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आपकी मुस्कुराहट परेशान करती है उपसभापति महोदय...

आपकी मुस्कुराहट हमें परेशान करती है उपसभापति महोदय... आपकी मुरस्कुराहट पूरे दलित पिछड़े समाज के उपहास का अहसास कराती है... अहसास कराती है कि आप किस तरह आजादी के 70 साल बाद भी हमें अट्टहास की दृष्टि से देखते हैं... आपकी मंद-मंद मुस्कुराहट में मनुवाद और सवर्ण मानसिकता झलकती है... जब मायावती जी अपनी बात रख रहीं थीं तो आप मुस्कुरा रहे थे और मामले की गंभीरता को खत्म कर रहे थे... क्या यही मर्यादा है आपके पद की... क्या कोई कॉंटेस्ट करा रहे थे आप राज्यसभा में, कि तीन मिनट दिए गए हैं उन्ही में काम पूरा करना होगा वरना आप कॉन्टेस्ट से बाहर... क्या उत्तरप्रदेश में दलितों पर हो रहे अत्याचारों और शब्बीरपुर की हिंसा आपकी नजर में यही मायने रखती है,  कुरियन जी आपकी मुस्कुराहट देखकर मुझे उस गैंग रेप पीड़ित महिला का बयान याद आ जाता है जिसमें उसने  कहा था. कि वो जब भी आपको टीवी पर देखती है तो डर जाती है, और टीवी बंद कर देती है... आप भूले तो नही होंगें केरल के सूर्यनेल्ली की रहने वाली उस लड़की को जिसने आप पर भी आरोप लगाया था कि 1996 में जब वो 16 साल की थी और आप केंद्रीय मंत्री थे तो आप भी उसके यौन शोषण में शामिल थे, हालांकि की आप मामले से पाक-साफ निकल आए थे... लेकिन वो केस आज भी हजारों सवाल लिए खड़ा है। चलिए मैं मुद्दे से भटकना नहीं चाहता... लेकिन आज आपकी मुस्कुराहट देखने के बाद मेरा भी ऐसा ही मन करता है कि आपको देखने से अच्छा है कि टीवी बंद कर दूं।
अब फिर बात आ जाती है दोगली देसी मीडिया कि जो ये साबित करने पर तुला हुआ है कि मायावती ने हाई वोल्टाज ड्रामा रचा है, और जबकि 9 महीने बाद उनका राज्यसभा का कार्यकाल समाप्त होने ही वाला है तो उन्होंने सहानुभूति लूटने के लिए इस्तीफा दिया है, लेकिन देसी मीडिया के बौने पत्रकार ये नहीं बताना चाहते कि सदन में ऐसा माहौल क्यों बना, आखिर एक गंभीर मुद्दे पर बोलने के लिए पर्याप्त समय क्यों नहीं दिया जा रहा था, और वहां बैठे बीजेपी नेता क्यों अशिष्टों की तरह चिल्लाए जा रहे थे, क्या ये समझ लिया जाए कि उनको दलितों के मुद्दों से कुछ लेना देना नहीं है, और एक बनी-बनाई परंपरा के तहत बस चिल्लाना और विरोध करना ही सबकुछ है, मुद्दों का कोई मतलब नहीं है, 18 जुलाई का दिन इतिहास में काले अध्याय के नाम से जाना जाएगा, जब सदन में एक गंभीर मामले को मज़ाक बनाकर रख दिया गया। सदन में दलितों के लिए अकेली आवाज़ उठाने वाली मायावती को दलितों की आवाज़ ना सुनने की गंभीरता को देखते हुए सदन से इस्तीफा देना पड़ा। लेकिन दलित विरोधी या फिर मायावती विरोधी इस गंभीरता को नही समझ पाएंगें।  


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