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दलितों-पिछड़ों को आपस में मिलना पड़ेगा, प्यार करना पड़ेगा, तभी होगी मुक्ति- शरद यादव

नई दिल्ली, 8 जुलाई 17, जेएऩयू के ट्रिपल एस1 ऑडिटोरियम में सोशलिस्ट सांसद बी एन मंडल जी की याद में सोशल जस्टिस अवॉर्ड सेरेमनी का आयोजन किया गया। जिसमें राज्यसभा सांसद व वरिष्ठ समाजवादी नेता शरद यादव को लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। और पांच युवाओं को सामाजिक न्याय के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए पुरस्कार से नवाज़ा गया। इनमें सुमित समोस, श्वेता यादव, आलोक कुमार, धर्मवीर गगन और ज़ुबैर आलम को पुरस्कार दिए गए। दिलीप कुमार और मुलायम सिंह को सोशल जस्टिस स्पेशल अवार्ड से सम्मानित किया गया। इस मौके पर कांचा इलैया और शरदेन्दु कुमार की किताब “हिंदुत्व मुक्त भारत” का विमोचन किया गया।
कार्यक्रम में “उच्च शिक्षा में ओबीसी आरक्षण के दस साल” पर भी परिचर्चा हुई जिसमें शरद यादव जी के अलावा चर्चित विद्वान कांचा इलैया, आदिवासी मसलों पर मुखर रहने वाली सोना झरिया मिंज, प्रोफेसर शरदेंदु कुमार और जेएनयू के प्रोफेसर एस एन मालाकार ने अपने विचार रखे। शरद यादव ने वर्तमान हालात पर चिंता जताते हुए कहा कि आजादी के 70 साल में इतना भयावह दौर कभी नही रहा। इस समय देश में जो बीमारियां फैली हुई हैं वो बहुत ही गंभीर और गहरी हैं, ये धर्म और जाति की बीमारियां हैं धर्म की बीमारी तो दुनिया भर में है लेकिन जाति की बीमारी भारत में ही है, और जात ऐसी चीज है जिससे कभी मुक्ति नही मिलती। इससे हमें खुद ही मुक्ति पानी होगी जिसके लिए समबोध होना जरूरी है, अगर समबोध नही होगा तो मुक्ति भी नहीं होगी। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पिछड़े और दलित आपस में जुड़ें। एक दूसरे से प्यार करें, पिछड़ों को दलितों से प्यार करना होगा, अपने साथ लाना होगा, तभी मजबूती से लड़ सकोगे। हम लोग अपने आप को खुद ही बांट रहे हैं और जातिवाद को बढ़ावा दे रहे हैं, पहले अपनी जाति को एक करो फिर दूसरी जाति को जोड़ों। हमें सीखना चाहिए मनुवादियों से, जिन्होंने जाति बनाई है। वो खत्म कर रहे हैं और हम जाति बनाने में लगे हैं। जाति बहुजनों के खून में ही नही है बल्कि हड्डियों में चली गई है हम आपस में ही जातिवाद फैला रहे हैं। पहले तो हमें खुद ही जुड़ना होगा तभी जातिविहीन समाज बन सकेगा। धड़ों में बंटे समाज पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा कि मनुवादी जान गए हैं कि हमें उल्लू कैसे बनाये रखना है, इसलिए उन्होंने हर समाज से एक बड़ा उल्लू का पठ्ठा उठाया, और जब उनके पास बहुत सारे उल्लू के पठ्ठे इकठ्ठे  हो गए तो उन्होंने पूरे समाज को उल्लू बनाना शुरू कर दिया, और हम आज तक भी उल्लू बने जा रहे हैं। इसलिए एक हो जाओ और इनके हाथों का खिलौना बनना स्वीकार मत करो। पूरे हिंदुस्तान का संपूर्ण राज मुट्ठी में करना ही हमारा मकसद होना चाहिए।
जाने माने विद्वान कांचा इलैया ने अपनी किताब “हिंदुत्व मुक्त भारत” का जिक्र करते हुए कहा कि हिंदुत्व का मतलब क्या है, हिंदुत्व का मतलब है असमानता, हिंदुत्व का मतलब है ब्राह्मणवाद, हिंदुत्व का मतलब है शुद्ध शाकाहारी, हिंदुत्व का मतलब है राष्ट्र विरोधी होना, हिंदुत्व का मतलब ही है एंटी ह्युमन। इस देश में तीन लोग राज कर रहे हैं, ब्राह्मण, बनिया और जैन और इन तीनों का देश के उत्पादन में कोई योगदान नही है, जबकि हम लोग सबसे ज्यादा सबसे ज्यादा उत्पादन में है लेकिन हम शोषण का शिकार हो रहे हैं, अगर हम लोग उत्पादन का हिस्सा नही बनें तो ये लोग क्या खाएंगे। देश की सीमाओं पर भी ये तीनों तबके कहीं नहीं दिखते। देश की सुरक्षा में इनका कोई योगदान नही रहा, जबकि हम लोगों ने देश की सीमाओं पर अपनी जानें दी है, लेकिन हम कहीं नही दिखते। उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी चालाक था इसलिए अपनी बायोग्राफी लिख कर गया। लेकिन हमारे महापुरुष, महात्मा फूले, अंबेडकर और बी एन मंडल ने अपनी  ऑटो बायोग्रीफी नही लिखी। उन्होंने READ, WRITE &  FIGHT पर जोर दिया।
सोना झरिया मिंज ने अपने विचार रखे उनका कहना था कि लोग तंत्र के वशीभूत हो रहे हैं और खुद को उसी सिस्टम का आदि बना रहे हैं, सिस्टम से निकल कर ही मुक्ति होगी। प्रोफेसर शरदेन्दु ने बी एन मंडल के विचारों की महता का ज़िक्र करते हुए बताया कि वे हमेशा कहते थे कि योजनाएं बनाते समय उस आखिरी आदमी का चेहरा ध्यान में रखना चाहिए, जिसके लिए योजना बनाई जा रही है इससे आप कभी भटकाव में नहीं आएंगे। एक बार जब पत्रकारों ने उनसे पूछा कि आप आरक्षण देकर बड़े पदों पर लोगों को बैठाने की बात करते हैं, क्या इससे देश का नुकसान नही होगा तो उन्होंने जवाब दिया कि जो लोग अभी बैठें हैं ये तो आरक्षण से नही आए हैं, फिर देश की ये दुर्गत क्यों हो रही है। हजारों साल में किसी संत ने अपनी जाति नही बताई लेकिन कबीर और रविदास को अपनी जाति बतानी पड़ी, आखिर क्यों? प्रोफेसर एस एन मालाकार जी ने सवाल उठाया कि जो लोग हिंदु धर्म को मानते हैं वो सामाजिक लड़ाई कैसे लड़ सकते हैं। जो लोग जनैऊ पहनते हैं, हाथ में कलावा बांधते हैं, अंगुठियां पहनते हैं आखिर वो लोग कैसे हिंदु धर्म के खिलाफ आवाज़ उठाएंगे।
आखिर में इस बात की भी घोषणा की गई कि ये अवॉर्ड हर साल जारी रहेगा और अलग-अलग विश्वविद्यालयों में जाकर व्याख्यानमालाओं का भी आयोजन किया जाएगा।


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