानित हुई 15 विभूतियों में से चार महिलाओं को सम्मान दिए जाऩे की सराहना की और कहा कि हर क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी और बढ़नी चाहिए, महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व दिए बिना हम एक उन्नत समाज की रचना कर ही नहीं सकते। 


' पड़ताल ' से जुड़ने के लिए धन्यवाद अगर आपको यह रिपोर्ट पसंद आई हो तो कृपया इसे शेयर करें और सबस्क्राइब करें। हम एक गैर-लाभकारी संगठन हैं। हमारी पत्रकारिता को सरकार और कॉरपोरेट दबाव से मुक्त रखने के लिए आर्थिक मदद करें।

संबंधित खबरें

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked with *

0 Comments

मुख्य ख़बरें

मुख्य पड़ताल

विज्ञापन

संपादकीय

वीडियो

Subscribe Newsletter

फेसबुक पर हमसे से जुड़े