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बाबा साहब की हर सोच,हर काम में राष्ट्र निर्माण की भावना- अर्जुन राम मेघवाल

दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजीडीएवी कॉलेज में बाबा साहब भीमराव अंबेडकर जयंती के उपलक्ष्य में एक व्याख्यान माला का आयोजन किया गया, जिसमें “भारत निर्माण में डॉ भीमराव अंबेडकर का योगदान” विषय पर चर्चा हुई। दिल्ली विश्वविद्यालय में पीजीडीएवी पहला ऐसा कॉलेज है जिसने बाबा साहब की जयंती के मौके पर ऐसे आयोजन की शुरूआत 2014 में की थी। इसका श्रेय कॉलेज के प्रोफेसर मनोज कुमार केन जी को जाता है जिन्होंने बाबा साहब की जयंती पर ऐसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम करने का बीड़ा उठाया। ऑडिटोरियम में खचाखच भीड़ को देखकर लग रहा था कि जो बीज प्रोफेसर मनोज केन ने 2014 में बोया था आज उसने एक वृक्ष का रूप ले लिया है। कॉलेज के छात्रों को बाबा साहब के विचारों से अवगत कराना और जागरूक करना, ये वाकई में एक सराहनीय कार्य हैं और सही मायने में समाज के लिए ऐसे ही कार्य करने की जरूरत है।
कार्यक्रम मे मुख्य अतिथि के रूप में केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल जी ने शिरकत की। दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर श्यौराज सिंह बेचैन जी विशिष्ट वक्ता के तौर पर मौजूद रहे। जिन्होंने बाबा साहब के बारे में कई महत्वपूर्ण जानकारियां दीं,  बाबा साहब के परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी लेकिन उनके पिताजी कर्ज लेकर भी उनके लिए किताबें लाकर बाबा साहब को देते थे ताकि वे पढ़ सकें। क्योंकि वे जानते थे कि जीवन में शिक्षा और अनुशासन का कितना महत्व है। मीडिया पर सवाल खड़े करते हुए बोले कि मीडिया उस जमाने में भी दलित हितों के लिए काम नहीं करता था, सामाजिक न्याय और चेतना लाने के लिए जब बाबा साहब ने 31 जनवरी 1920 को मूकनायक अखबार शुरू किया था तो केसरी में विज्ञापन भेजा और तिलक जी से कहा कि आप अपने सौजन्य से ये छापिए, क्योंकि हम समाज सेवा का काम करने जा रहे हैं, लेकिन तिलक जी ने ये कहते हुए मना कर दिया कि हमारे पास जगह नही है, फिर बाबा साहब ने कहा कि ठीक है आप विज्ञापन के रूप में इसे छापिये, और बता दीजीए कि हमें इसके लिए कितना पैसा देना है, इसके बाद भी मूकनायक का विज्ञापन केसरी अखबार में नही छापा गया। इससे पता चलता है कि मीडिया उस समय भी दलितों के साथ नही था और आज भी नहीं है। बाबा साहब ने शुरू से कोशिश की कि सबको समान शिक्षा मिले, उच्च शिक्षा मिले, लेकिन इसके लिए सरकारों द्वारा कभी ईमानदार कोशिश नहीं की गई। समान शिक्षा, जो सबसे बुनियादी काम था उसी को सरकारों ने गलत रास्ते पर डाल दिया। और उसमें एक बड़ी खाई बना दी। जिसके चलते दलितों तक अभी भी शिक्षा नहीं पहुंच पा रही है।  
केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि ये देश का दुर्भाग्य है कि बाबा साहब की पहचान सिर्फ संविधान निर्माता, दलितों के नेता के होने तक ही सीमित कर दी गई है जबकि वो एक बहुत बड़े देशभक्त थे वे दलितों के ही नही सबके नेता थे और सबसे पहले वो देश के लिए सोचते थे। धारा 370 का ज़िक्र करते हुए वे बोले कि पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू जम्मू कश्मीर के लिए विशेष प्रावधान चाहते थे, और उन्होंने बाबा साहब को संविधान में इस विशेष आर्टिकल जोड़ने के लिए कहा लेकिन बाबा साहब ने ऐसा करने से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा कि ये देश हित में नहीं है इसलिए मैं ऐसा नही करुंगा। उस समय नेहरू के खिलाफ जाने की हिम्मत किसी में नहीं थी लेकिन बाबा साहब देश हित के लिए नेहरू के खिलाफ भी चले गए थे। हालाँकि एक साउथ इंडियन नेता के द्वारा विशेष प्रावधानों के लिए प्रस्ताव रखवा दिया गया। और धारा 370 को संविधान में जोड़ दिया गया। अब आप सोचिए कि अगर उस समय बाबा साहब की बात मान ली जाती तो आज जम्मू कश्मीर की समस्या ही नही होती। बाबा साहब बहुत बड़े देशभक्त थे और उन्हें राष्ट्र निर्माण की चिंता थी वे सिर्फ और सिर्फ देश के लिए ही सोचते थे इसीलिए वे नेहरू से नही डरे थे। बाबा साहब ने महिलाओं के लिए जो काम किया वो आज तक कोई नहीं कर पाया। महिलाओं को मताधिकार बाबा साहब ने ही दिलाया, अगर बाबा साहब नही होते तो महिलाएं आज पहले वाली स्थिति में ही होती। और अगर वो उसी ढर्रे पर होती तो क्या आज हमारा देश उस ऊंचाई तक पहुंच पाता जिस पर आज है। श्रम कानूनों पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि बाबा साहब को शुरू से राष्ट्र निर्माण की चिंता थी, इसके लिए उन्होंने आजादी का इंतज़ार नही किया, एक घटना का ज़िक्र करते हुए उन्होंने बताया कि आजादी से पहले जब बाबा साहब वायसराय की काउंसिल में सदस्य थे, जिस समय दिल्ली में बड़ी-बड़ी इमारतें बन रही थीं, वे मजदूरों के बीच में गए और देखा की महिलाएँ काम कर रही हैं जिनसे बात करके उन्हें पता चला कि काम के घंटे तय नही थे, सुबह उठते ही वो काम करने लगती हैं और सिर्फ खाना खाते समय ही थोड़ा आराम मिल पाता है, इसके अलावा बैठ तक नहीं पाती हैं, गर्भवती महिला से बात की तो पता चला कि उसके लिए भी कोई छुट्टी या छूट नहीं है। और इतनी मेहनत के बावजूद उन्हें बहुत कम पैसे दिए जाते हैं। बाबा साहब ने अंग्रेजों के खिलाफ वायसराय काउंसिल में मजदूरों और मज़दूर महिलाओं की आवाज़ उठाई और कहा कि ये गरीबों पर जुर्म है, अत्याचार है जो खत्म होने चाहिए। जिसके बाद न्युनतम मजदूरी और मेटरनिटी लीव (मातृत्व अवकाश) का कानून बनाया गया। अगर हम उनको पढ़ेंगें और समझेंगे तो पता चलेगा कि उनकी हर सोच में हर काम में एक ही सोच थी कि भारत महान कैसे बनेगा। श्रम मंत्री (वायसराय की काउंसिल में सदस्य ) के नाते एक बार बाबा साहब ने दस करोड़ के बजट को 50 करोड़ का करवाया था, एक दिन एक ठेकेदार उनके बेटे यशवंत राव के पास आया और बोला कि आप अपने पापा से कहकर ये ठेका मुझे दिला दो मैं आपको 25 प्रतिशत कमीशन दूंगा। रात को करीब 9 बजे यशवंत राव ने ये बात बाबा साहब को आकर बताई और बोले की आपको तो ये ठेका किसी को देना ही है, जिनसे मेरी पहचान है उन्हें दे दीजीए वो मुझे 25 प्रतिशत कमीशन दे देंगे, ये सुनकर बाबा साहब बड़े दुखी हुए और यशवंत राव पर भड़क गए, उसे खूब डांटा और घर से निकाल दिया, उसी समय, रात को बिना खाना खाए यशवंत को अपना घर छोड़ना पड़ा था। आज के नेताओं को सीखना चाहिए बाबा साहब से जिन्होंने परिवारवाद और भ्रष्टाचार पर उस समय चोट कर दी थी। लेकिन आज के नेता इन बुराईयों के पोषक बने हुए हैं।
अर्जुन राम मेघवाल करीब एक घंटा बोले, उन्होंने कहा कि आज मैं यहां पर ये भ्रम तोड़ने आया हूं कि बाबा साहब सिर्फ दलितों के नेता थे और दलितों के ही साथ थे, मैं यहां पर ये साबित करने आया हूं कि वे सबके साथ थे और सबकी बात करते थे। वे पहली प्राथमिकता देश को देते थे। और इन सब उदाहरणों से आपको ये समझ आ गया होगा कि बाबा साहब देश से कितना प्यार करते थे, उन लोगों की गलतफहमी भी दूर हो जानी चाहिए जो ये कहते हैं कि बाबा साहब अंग्रेजों के साथ थे। बाबा साहब का भारत निर्माण में बहुत बड़ा योगदान है। और इसके लिए बाबा साहब ने कभी कोई समझौता नहीं किया। जो लोग बाबा साहब को संविधान और दलितों तक सीमित करने का षडयंत्र रच रहे हैं वो अपराध कर रहे हैं और राष्ट्र निर्माण में बाधक बन रहे हैं इसलिए अब जरूरत आन पड़ी है कि जितना हो सके बाबा साहब के विचारों को फैलाया जाए। और युवाओं को जागरूक किया जाए। मेघवाल जी को सुनकर युवाओं में जोश भर गया । व्याख्यान  खत्म होने के बाद मेघवाल जी के साथ सेल्फी लेने की होड़ सी लग गई। हालांकि मेघवाल जी के पास समय की काफी कमी थी लेकिन फिर भी उन्होंने छात्र छात्राओं को निराश नही किया और सबके साथ देर तक सेल्फी देते रहे। 

मुख्य संवाददाता
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