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लालू से डरता है मनुवाद

लालू यादव के खिलाफ सिर्फ बीजेपी या मोदी लॉबी काम नही कर रही है, लालू के खिलाफ एक सोच काम कर रही है, जो मनुवाद को पोषित करती है, आप देख सकते हैं कि सिर्फ मनुवादी राजनेता ही नही मनुवादी मीडिया भी किस तरह लालू के खिलाफ लगातार काम कर रहा है। मीडिया की आतुरता देखकर लगता है कि वो सुपारी लेकर लालू के खिलाफ काम कर रहे हैं। पहले वो लालू को उकसाते हैं फिर उनके बेटे को उकसाते हैं, और ये सब एक सोची समझी साजिश के तहत किया जा रहा है, कि हर स्तर पर, हर मोर्चे पर लालू और उनके परिवार की छवि खराब की जाए। जो पत्रकार उनकी छवि बिगाड़ने की सुपारी लिए हुए हैं, वे ये भूल रहे हैं कि अब सोशल मीडिया का जमाना है, सबको सब कुछ दिख जाता है, 10 साल पहले वाली एकछ्त्र पत्रकारिता के वर्चस्व के दिन अब लद चुके हैं। बल्कि मैं तो कहूंगा कि इस भ्रम को भी मत पालिये कि आशुतोष की तरह एक चांटा खा लेंगे तो बड़े पत्रकार बन जाएंगे... अब इसका उल्टा हो जाएगा।
आज सबको पता है कि कौन किसके लिए काम कर रहा है और कौन सा एंकर किस पार्टी का प्रवक्ता बना हुआ है। वैसे ये किसी भी मीडिया संस्थान का अपना चयन है कि वो किससे सवाल करता है और क्या सवाल करता है, लेकिन यहां ये भी समझना होगा कि आप किस समाजशास्त्र के तहत पत्रकारिता कर रहे हैं। क्या एक वर्ग विशेष के खिलाफ ही ऐसा नही किया जा रहा है... आखिर मैं ये समझना चाहता हूं कि किसी वर्ग विशेष के नेताओं को इतना हल्का क्यों और कैसे ले लिया जाता हैं, क्या आप अपने पसंदीदा नेताओं के मुंह में भी इसी तरह माइक ठूंसते हैं, अगर आप वो पुराना वीडियो देखेंगे जिसमें माननीय कांशीराम जी ने आशुतोष को थप्पड़ मारा था तो वो भी उन्हें जानबूझकर उकसाने की कोशिश कर रहा था। तभी उन्हें गुस्सा आया था। अगर आप लालू यादव का वीडियो देखेंगें तो उसमें भी साफ दिख जाएगा कि वो माइकवीर पत्रकार एक ही सवाल घुमा फिराकर दागे जा रहा है और परेशान किए जा रहा है, यही तेजस्वी यादव के साथ हो रहा था, माइकवीर जबरन उनके मुंह में गन माइक ठूंसे जा रहा था, कई बार वो उनकी ठुड्डी में भी लगा और सिर पर भी लगा, क्या आपने इतनी हिम्मत कभी मोदी जी के सामने दिखाई है, क्या यूपी रोल मॉडल बन गया है जो योगी से पूछने के लिये आपके पास सवाल ही नही है...चलिए योगी को छोड़िए, वहां दो-दो उपमुख्यमंत्री हैं किसी से तो उत्तरप्रदेश पर सवाल पूछिए... उनके लिए क्यों धृतराष्ट्र बने हुए हैं। बताइए और मेरी जानकारी बढ़ाइये कि क्या कभी आप खट्टर और वसुंधरा राजे के सामने भी माइकवीर बने हैं ? किसी भी हाल में मारपीट या हिंसा का समर्थन नही किया जा सकता, लेकिन पत्रकारिता की आड़ में जिस तरह माइकवीर पत्रकार सीमाएं लांघ रहे हैं उसकी भी आलोचना होनी चाहिए। लेकिन नेताओं से सुपारी लेकर पत्रकारिता करने वाले पत्रकार आवेश में सब भूला बैठते हैं, उनके दिमाग में बस अपने आकाओं को कृतार्थ करने की ही सोच चल रही होती है। लेकिन माइकवीर पत्रकार और सुपारी पत्रकारिता के कारण पत्रकारिता पर विश्वसनीयता का खतरा गहराता जा रहा है।    


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